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Tuesday, July 31, 2018

सीला सावन


सीला सावन 
तृषित तन मन 
दूर सजन 

मुग्ध वसुधा 
उल्लसित गगन 
सौंधी पवन

गाते विहग 
सुरभित सुमन 
झूमें मगन 

व्याकुल बूँदें 
देती हैं आमंत्रण
आओ सजन 

पुकारें तुम्हें 
बिखर धरा पर 
नष्ट हो जायेंं

बुलायें तुम्हें 
वार दें तन मन 
खुद सो जायें

आया सावन 
सुन कर पुकार 
धरा मुस्काई 

गोटे के फूल 
चूनर में अपनी 
टाँँक ले आई 

हुआ अंधेरा
कड़कती बिजली 
डरपे हिया 

बरसी बूँदें 
गरजते बादल 
तड़पे जिया 

रीता जीवन 
रीता उर अंतर 
आ जाओ पिया

भर के सुख 
सूने मधुबन में 
ना जाओ पिया


साधना वैद 














3 comments :

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना सोमवारीय विशेषांक १५ जुलाई २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  3. वाह!!!
    बहुत सुन्दर...

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