मानसिक रूप से रुग्ण आज की पीढ़ी हमें सोचने के लिए विवश करती है कि हमारा समाज कहाँ जा रहा है, हमारे बच्चे किस तरह से विकृत मानसिकता के शिकार हो रहे हैं और वे कौन से कारक और कारण हैं जो बच्चों को ऐसे अपराध करने के लिए उकसाते हैं ! माता पिता के दिए संस्कार, उनकी परवरिश, स्कूल कॉलेजों में मिली शिक्षा और ज्ञान क्या सच में अब इतना निरर्थक और बेमानी हो गया है कि बच्चे न उनसे कुछ सीखते हैं, न उन्हें अपने जीवन में उतारते हैं और न ही उनका सम्मान करते हैं !
पूना का हाई प्रोफाइल सिया केतन का केस इसी ओर इशारा करता है कि आज की पीढ़ी कितनी आत्म केन्द्रित, स्वार्थी और निरंकुश हो गयी है कि उन्हें अपने सुख के आगे किसी का भी दुःख कुछ लगता ही नहीं ! ऐसी ही एक घटना कुछ समय पूर्व हुई थी जिसमें इंदौर की एक लड़की सोनम ने अपने पति को मेघालय की घाटियों में अपने प्रेमी के साथ मिल कर धकेल दिया था और इस घटना में भी उस युवक की मौत हो गयी थी ! यह मानसिक विकृति की पराकाष्ठा है और लड़कियों की संकुचित सोच और हृदयहीनता को उजागर करती है ! आजकल की पीढी सुविधाभोगी और स्वच्छंद होती जा रही है ! वे शॉर्ट टर्म सुख को देखते हैं और उसे पाने के लिए कुछ भी कर गुज़रने के लिए तैयार हो जाते हैं ! यहाँ तक कि किसी की जान भी लेने से वे पीछे नहीं रहते ! नहीं सोच पाते कि इन घटनाओं का क्या अंजाम होगा ! क्या उन पर अपराध तय हो जाने के बाद उन्हें घर परिवार समाज में कोई स्वीकार्यता मिलेगी ? क्या उनके जानने वाले उनसे वैसा ही प्यार करेंगे, उन्हें वही सम्मान देंगे जो वे अब तक पाती आई हैं ! माथे पर हत्यारिन का टैग लग जाने के बाद क्या उनके ही अपने प्रेमी का परिवार ऐसी हत्यारिन लड़की को बहू के रूप में स्वीकार करेगा और सबसे पहले तो क्या वे पुलिस और क़ानून के शिकंजे से बच भी पाएंगी ! क्या वे खुद से भी नज़रें मिला पाएंगी ! सालों जेल के सींखचों के पीछे अपना शेष जीवन बिताते हुए उनका सारा प्रेम का उबाल ठंडा पड़ जाएगा और पछतावे के सिवा उनको और कुछ हासिल नहीं होगा ! क्या इन्हीं लड़कियों पर हम गर्व कर सकते हैं ?
अब इस मानसिकता को धार देने वाले कारकों पर दृष्टिपात करें तो मुझे आजकल टी वी पर चौबीसों घंटे चलने वाले घटिया धारावाहिकों और हिंसाप्रधान फिल्मों से बड़ी शिकायत है ! टी वी धारावाहिकों में स्त्री की जैसी छवि दिखाई जाती है वह मुझे हैरान कर देती है ! बचपन से अब तक एक नारी में हमने संसार के सारे सद्गुणों को समाहित होते हुए ही जाना था ! प्यार, ममता, दया, करुणा, त्याग, निष्ठा, समर्पण और आत्मोत्सर्जन की वह अधिष्ठात्री होती है ! वह किसीको ज़रा सा भी कष्ट नहीं दे सकती ! वह औरों की पीड़ा को भी स्वयं झेलने के लिए सदैव तत्पर होती है ! लेकिन ये आजकल की लड़कियाँ तो इस परिभाषा में कहीं से भी फिट नहीं बैठतीं ! वे तो बड़ी बेदिली से किसीके घर के चिराग को फूँक मार कर बुझा देती हैं ! ये तो खुद अपने ही माता पिता की मान प्रतिष्ठा और इज्जत को तार-तार करने में सबसे आगे रहती हैं ! टी वी धारावाहिकों में ऐसी नकारात्मक भूमिका वाले किरदारों की बाढ़ आई हुई है जो तरह-तरह की क्रूर भंगिमाओं के साथ किसीके भी प्राण हर लेने की घोषणा करती रहती हैं ! पिस्तौल रिवॉल्वर से खिलौनों की तरह खेलती हैं ! कमज़ोर मानसिकता वाले युवा ऐसे किरदारों से जल्दी प्रभावित हो जाते हैं और उन्हीं की तरह सोचने लगते हैं ! इन धारावाहिकों पर और ऐसी फिल्मों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगनी चाहिए ! ये समाज में निगेटिव प्रभाव डालते हैं और कोमल मन के मासूम बच्चों की सोच को प्रदूषित करते हैं ! सैंसर बोर्ड पर शिकंजा कसना चाहिए जो इन्हें प्रसारण की अनुमति दे देता है ! माता पिता लाख टी वी बंद रखें ! खुद भी देखना बंद कर दें लेकिन आजकल फोन ऐसा जादुई यंत्र है कि अब सब कुछ बच्चों की मुट्ठी में बंद है ! बड़ा मुश्किल वक्त है यह हम देख रहे हैं कि यह भेड़चाल किस तरह से पूरी पीढ़ी को तबाह कर रही है और कोई कारगर समाधान सुझाई नहीं देता !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
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