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Wednesday, November 16, 2016

बेरुखी


हर मौसम में हमेशा ही
भरपूर बहार की बेपनाह खूबसूरती
और दिलकश खुशबू से भरे रहने वाले
इस रंगीन बाग़ का रास्ता 
बहार शायद अब भूल गयी है !
मुद्दत हुई इस बाग़ में
अब फूल नहीं खिलते
और सारे फूलदार पौधे
सर झुकाए पशेमान से खड़े हैं
एकदम बेरौनक, वीरान 
और बेहद उदास !
खूबसूरत परिंदों ने अपना बसेरा
शायद किसी और बाग़ में
बना लिया है !
अब सुबह शामें उनकी
ज़िंदगी से भरी चहचहाहट से
गुलज़ार नहीं होतीं ! 
खुशबू की जगह हवाओं में
अब धूल सी उड़ने लगी है
जो आँखों को हमेशा किरकिराहट
और आँसुओं से तर रखती है
कि ये धुँधलाई आँखें
कोई दूसरा दिलनशीं मंज़र देख
कभी मुतासिर हो ही न सकें !
फूल नहीं हैं तो
तितलियों ने भी
बाग़ में आना छोड़ दिया है
और शायद इसीलिये
ज़िंदगी की छोटी-छोटी
खुशियों और खूबसूरती से
रौनक और रंगीनियों से
जीने की ख्वाहिश और जज़्बे से
यह दिल इतना
बेज़ार हो चुका है कि
अब कुछ भी दिल को नहीं छूता !
कहीं इन सबका सबब
तेरी बेरुखी तो नहीं !

साधना वैद