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Wednesday, August 4, 2021

मेरी फितरत

 



मैं तो चल पडी थी 

सपनों की डोर थामे

दूर फलक की राह पर 

लेकिन मेरा यह सुख भी 

तुझे कहाँ बर्दाश्त हुआ नियति 

फोड़ ही दिया ना तूने 

मेरी ख्वाहिशों का गुब्बारा

लेकिन देख मेरी चाल 

और देख मेरा हौसला

कभी नहीं तोड़ पायेगी तू

मेरा विश्वास और 

मेरी जिजीविषा 

क्योंकि जीतना ही 

मेरी फितरत है !

 


साधना वैद


10 comments :

  1. बहुत सुन्दर

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    1. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  2. प्रेरणा देती सुंदर सार्थक रचना।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जिज्ञासा जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  3. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शनिवार (07-08-2021) को "नदी तुम बहती चलो" (चर्चा अंक- 4149) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार मीना जी ! सप्रेम वन्दे !

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  4. सकारात्मकता से परिपूर्ण रचना...।

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    1. हार्दिक धन्यवाद संदीप जी ! आपका बहुत बहुत आभार !

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  5. क्योंकि जीतना ही

    मेरी फितरत है !
    सुंदर सृजन आदरणीय , बहुत बधाइयाँ ।

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    1. हार्दिक धन्यवाद दीपक जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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