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Friday, December 12, 2025

कुछ कतौता

 




छाया कोहरा !

घर में घुसा रवि

छिपा कर चेहरा !


ठण्ड की रात

भारी अलाव पर

छाया घना कोहरा !


सीली लकड़ी

बुझ गया अलाव

जल उठा नसीब !


आज भी ‘हल्कू’

बिताते सड़क पे

पूस की ठण्डी रात


कहाँ बदला 

नसीब किसानों का 

स्वतन्त्रता के बाद !


साधना वैद 




6 comments :

  1. बहुत बढ़िया,ॠतु विशेष पर बहुत अच्छी अभिव्यक्ति।
    सादर।
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    नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शनिवार १३ दिसम्बर २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद श्वेता जी ! बहुत-बहुत आभार आपका ! सप्रेम वन्दे !

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  2. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद वर्मा जी ! आभार आपका !

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  3. Replies
    1. आभार आपका हरीश जी ! हृदय से धन्यवाद !

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