आज शालिनी के उत्साह और जोश का कोई ठिकाना नहीं था ! शादी के बाद बेटी अपूर्वा पहली बार ससुराल से अपने मायके आई थी ! आज उसने अपनी सभी सहेलियों को मिलने के लिए बुलाया था ! शालिनी सुबह से बेटी की पसंद के पकवान बनाने में लगी हुई है ! तय समय पर सभी सहेलियाँ आ गईं और सभी ने स्वाद ले ले कर हर व्यंजन खूब सराहते हुए तृप्त होकर खाया !
“अरे, तुम लोगों ने तो कुछ खाया ही नहीं ! सब ख़तम करो ! कुछ भी बचना नहीं चाहिए ! अभी तो सभी कुछ वैसा ही रखा हुआ है !” शालिनी सबकी मनुहार में लगी हुई थी !
तभी दरवाज़े पर जमादारनी आ खड़ी हुई !
“बीबी जी, कुछ हो बचा खुचा तो दे दो मुझे भी आज तो बच्चों के मुँह में दाना भी नहीं गया है ! बड़ी आस लेकर आई हूँ !”
शालिनी की त्योरियाँ चढ़ गईं, “देख नहीं रही हो मेहमान आये हैं घर में ! देवी को न देवता को नकटा भूत को पहले दे दो ! जाओ अभी ! सुबह आना तब देखेंगे !”
अपूर्वा हतप्रभ हो उठी थी ! उसने आवाज़ देकर रोका जमादारनी को !
“रुको अम्माँ !” तीखी नज़रों से शालिनी को घूरते हुए मेज़ पर रखे सारे बचे हुए पकवान उसने एक थैली में डाल कर जमादारनी को दे दिए !
"ले जाओ अम्माँ ! बच्चों को खिला देना घर ले जाकर !" जमादारनी खूब आसीसें देती हुई गदगद भाव से गई !
“क्या मम्मी तुम भी... !” शालिनी का चेहरा बदरंग हो उठा था !
साधना वैद

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