छाया कोहरा !
घर में घुसा रवि
छिपा कर चेहरा !
ठण्ड की रात
भारी अलाव पर
छाया घना कोहरा !
सीली लकड़ी
बुझ गया अलाव
जल उठा नसीब !
आज भी ‘हल्कू’
बिताते सड़क पे
पूस की ठण्डी रात
कहाँ बदला
नसीब किसानों का
स्वतन्त्रता के बाद !
साधना वैद
बहुत बढ़िया,ॠतु विशेष पर बहुत अच्छी अभिव्यक्ति।सादर।------ नमस्ते,आपकी लिखी रचना शनिवार १३ दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी हैपांच लिंकों का आनंद पर...आप भी सादर आमंत्रित हैं।सादरधन्यवाद।
हार्दिक धन्यवाद श्वेता जी ! बहुत-बहुत आभार आपका ! सप्रेम वन्दे !
Wahh
हार्दिक धन्यवाद वर्मा जी ! आभार आपका !
बेहतरीन
आभार आपका हरीश जी ! हृदय से धन्यवाद !
बहुत बढ़िया,ॠतु विशेष पर बहुत अच्छी अभिव्यक्ति।
ReplyDeleteसादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शनिवार १३ दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
हार्दिक धन्यवाद श्वेता जी ! बहुत-बहुत आभार आपका ! सप्रेम वन्दे !
DeleteWahh
ReplyDeleteहार्दिक धन्यवाद वर्मा जी ! आभार आपका !
Deleteबेहतरीन
ReplyDeleteआभार आपका हरीश जी ! हृदय से धन्यवाद !
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