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Monday, December 28, 2015

सर्दी की रात


सर्दी की रात 
ठिठका सा कोहरा 
ठिठुरा गात ! 

तान के सोया 
कोहरे की चादर 
पागल चाँद ! 

काँपे बदन 
उघड़ा तन मन 
गगन तले ! 

चाय का प्याला 
सर्दी की बिसात पे 
बौना सा प्यादा ! 

लायें कहाँ से 
धरती की शैया पे 
गर्म रजाई ! 

ठंडी हवाएं 
सिहरता बदन
बुझा अलाव ! 

चाय की प्याली 
सर्दी के दानव को 
दूर भगाए ! 

दे दे इतना 
जला हुआ अलाव 
गरम चाय ! 

आँसू की बूँदें 
तारों के नयनों से 
झरती रहीं ! 

तारों के आँसू
आँचल में सहेजे 
धरती माता ! 


साधना वैद  

Monday, January 5, 2015

ठण्ड की रात



ठण्ड की रात
भारी अलाव पर
छाया कोहरा !

सीली लकड़ी
बुझता सा अलाव
जला नसीब !

बर्फ सी रात
फुटपाथ की शैया
मुश्किल जीना !

बर्फीली हवा 
बदन चीर जाये
फटा कम्बल !

पक्के मकान
मुलायम रजाई
पूस की रात !

दीन झोंपड़ी
जीर्ण शीर्ण बिस्तर
कटे न रात !                                                        
 
छाया कोहरा
चाँद तारे समाये
नीली झील में !
 
चाँद ने पूछा
कौन उघडा पड़ा
सर्द रात में
बोल पड़े सितारे
एक धरतीपुत्र !

करे लड़ाई
सूरज धूप से
छाया कोहरा !
घर में घुसा रवि
छिपा कर चेहरा !

पूस की रात
‘हल्कू’ की याद आई
मन पसीजा !

आज भी ‘हल्कू’
बिताते सड़क पर
ठण्ड की रात
कुछ भी न बदला
स्वतन्त्रता के बाद !

साधना वैद