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Friday, December 4, 2020

अवमूल्यन

 

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नहीं आये न तुम !
अच्छा ही किया !
जो आते तो शायद
निराश ही होते !
कौन जाने मैं पहले की तरह
तुम्हारी आवभगत
तुम्हारा स्वागत सत्कार
तुम्हारी अभ्यर्थना
कर भी पाती या नहीं ?
आखिरकार इंतज़ार भी तो
निरंतर कसौटी पर कसा जाकर
कभी न कभी
दम तोड़ ही देता है !
आशा की डोर भी तो
कभी न कभी
कमज़ोर होकर
टूट ही जाती है और
जतन से सहेजी हुई
माला के सारे मनके
एक ही पल में भू पर
बिखर कर रह जाते हैं !
पथ पर टकटकी लगाए
आँखे भी तो थक कर
कभी न कभी
पथरा ही जाती हैं और
परस्पर पत्थरों के मध्य
भाव सम्प्रेषण की
सारी संभावनाएं फिर
शून्य हो जाती हैं !
और अनन्य प्रेम की
सुकोमल पौध में भी
बारम्बार गुज़रते मौसमों की
बेरहम चोटों से
कभी न कभी
नाराज़गी की दीमक
लग ही जाती है
जो कालान्तर में उसे
समूल नष्ट कर जाती है !
अब इस खंडहर में
इन अनमोल भावनाओं के
सिर्फ चंद अवशेष ही बाकी हैं !
जो शायद किसी को भी
प्रीतिकर नहीं होंगे !
कम से कम
तुम्हें तो हरगिज़ नहीं !
क्योंकि अपना ही ह्रास
अपना ही अवमूल्यन
अपना ही क्षरण
भला कोई कैसे
स्वीकार कर सकता है !
इसलिये
वक्त की फिरी हुई
नज़रों के इस वार से
जो तुम बचना चाहते हो
तो इस वीरान खंडहर में
अब फिर कभी
भूले से भी न आना
वही ठीक रहेगा !


साधना वैद

6 comments :

  1. सुंदर प्रस्तुति

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    1. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  2. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०५-१२-२०२०) को 'निसर्ग को उलहाना'(चर्चा अंक- ३९०६) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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    Replies
    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार अनीता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  3. सुप्रभात
    उम्दा लिखा है |

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    Replies
    1. सुप्रभात जीजी ! हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आपका !

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