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Saturday, October 17, 2015

यह कैसी शिक्षा


     हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी है ! हमारी मातृभाषा हिंदी है ! हम अपने घर में हिंदी बोलते हैं और अपने परिवार के हर सदस्य को अपनी मातृभाषा का सम्मान करने के लिये और हिंदी साहित्य की अनमोल पुस्तकों को पढ़ने के लिये प्रोत्साहित भी करते हैं लेकिन हमारे सारे प्रयत्न तब निष्फल होते दिखाई देते हैं जब अंग्रेज़ी माध्यम के स्तरीय विद्यालयों में पढ़ने वाले हमारे बच्चे घर में आकर बताते हैं कि आज स्कूल में हिंदी में बात करने पर कितने बच्चों को दण्डित किया गया और कई बार वे स्वयं भी इस दण्ड के भागी होते हैं !

    यह कैसी विचित्र मानसिकता है ! अपने ज्ञान की वृद्धि के लिये आप कितनी भी भाषाएँ सीख लीजिए आप पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है लेकिन अपने ही देश में अपनी ही मातृभाषा बोलने पर स्कूलों में बच्चों को दण्ड दिया जाए यह कहाँ का न्याय है ! जिस भाषा के प्रयोग पर बच्चों को सज़ा मिले उसे सीखने के लिये उनमें कितनी दिलचस्पी बाकी रह जायेगी ! फिर हिंदी दिवस मनाने का या राष्ट्रभाषा के गुणगान का झूठा आडम्बर रचाने का क्या औचित्य है ? 
     गाँधी जी का विचार था कि बच्चों को अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम में पढ़ाने से उनकी मौलिक क्षमताओं का स्वाभाविक विकास नहीं हो पाता ! उनमें विषय को ठीक से समझे बिना ही रटने की और नक़ल करने की प्रवृत्ति जन्म लेती है और वे स्वयं को कभी भी सही तरीके से अभिव्यक्त नहीं कर पाते ! उनका मानना था कि जैसे गाय का दूध माँ के दूध का स्थान नहीं ले सकता उसी तरह कोई भी अन्य भाषा अपनी मातृभाषा का स्थान नहीं ले सकती ! वे तो यहाँ तक कहते थे कि यदि कोई उन्हें एक दिन के लिये निरंकुश सत्ताधिकारी बना दे तो वे सबसे पहले स्कूलों से विदेशी भाषा के माध्यम का बहिष्कार कर दें !

     भाषाएँ सभी बहुत समृद्ध और सुन्दर हैं और ज्ञानार्जन के लिये जितनी भी सीख ली जाएँ कम ही हैं ! लेकिन सुख दुःख हर्ष विषाद और आपदा विपदा की स्थिति में अपनी मातृभाषा ही सबसे पहले याद आती है ! चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ तो याद ही होगी आपको ! छद्म वेश में छिपे जर्मन सिपाही की पहचान तब ही हो पाती है जब वह घायल हो जाता है और अपनी मातृभाषा में अपने भगवान को याद करता है !

     मुझे ज्ञानार्जन के लिये कुछ भी पढ़ने और कितना भी सीखने से कोई आपत्ति नहीं है ! बस दुःख इसी बात का है कि हमारे स्कूलों के शिक्षक जिन पर एक पूरी पीढ़ी को शिक्षित और संस्कारित करने का दायित्व है वे ही बच्चों को भ्रमित करने में और अपनी राष्ट्रभाषा के सन्दर्भ में उन्हें नकारात्मक रूप से पूर्वाग्रही बनाने में कितनी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं ! बच्चे स्कूलों में अपनी राष्ट्र भाषा का सम्मान करना नहीं सीखते बल्कि उस भाषा में अपने मित्रों से साधारण सा संवाद करने पर भी दण्डित किये जाते हैं यह शिक्षा का कैसा विचित्र स्वरुप है ? ज़रा सोचिये ! और यह भी विचार करिये कि दण्ड पाने का वास्तविक अधिकारी कौन है ?



साधना वैद