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Friday, July 31, 2020

त्रिशंकु




घर में प्रवेश करते ही प्रतीक ने वेतन का पैकेट पत्नी प्रतिमा के हाथों में थमाया और हाथ मुँह धोने के लिए बाथरूम में घुस गया ! बाथरूम से बाहर आया तो देखा प्रतिमा रुपये गिन रही थी ! अचानक ही प्रतीक असहज सा हो गया !
“अम्माँ के कमरे में जा रहा हूँ ! चाय वहीं ले आना !” प्रतीक ने कमरे से बाहर निकलते हुए प्रतिमा से कहा !
अलमारी में रुपये रख कर प्रतिमा चाय बनाने के लिए किचिन में चली गयी !
अम्माँ की तबीयत बहुत खराब चल रही थी ! बाबूजी भी अस्सी के पार हो चुके थे ! उनका स्वस्थ या अस्वस्थ होना कुछ मायने नहीं रखता था ! वर्षों पहले रिटायर हो चुके थे ! गाँव में न अच्छे डॉक्टर्स थे न इलाज की कोई अच्छी व्यवस्था ! पत्नी की सेहत जब बहुत अधिक गिरने लगी तो इकलौते बेटे के पास दिल्ली आने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था उनके पास ! दिल्ली में इलाज अच्छा हो या न हो मँहगा ज़रूर बहुत था ! यहाँ आकर वे सिर्फ घर के ही होकर रह गए थे ! ना किसीको जानते पहचानते थे ना दिल्ली की जीवन शैली की उन्हें आदत थी ! बस हैरान परेशान बीमार पत्नी के सिरहाने बैठे रहते और उनकी पल पल गिरती दशा को देख व्याकुल होते रहते !
प्रतिमा को अपने छोटे से फ़्लैट में बीमार सास और ससुर का यूँ आ जाना ज़रा भी नहीं सुहाया लेकिन कर भी क्या सकती थी ! इकलौते बेटे बहू का फ़र्ज़ तो निभाना ही था चाहे हँस कर या रोकर !
चाय पीते-पीते बाबूजी ने बताया, “दिन में डॉक्टर आये थे बबुआ ! तुम्हारी अम्माँ को जो बार बार दौरा सा आ जाता है उसके लिए एम आर आई करवाने के लिए कह गए हैं ! कल न हो तो आधे दिन की छुट्टी ले लेना तो दिखा देना अपनी अम्माँ को !” डॉक्टर का पर्चा देख प्रतीक का चेहरा उतर गया था !
“आप फ़िक्र ना करें बाबूजी ! मैं करता हूँ कुछ इंतजाम !” कह कर प्रतीक अपने कमरे में आ गया ! कमरे में प्रतिमा का मूड बहुत उखड़ा हुआ था,”तनख्वाह के रुपयों में दो हज़ार रुपये कम निकले ! किसीको दिए हैं क्या ?”
“हाँ ! अम्माँ बाबूजी अचानक से आये थे ना पिछले महीने ! तब अम्माँ के टेस्ट्स वगैरह कराने के लिए शुक्ला जी से लिए थे दो हज़ार रुपये ! आज सबको तनख्वाह मिली तो उन्होंने माँग लिए ! देने तो थे ही ! मना कैसे करता !” प्रतीक की आवाज़ में मायूसी थी ! “अब कल फिर डॉक्टर ने एम आर आई कराने को बोला है ! कम से कम चार पाँच हज़ार कल खर्च हो जायेंगे !”
प्रतिमा का पारा आसमान पर चढ़ चुका था !
”मुझे कुछ नहीं पता है ! दो महीने से विशु ट्रैकिंग पर जाने के लिए पाँच हज़ार रुपये माँग रहा है ! हमारा भी इकलौता बेटा है ! पिछले महीने भी उसे समझा बुझा कर टाल दिया था मैंने ! इस बार नहीं होगा यह ! अम्माँ बाबूजी को गाँव की बस में बिठा दो कल ! ये रुपये मेरे विशु के लिए हैं ! इनको हाथ नहीं लगाने दूँगी मैं !”
प्रतिमा की आवाज़ तार सप्तक में गूँज रही थी !  प्रतीक सहम गया था !
“अरे क्या हो गया है तुम्हें ? धीरे बोलो ! बाबूजी सुन लेंगे तो क्या सोचेंगे !”
बाबूजी स्याह चेहरा लिये दरवाज़े पर ही खड़े थे ! अम्माँ के कमरे से काँपती थरथराती आवाज़ आ रही थी, “बबुआ रे !”
बाबूजी की छाती फटी जा रही थी ! उनके चहरे पर की स्याही के कुछ छींटे उड़ कर प्रतीक के चहरे पर भी फ़ैल गए थे लेकिन प्रतिमा इस सबसे असम्पृक्त अपने रौद्र रूप में चंडिका बनी खड़ी हुई थी !

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद

Thursday, July 9, 2020

शरणागत




कोरोना महामारी क्या आई गाँवों से रोज़गार की तलाश में आये मजदूरों के पैरों के नीचे से ज़मीन और सर के ऊपर से छत ही छिन गयी ! कारखानों में ताले पड़ गए ! रहने का कोई ठौर ठिकाना न रहा और पेट की भूख मिटाने के लिए जब अंटी में पैसे भी बाकी न रहे तो दीनू ने सोचा चलो गाँव ही चले जाएँ ! उसीके गाँव के और भी कई मजदूर वापिस गाँव को लौट रहे थे ! सोचा उन्हीं के साथ वह भी निकल जाएगा ! यहाँ तो बीबी बच्चों के रहने खाने का कोई बंदोबस्त ही नहीं रहा ! गाँव पहुँच जायेंगे तो पेट भरने की फिकर तो कम से कम नहीं रहेगी और कुछ दिन अम्मा बाबू के साथ भी रह लेगा ! गाँव में अपने छोटे से खेत में जो थोड़ी बहुत फसल होती वह परिवार के गुज़ारे के लिए काफी हो जाती थी ! इन दिनों तो फसल की कटाई का काम चल रहा होगा खेतों में ! बाबू को भी तो लॉक डाउन के चलते काम वाले नहीं मिल रहे होंगे ! कैसे अकेले सम्हालेंगे सब कुछ ! वह गाँव पहुँच जाएगा तो फसल की कटाई में बाबू की मदद कर देगा !
दीनू की घरवाली सुरतिया को भी अच्छा लगा यह विचार लेकिन वह पशोपेश में थी कि दो दो छोटे बच्चों के साथ इतना लंबा सफ़र पैदल कैसे तय होगा ! फिर यही सोच कर तसल्ली कर ली कि जो सबके साथ होगा वही उनके साथ भी होगा ! दोनों ने झटपट अपना सारा सामान बाँधा और बच्चों का हाथ थाम गाँव के सफ़र पर चल दिए ! सात साल का सुरेश उत्साह से भरा दौड़ दौड़ कर आगे चल रहा था लेकिन तीन साल के गणेश को गोदी में लेकर सुरतिया के लिए जल्दी जल्दी कदम उठाना मुश्किल हो रहा था ! दीनू के पास तो कपडे लत्तों के संदूक के अलावा घर गृहस्थी के ज़रूरी ज़रूरी सामान का बोझा ही बहुत अधिक था ! कहीं किसीके पास रखने का ठिकाना नहीं था तो साथ ही ले आये ! एक ख़याल कहीं यह भी था दिल में कि अबकी बार गाँव में ही काम काज खोजने की कोशिश करेगा दीनू ! शहर में दर ब दर की ठोकरें खाने अब वह नहीं आयेगा !
कई घंटों से चलते चलते वे लोग थकान भूख और प्यास से बेहाल हो रहे थे ! साथ वाले श्रमिक काफी आगे निकल गए थे ! छोटे बच्चों के कारण इनकी रफ़्तार धीमी थी !  थोड़ा बहुत चना चबैना जो साथ लेकर चले थे अब ख़त्म हो चुका था ! पानी की बोतल भी खाली हो चुकी थी ! सुरतिया का थकान से बुरा हाल था ! घिसी पिटी चप्पल की पतली तली धधकती ज़मीन की गर्मी से ज़रा सा भी बचाव नहीं कर पा रही थी ! उसके पैर जले जा रहे थे ! गणेश थक कर सो गया था तो और भारी हो गया था ! सुरेश भी दीनू का हाथ थाम गोदी में लेने की गुहार लगा रहा था ! भूख और प्यास से सबका बुरा हाल था ! लेकिन सब चुपचाप बढ़े जा रहे थे ! जानते थे कि खाने की पोटली खाली हो चुकी है ! दीनू का मन दुःख से भरा हुआ था ! सुरतिया निढाल हो चुकी थी ! जब टाँगों ने आगे बढ़ने से बिलकुल इनकार कर दिया तो वह गणेश को लेकर सड़क किनारे की एक पुलिया पर बैठ गयी !
‘अब और न चल सकत हैं सुरेस के बापू ! कहीं ते पानी मिल जाए तो पिल्बाय दो ! छोरा को भी मुँह उतर रऔ है  !”
दीनू समझ रहा था ! सड़क पर कोई वाहन भी तो आता जाता दिखाई नहीं दे रहा था ! ना कोई पानी की प्याऊ या हैण्ड पम्प ही दिख रहा था ! कहाँ से लाये पानी ? उसने खोजी नज़रों से दूर तक निगाह दौड़ाई ! कोई बस्ती आस पास थी शायद ! दूर सड़क से लगा हुआ एक बड़ा सा मकान दिखाई दे रहा था ! कुछ आस बँधी ! कम से कम पानी तो मिल जाएगा यहाँ !
“नेक सुस्ता ले थोड़ी देर सुरतिया ! बस थोड़ा सा और चल ले ! देख उतै एक बड़ो सो मकान दिख रऔ है ! वहाँ पानी तो ई मिल जाएगो बच्चन को !”
सुरतिया ने आस भरी नज़रों से मकान की ओर देखा और हिम्मत बाँध कर उठ खड़ी हुई ! मन में कहीं उम्मीद बँधी बड़े लोगों का घर दीखता है शायद कुछ खाने को भी मिल जाए ! बच्चों ने सुबह बची खुची डबल रोटी के ही दो चार टुकड़े निगल लिए थे चाय के साथ ! भूख और धूप से चेहरा कैसा कुम्हला गया है ! सुरतिया की आँखों में पानी आ गया जिसे उसने दीनू की नज़र बचा कर अपनी धोती के पल्लू से सुखा लिया !
किसी बड़े आदमी की कोठी मालूम पड़ती थी ! बड़ा सा हरा भरा लॉन था ! गेट के पास एक छोटा सा सर्वेंट क्वार्टर भी दिखाई दे रहा था ! दीनू ने हिम्मत करके गेट का लैच खोल कर अन्दर कदम रखा ! बाहर की भीषण गर्मी से बचने के लिए शायद सब घरों के अन्दर बंद थे ! दीनू के पीछे पीछे सुरतिया भी अन्दर चली आई ! धड़कते दिल से दीनू ने दरवाज़े की घंटी दबा दी !
थोड़ी देर में दरवाज़े की बमुश्किल दो इंच की फाँक खुली और चहरे पर मास्क और आँखों पर सुनहरी फ्रेम का चश्मा चढ़ाए एक अधेड़ महिला ने बाहर झाँका ! “कौन है ? क्या काम है ?’” फिर दीनू और दीनू के पीछे सुरेश और गणेश को सम्हालती सुरतिया को देख कर वह एकदम आपे से बाहर हो गयी !
“कौन हो तुम लोग ? अन्दर कैसे आये ? यह वाचमैन क्या करता रहता है ? कोई भी घर में घुसा चला आता है इसे कुछ पता ही नहीं चलता ! चलो चलो ! पहले तो गेट से बाहर जाओ ! जो कुछ कहना है वहाँ से कहो !”
अकस्मात इस फायरिंग से दीनू और सुरतिया घबरा गए थे ! दीनू ने बड़ा साहस बटोर कर रिरियाते हुए कहा, “माँजी, छोटे छोटे बच्चा हैं साथ में ! बड़ी दूर से आये हैं ! बड़ी प्यास लगी है थोड़ा पानी मिल जाता तो बड़ी किरपा होती !”
महिला माथे पर त्यौरियाँ चढ़ा ज़ोर से दहाड़ी,  “राम सिग राम सिंग !“ हाथ में पकड़े हुए फोन से उसने कोई नंबर मिलाया ! एकदम से आउटहाउस का दरवाज़ा खुला और डंडा हाथ में सम्हाले वाचमैन भागता हुआ आया !
“आपने बुलाया मेम साब ?“
“क्या करते रहते हो तुम ? कोई भी घुसा चला आ रहा है घर में तुम्हें कुछ पता ही नहीं चलता ! निकालो बाहर इनको ! अभी सारा घर सेनीटाईज करवाया था थोड़ी देर पहले ! जाने कहाँ से चले आ रहे हैं पूरा घर सर पर उठाये ! और सीधे अन्दर तक आ गए ! तुम क्या कर रहे थे ? तुमको कैसे पता नहीं चलता है कुछ भी ? सब गंदा कर दिया ! हटाओ इन्हें यहाँ से !”
रामसिंग ने दीनू और सुरतिया को बाहर जाने का इशारा किया !
“सॉरी मेम साब गलती हो गयी ! आप आराम करिए मैं देखता हूँ इनको !” और दरवाज़ा खटाक से बंद हो गया अन्दर से ! प्यास से बेहाल सुरतिया की आँखों से आँसू बहने लगे ! सुरेश भी माँ के घुटनों से लिपट कर बिलख पडा ! दीनू अपमानित सा खडा हुआ था ! इतने बड़े घर की शरण में आया था सोचा था घड़ी दो घड़ी आराम कर लेंगे बाहर ही बरामदे में फिर चल पड़ेंगे आगे ! धूप कम हो जायेगी तो बच्चों का जी ठिकाने आ जाएगा ! लेकिन यहाँ तो पानी भी ना मिला वह तो थोड़े बहुत खाने की आस लगाए था ! उसका चेहरा उतर गया !
राम सिंग से इन लोगों की दुर्दशा देखी नहीं गयी ! वह सबको अपने कमरे में ले गया ! कमरे में पंखा चल रहा था ! इन सबको थोड़ी राहत मिली लेकिन भूख प्यास थकान और अपमान ने उनकी बोलती बंद कर दी थी !
“कहाँ जा रहे हो इतनी धूप में छोटे छोटे बच्चों के साथ ?” पानी का जग दीनू की और बढाते हुए राम सिंग ने पूछा ! राम सिंग से जग लेते हुए दीनू की आँखों में कृतज्ञता छलक उठी ! थैले से गिलास निकाल सबसे पहले उसने सुरेश को पानी दिया ! फिर सुरतिया की ओर बढ़ाया ! सबसे आखीर में उसने ओक से ही पानी पी लिया ! गणेश अभी भी बेसुध सो रहा था ! रामसिंग की सहानुभूति ने दीनू को द्रवित कर दिया ! राम सिंग के सामने उसने अपनी सारी व्यथा कथा उड़ेल दी ! पहले कोरोना की मार, कारखानों की तालाबंदी, खुद की बेरोज़गारी का आलम और फिर जब रहने और खाने पीने का भी कोई बंदोबस्त नहीं रहा तो कैसे उसने अपने गाँव लौटने का फैसला लिया सब कहानी उसे सुना दी !
पानी पीकर जी कुछ शांत हो गया था ! पंखे की हवा से कुछ शान्ति मिल गयी थी ! उसने उठने का उपक्रम किया ! लेकिन तभी राम सिंग ने उसे रोक लिया,
“अभी रुक जाओ थोड़ी देर ! घंटा दो घंटा आराम कर लो फिर चले जाना धूप भी उतर जायेगी तब तक !’”
दीनू को बाल बच्चों की भूख की चिंता सता रही थी ! राम सिंग से कैसे कहता यह बात ! लेकिन पंखे की हवा में आँखें तो उसकी भी मुँदी जा रही थीं !
“नहीं भैया ! बड़ो उपकार तुम्हारो ! पानी मिल गऔ तो प्रान मिल गए जैसे ! निकल जइहैं धीरे धीरे तो संजा तक कोई न कोई ठिकाने पहुँच ही जइहैं  ! चल सुरतिया ! ले अबकी तू ये संदूक धर ले मूड़ पे गनेसवा को मैं ले लउंगो !”
“अरे ठहरो भाई !” रामसिंग ने उसे प्यार के साथ कंधे से पकड़ कर बिठा दिया ! फिर दूसरे कमरे से एक थाली में जो कुछ भी खाने पीने का सामान उसकी रसोई में रखा हुआ था वह सब उठा लाया !
“अकेला हूँ यहाँ कोई बनाने खिलाने वाला नहीं है ! वरना तुम्हें भूखा नहीं जाने देता ! जो कुछ है वह बच्चों को खिला दो ! अच्छा हुआ आज केले बेचने वाला आ गया तो ले लिए थे मैंने ! कभी कुछ बनाने का मन ना हो तो केले से बड़ा सहारा हो जाता है !“ रामसिंग ने हँसते हुए कहा ! अब तक दीनू भी नॉर्मल होता जा रहा था ! थाली में ६-७ केले, एक बड़ी ब्रेड, एक अचार की शीशी और उबले आलू की सूखी सब्जी रखी हुई थी ! पोलीथीन की एक थैली में कुछ मीठे बिस्किट भी थे ! दीनू संकुचित हो गया !
“भैया, ऐसो लगत है आप तो सबई उठा लाये चौका से हमरे काजे ! फिर आप का खाई हो संजा को ?”
“अरे तुम इसकी फिकर ना करो ! हम तो यहीं रहते हैं हम सब इंतजाम कर लेंगे ! पहले तुम लोग खा लो ! मैं देखता हूँ कुछ और मिल जाए तो !”
“अरे नहीं भैया ! जे तो भोत है हम सबके काजे ! आप बैठो अब ! हुई जईहै सबको काम इसीमें !” शरमाते सकुचाते सबने भर पेट खाना खा लिया ! सुरतिया खाना खाने के बाद एक कोने में लुढ़क गयी थी ! दीनू राम सिंग के साथ अपने सुख दुःख बाँट रहा था ! सुरेश गणेश के साथ मस्ती कर रहा था ! राम सिंग को अपने कमरे में होने वाली यह रौनक अच्छी लग रही थी कि उसके फोन की घंटी घनघना उठी !
“जी मेम साब आया अभी !”
मालकिन का फोन आ गया था ! दरवाज़ा खुलते ही सुरेश ने भी बाहर दौड़ लगा दी ! मेम साहब की दहाड़ फिर सुनाई दी !
“राम सिंग, ये भिखमंगे यहाँ क्या कर रहे हैं ! गये नहीं अभी तक ? क्या करते रहते हो तुम ? कोई काम नहीं होता तुमसे ठीक से !”
दीनू का कलेजा काँप गया कि तभी राम सिंग की आवाज़ आई !
“मेम साब ! हमारी शरण में आये थे तो ऐसे कैसे भगा देता ! प्यासे को पानी और भूखे को रोटी ना दो तो अगले कई जन्मों तक भगवान् हमें भी भूखा प्यासा रखता है धरती पर ऐसा शास्त्रों में लिखा है ! एक बार कथा सुनाते वक्त पंडित जी ने बताया था गाँव में !”
दीनू ने अपनी रिसती हुई आँखों पर गमछा रख लिया था !


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद



Wednesday, June 12, 2019

जीवन चक्र


शहर की सुन्दर सी कॉलोनी में मलिक साहेब की बड़ी सी कोठी थी और उस कोठी में अमलतास का एक बहुत बड़ा हरा भरा और सुन्दर सा पेड़ था ! उस पेड़ पर एक प्यारी सी बया रहती थी ! बया रानी दिन भर मेहनत करती ! अमलतास के पेड़ पर अपना खूबसूरत घरौंदा बनाने के लिये अनगिनत घास पत्ते और तिनकों में से चुन-चुन कर सबसे बेहतरीन तिनके वह बटोर कर लाती ! अंदर से उसे इतना मुलायम, चिकना और आरामदेह बना देती कि उसके सुकुमार अण्डों को कोई नुक्सान न पहुँचे और उसके नन्हे-नन्हे चूज़े एकदम सुरक्षित माहौल में इस संसार में अपनी आँखें खोल सकें ! कड़ी मेहनत से बनाया हुआ उसका घोंसला लगभग तैयार हो चुका था ! आज वह आख़िरी चंद तिनके अपनी चोंच में दबा कर लाई थी कि अपने घोंसले को अंतिम रूप दे सके ! संध्या के समय श्रांत क्लांत जब वह अमलतास तक आई तो उसके दुःख का कोई पारावार न था ! दुष्ट बन्दर ने उसका मेहनत से बनाया हुआ खूबसूरत घोंसला तिनका-तिनका बिखेर कर ज़मीन पर फेंक दिया था ! 

सारी रात बया दुःख में डूबी रही लेकिन सुबह होते-होते उसने किसी तरह सब्र कर लिया ! जीवन गीत गुनगुनाते हुए अगले दिन से नीड़ के निर्माण के लिये तिनके जोड़ने का बया का सिलसिला एक बार फिर नये सिरे से आरम्भ हुआ ! कमर कस कर बया ने फिर से तिनके बटोरना शुरू किये और एक बार फिर कड़ी मेहनत कर अपना घोंसला दोबारा तैयार कर लिया ! लेकिन कहते हैं ना – ‘अपने मन कछु और है कर्ता के कछु और !’ इस बार घर के मालिक मलिक साहेब ने पेड़ को सुन्दर आकार देने के लिये कुछ डालियाँ कटवा दीं और उन डालियों के साथ बया का घोंसला भी कूड़े के ढेर पर पहुँच गया ! 

इस बार बया ने अमलतास के सघन हिस्से में अपना घोंसला बनाने का निश्चय किया ताकि उसे कोई देख न पाए और वह अपने अंडे उस घोंसले में निश्चिन्त होकर दे सके ! रोज़ चहचहाते गीत गुनगुनाते वह फिर से नये जोश के साथ घोंसला बनाने में जुट गयी ! ईश्वर का धन्यवाद कि इस बार उसका घोंसला भी ठीक से बन गया और उसके अंडे भी उसमें सुरक्षित बच गये ! अब बया को नयी चुनौती का सामना करना था ! उसे अपने चूजों की रक्षा कौओं, बिल्ली, बन्दर और चील से करनी थी ! उसे रोज़ उनके लिये दाना खोज कर लाना होता था और उन्हें सबकी नज़र से बचा कर धीरे-धीरे उड़ना भी सिखाना होता था ! बया दिन भर मेहनत करती ! कभी बच्चों की चोंच में दाना डाल उन्हें खाना खिलाती ! कभी दुष्ट कौए और चील को घोंसले के करीब आते देख खदेड़ कर भगाती तो कभी बन्दर और बिल्ली से पंगा लेकर अपने बच्चों की हिफाज़त करती ! लेकिन सुबह शाम बहुत तल्लीन होकर वह अपना जीवन गीत ज़रूर गाती और अपने बच्चों को भी खूब दुलारती !

बच्चे अब बड़े हो गये थे ! बया रानी रोज़ की तरह अपने बच्चों के लिये दाना लाने गयी थी ! शाम को जब वह अपने घर लौटी तो घोंसला खाली था ! उसके सारे बच्चे उड़ गये थे अपने हिस्से का आसमान ढूँढने के लिये ! बया हतप्रभ थी, उदास थी, दुखी थी और बिलकुल अकेली थी ! आशंका थी इस बार बया यह सदमा झेल नहीं पायेगी लेकिन अगली सुबह उसके घरौंदे से रोज़ की तरह फिर से उसी मीठी आवाज़ में जीवन गीत की मधुर ध्वनि सुनाई दे रही थी ! 

जितनी सहजता से निस्पृह होकर ये पंछी अपने इस जीवन चक्र को आत्मसात कर लेते हैं हम मानव क्यों नहीं कर पाते ?


साधना वैद

Tuesday, June 27, 2017

नई फ्रॉक





‘अम्मी चल ना बाहर ! देख कितनी सुन्दर, चमकीली, सोने चाँदी के तारों से कढ़ी फराकें ले के आया है फेरी वाला ! मुझे भी दिला दे न एक ! मामू की शादी में मैं भी नई फराक पहनूँगी !’ 
छ: बरस की करीना की आँखों में हसरत भी थी और चमक भी ! फेरी वाले की छड़ी पर टँगी रंग बिरंगी फ्रॉकें उसकी नज़रों के सामने से हट ही नहीं रही थीं ! बर्तन माँज कर हाथ धोती बानो की पीठ पर वह झूल गयी ! बानो का दिल मसोस उठा ! जानती थी खूब मोल भाव करने के बाद भी फ्रॉक अस्सी नब्बे से कम में न आयेगी और उसके डिब्बे में इस वक्त सिर्फ तीस रूपए पड़े हैं और घर गृहस्थी की तमाम ज़रूरतें मुँह बाये सामने खड़ी हैं ! लेकिन साथ ही यह भी जानती थी मना कर देगी तो करीना रो रोकर घर सर पर उठा लेगी ! फिर कुछ देर को झूठा ही सही थोड़ा शगल तो हो ही जाएगा जब वह अपनी ज़मीनी हकीकत से ऊपर उठ कर एक खरीदार बन जायेगी और फेरीवाला हर तरह से उसको खुश करने की कोशिश में जुट जाएगा ! दुपट्टे से हाथ पोंछती वह उठ खड़ी हुई, “जा नूरी को बुला ला ! देखें कैसी फराकें लाया है फेरी वाला !”
करीना की फरमाइश पर कोई ध्यान दिए बिना उसके दोनों भाई अजलू फजलू अभी तक मज़े से कंचों से खेल रहे थे ! बहन का रोना धोना जिद करना तो रोज़ का तमाशा है ! अभी कस के अम्मी की डाँट पड़ेगी तो या तो थोड़ी देर रिरिया कर सो जायेगी या झुग्गी के बाहर जाकर मोहल्ले की लड़कियों के संग इक्कड़ दुक्कड़ खेलने में रम जायेगी ! लेकिन अम्मी को खरीदारी के मूड में देख दोनों चौकन्ने हो गए ! यह क्या बात हुई ! करीना की फराक आयेगी तो उनको भी तो नयी कमीज़ चाहिए ! शादी तो उनके मामू की भी है ! दोनों चुप थे ! जानते थे कि ज़रा भी मुँह खोला तो अम्मी की आवाज़ बाद में निकलेगी और तमाचों से गाल पहले लाल हो जायेंगे ! दोनों भाई करीना के साथ बाहर निकल गए ! मन में उम्मीद भी थी कि हो सकता है फेरी वाले के पास कमीजें भी हों ! 
करीना दौड़ के नूरी को बुला लाई ! फेरी वाला झुग्गी के बाहर ही खड़ा आवाज़ लगा रहा था ! शहर की सीमा से लगी सैकड़ों झुग्गियों की इस बस्ती में हसरत भरी निगाहों से देखने वाले तो बहुत मानुस थे लेकिन खरीदार कोई नहीं था ! बानो और नूरी को आता देख फेरी वाले की आँखों में चमक आ गयी ! करीना जिस तरह सुन्दर फ्रॉक देख लालसा से भरी अन्दर भागी थी उसे उम्मीद हो गयी थी कि आज उसकी बोहनी ज़रूर हो जायेगी ! फेरी वाले की छड़ी में फ्रॉक्स के अलावा लहँगे, सलवार सूट, स्कर्ट टॉप और भी कई ड्रेसेज थीं ! बानो और नूरी का चेहरा भी उन्हें देख कर चमकने लगा ! मन कर रहा था अपने लिए भी एक दो सूट खरीद लें ! लेकिन पर्स की जमा पूँजी का ख्याल आते ही वह धरातल पर आ गयी ! चहरे पर रूखाई और आवाज़ में खुरदुराहट लाकर उसने फेरी वाले से कहा, 
“दिखाओ ज़रा कैसी फराके हैं ! हम भी तो देखें ! कैसी दी हैं ? ठीक दाम बताना !” 
“मैं कभी ग़लत बताता हूँ जो आज बताउँगा ! आप पसंद तो कर लो पहले ! दाम भी ठीक ही लगा दूँगा !” फेरी वाला पक्का सौदेबाज़ था ! बानो ने एक फ्रॉक निकलवाई ! क्रीम कलर की नेट का घेर था और काले रंग की जैकेट पर बड़े सुन्दर सुनहरी फूल कढ़े थे ! करीना के कन्धों से लगा साइज़ नापते हुए बानो ने पूछा. 
“यह कितने की है ?” पिंडलियों से भी लम्बी मैली कुचैली फ्रॉक से लगी वह खूबसूरत नयी फ्रॉक टाट में मखमल के पैबंद का आभास दे रही थी ! 
“यह है तो दो सौ रुपये की लेकिन सुबह का वक्त है ! बोहनी का टाइम है आप दस पंद्रह रुपये कम दे देना !” 
“पागल समझ रखा है क्या हमें !” बानो के चहरे पर एक पक्के खरीदार वाला रुआब आ गया ! फ्रॉक फेरी वाले को पकड़ाते हुए वह तुनक कर बोली, “ऐसा तो घटिया कपड़ा लगाया है कि एक ही धुलाई में छेद हो जायेंगे और कढाई भी कैसी खराब है ! इससे अच्छी तो हम घर में काढ लें ! उस पर ऐसे अनाप शनाप दाम बता रहे हो ! रहने दो तुम !” इस दमदार तक़रीर के बाद अपनी बात के समर्थन के लिए उसने नूरी की ओर देखा ! 
नूरी फेरी वाले की छड़ी से उतार-उतार कर अपने नाप का सूट देख रही थी ! 
“देखना बानो यह कैसा लग रहा है ?” फिर बानो की बात का समर्थन करते हुए उसकी ओर देखे बिना ही दूसरा सूट छडी से उतारते हुए बोली, “और क्या सही तो कह रही हो ! शहर की दूकान पर देखी थीं मैंने ! वहाँ ऐसी फराकें सौ सौ की मिल रही थीं !” बानो ने कस के उसका हाथ दबाया ! मन ही मन डर गयी थी कि अगर सौ रुपये में राजी हो गया तो कहाँ से लायेगी सौ रुपये वह ! नूरी की बात पलटते हुए वह बोली, 
“वह तो इनके मुकाबले में बहुत बढ़िया थीं ! इनका तो कपड़ा भी हल्का है ! रंग भी कच्चे लगते हैं ! एक ही धुलाई में उतर जायेंगे तो सारे पैसे बेकार हो जायेंगे ! रहने भैया तुम जाओ हमें नहीं लेना !”
“कैसी बात कर रही हो बहन ! सारे बाज़ार में ऐसा माल कहीं नहीं मिलेगा ! यही फराक बड़ी दूकान पर कोई चार सौ से कम में दे दे तो अल्ला कसम यह काम छोड़ दूँगा ! बोहनी का टाइम है इसलिए मैंने अपना नफ़ा भी छोड़ दिया है ! चलो न आपकी न मेरी आप एक सौ पचत्तर दे देना ! अब तो ठीक है ?”
बानो और नूरी के चहरे पर जीत की चमक दिखी ! अजलू फजलू का चेहरा आवेश से तमतमाने लगा ! फेरी वाले के पास केवल लड़कियों के कपडे थे ! लड़को के नहीं ! बानो ने दूसरी लाल फ्रॉक छड़ी से उतार कर करीना के कंधे से नापी ! अपने साइज़ से बहुत बड़ी मैली कुचैली सी एक नीली फ्रॉक बदन पर चढ़ाए हर वक्त घूमने की आदी करीना ने जब इतनी सुन्दर लाल फ्रॉक देखी तो उसकी आँखें उम्मीद और उल्लास से चमकने लगीं ! दोनों भाई रुआँसे हो गए ! 
“इसका क्या दाम है ?” बानो ने इशारों इशारों में नूरी की राय पूछी ! नूरी ने भी अपनी सहमति जताई ! 
“आप इसके एक सौ साठ दे देना ! है तो यह भी दो सौ की ही ! बस बात यह है कि जैसी आपकी बेटी वैसी मेरी बेटी ! इसीलिये आपको बिलकुल घर के दाम बता रहा हूँ !” 
“चलो रहने दो ! हमीं मिले हैं बेवकूफ बनाने के लिए क्या ! जितने दाम तुम बोल रहे हो इतने में तो ऐसी चार फराकें आ जायेंगी ! तुम जाओ ! हमको नहीं लेना है !” बानो ने फ्रॉक लौटाते हुए कहा ! लेकिन जो लफ्ज़ उसके मुँह से निकल रहे थे दिल उनका साथ नहीं दे रहा था ! छड़ी से उतार-उतार कर वह हर ड्रेस करीना के कन्धों से लगा कर नाप रही थी ! और करीना को इस वक्त जो खुशी मिल रही थी उसका अहसास इतने वर्षों में उसने पहले कभी नहीं किया था ! उसे भरोसा हो चला था कि इतने सारे कपड़ों में से कोई न कोई फराक तो अम्मी उसे दिला ही देगी ! 
“अरे कैसी बात कर रही हो बहन ! आप बताओ तो क्या दोगी ! बच्ची का दिल टूट जाएगा !” घाघ फेरी वाले ने अब करीना को हथियार बनाया, “बोल बेटा कौन सी फराक पसंद है तुझे लाल कि पीली ?”
करीना ने लाल फ्रॉक ले ली और सर में डालने लगी ! बानो ने झट से उसके हाथ से फ्रॉक खींचते हुए कहा, 
“मैं तो पचास से ज्यादह नहीं दूँगी ! तुम्हें देना है तो दे जाओ ! नहीं तो तुम्हारे जैसे बीसियों फेरी वाले रोज़ आते हैं !” मन ही मन वह घबरा भी रही थी कि फेरी वाला कहीं मान ही न जाए ! उसके डिब्बे में तो पचास रुपये भी नहीं हैं ! 
“अब ऐसे तो न बोलो बहन ! पचास रुपये में तो आजकल एक रूमाल भी नहीं आता है बड़े शहरों में ! बोहनी का टाइम है ! चलो पहली फराक घाटे में ही सही ! बहन सौ बात की एक बात है आख़िरी दाम लगा रहा हूँ आप एक सौ बीस रुपये दे देना !“ फेरी वाले ने फ्रॉक करीना के हाथों में पकडा दी ! 
करीना खुशी से उछल रही थी ! अजलू फजलू की आँखों में आँसू आ गए थे ! बानो और नूरी सकते में थीं ! खरीदारी का सारा जोश ठंडा हो गया था ! इस चक्रव्यूह से कैसे निकलें रास्ता नहीं मिल रहा था ! 
बानो जोर से चिल्लाई, “ अरे तुम तो सिर पर ही चढ़े जा रहे हो ! कह दिया ना पचास से ज्यादह नहीं देंगे ! देना हो तो दे दो नहीं तो अपना रास्ता नापो ! फालतू बखत नहीं है हमारे पास ! और भी बहुत सारे काम पड़े हैं करने को !” 
बानो के बदले सुर ने फेरी वाले को नाउम्मीद कर दिया ! करीना के हाथ से फ्रॉक ले उसने हैंगर में लगा छड़ी पर टाँग दी, “जब लेना ही नहीं था तो हमारा टाइम क्यों खोटी किया इतना !” चेहरे पर खीज उतर आई थी और आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था ! थोड़ी देर पहले की व्यवहार की आत्मीयता और वाणी की कोमलता अब तिरोहित हो चुकी थी ! छड़ी से उतारे गए कपड़ों को वह जल्दी-जल्दी करीने से हैंगर में लगाता जा रहा था ! उसके मन का आक्रोश अब जुबाँ से भी फूट रहा था, “इतनी देर मोल भाव किया और कुछ भी नहीं लिया ! किसी दूसरे मोहल्ले में जाता तो अभी तक तो आधे कपड़े बिक गए होते मेरे !” झल्लाते हुए वह आगे को चल दिया ! नूरी भी मन मसोसते हुए अपने घर को चल दी ! 
करीना की आँखों से आँसू बह रहे थे ! अजलू फजलू के चहरे पर संतोष का भाव था और बानो का कलेजा दुःख से फटा जा रहा था ! आँखों के सामने से वो सुन्दर फ्रॉकें हट ही नहीं रही थीं ! अपने ज़रा से शगल के लिए उसने बच्चों का दिल दुखाया इसका भी पछतावा था ! करीना अपने जिस्म पर उन सुनहरी रुपहली नयी-नयी फ्रॉक्स के स्पर्श को याद कर देर तक सुबकती रही ! लेकिन मन में कहीं हल्की सी खुशी भी थी कि नई फ्रॉक न मिली तो न सही इतने अच्छे नए-नए कपड़े कम से कम उसके जिस्म से छुले तो सही वरना तो उसे हमेशा उतरन में मिली औरों की फटी पुरानी घिसी पिटी फ्रॉकें ही अब तक पहनने को मिलती रही हैं जो या तो साइज़ में बहुत बड़ी होती हैं या बहुत छोटी !
साधना वैद

Thursday, November 1, 2012

जो भरा नहीं है भावों से.......




नवम्बर का महीना आते ही बाल दिवस याद आने लगता है और बच्चों का ख़याल आते ही उनके भोले मासूम हृदय और कोरे कागज़ से साफ़ सुथरे मन मस्तिष्क का स्मरण हो आता है जिस पर आज हम जो इबारत लिख देंगे वह जीवन पर्यंत उनके हृदय पटल पर अमिट रूप से अंकित हो जायेगी ! इसीलिये बच्चों को जितनी अच्छी शिक्षा और संस्कार बचपन में मिल जाते हैं वह संपदा उनके लिये एक अनमोल धरोहर की तरह हमेशा उनके पास संचित रहती है ! इसी आशय को मूल में रख कर किशोरों के लिये एक कहानी लिखी थी बहुत पहले इसे आज आप सबके साथ शेयर करना चाहती हूँ ! इसे पढ़िए और अपनी प्रतिक्रिया से मुझे अवश्य अवगत कराइए ! आपकी टिप्पणियों की मुझे प्रतीक्षा रहेगी !  


 बरगद के नीचे के चबूतरे पर श्याम चिंताग्रस्त बैठा था ! घर जाने की उसकी इच्छा ही नहीं हो रही थी ! किसी काम में मन नहीं लग रहा था ! माँ ने ग्रामसेविका ललिता दीदी के यहाँ से बुनाई के लिये ऊन ले आने को कहा था लेकिन श्याम वह भी लेकर नहीं आया था ! घर जायेगा तो माँ भी डाटेगी ! आज तो वह बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने भी नहीं गया ! कल शाम से जब से उसने बापू और हरिया की बातें सुनी थीं तब से किसी अनहोनी की आशंका से उसका दिल काँप रहा था ! वह बड़ी उलझन में था और समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या करना चाहिये ! उसके मन में अनवरत संघर्ष चल रहा था और वह किसी भी नतीजे पर नही पहुँच पा रहा था ! स्कूल में टीचर जी ने सिखाया था ---



जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं !



आर्थिक तंगी की वजह से तीन साल हो गये थे श्याम का स्कूल छूटे हुए पर मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियाँ उसके मन पर आज भी अंकित थीं ! 
बापू यह क्या करने जा रहे हैं हरिया के साथ मिल कर ! श्याम ने ठीक से देखा था हरिया ने बापू को गमछे में लिपटा हुआ कुछ सामान दिया था और कहा था ,

सम्हाल के रखना दीना ! किसीकी नज़र ना पड़े ! १५ तारीख को स्कूल में जलसा है ! स्मिथ साहेब खास मेहमान बन के आने वाले हैं ! तुम मौक़ा देख कर उनकी कुर्सी के नीचे इसे रख देना ! तुम तो वैसे भी स्कूल में साफ़ सफाई का काम ही करते हो ! तुम पर कोई शक नहीं करेगा ! एक ही बार में सारे क्रिस्तानियों का सफाया हो जायेगा ! जब से ये गाँव में आये हैं यहाँ का रंग ढंग ही बदल गया है ! और तुम्हें भी कहीं और काम नहीं मिला जो इन क्रिस्तानियों के स्कूल में ही नौकरी कर ली ?
हरिया की बातों से घोर घृणा टपक रही थी ! दीना ने सर हिला कर सहमति जताई और गमछे में लिपटे सामान को सम्हाल कर टीन के संदूक में रख दिया !
चौदह वर्षीय श्याम इतना तो समझ गया था कि गमछे में लिपटी हुई वस्तु शायद बम ही है ! आजकल अखबारों में, टी वी में, रेडियो में हर वक्त यही सब तो आता रहता है ! कहीं बस में बम फट गया तो कहीं रेल में बम फट गया, कहीं भीड़ भरे बाज़ार में बम फट गया तो कहीं किसी मंदिर या मस्जिद में फट गया ! नतीजतन  कई लोग मर गये कई लोग घायल हो गये और कई छोटे-छोटे मासूम बच्चे अनाथ हो गये ! श्याम पहले सोचता था भला कौन करता होगा ऐसे काम ? उसे क्या भगवान से डर नहीं लगता ? अनजान लोगों से भला उसकी क्या दुश्मनी होती होगी ? इतने लोगों को मार कर उसका क्या भला होता होगा ? लेकिन श्याम के मन में उठते ये सवाल मन में ही घुट कर रह जाते ! जब वह स्कूल जाता था तो टीचर जी उसके सारे सवालों के जवाब बड़े प्यार से देती थीं ! श्याम को वे बहुत प्यार करती थीं ! श्याम भी उनकी बहुत इज्ज़त करता था ! पढ़ने में भी श्याम बहुत होशियार था ! वह तो आगे और भी पढ़ना चाहता था लेकिन घर की आर्थिक तंगी ने उसकी शिक्षा के क्रम पर पूर्णविराम लगा दिया ! श्याम की किस्मत तो फिर भी अच्छी थी कि वह कम से कम पाँचवी क्लास तक तो स्कूल में पढ़ लिया उससे छोटे उसके तीनों भाई बहनों ने तो कभी स्कूल का मुँह तक नहीं देखा था !  
श्याम के मन की उथल-पुथल बढ़ती ही जा रही थी ! अजीब सी उलझन में फँस गया था वह ! स्मिथ साहेब गाँव के सबसे बड़े पुलिस ऑफीसर हैं ! गाँव में कोई भी कार्यक्रम हो या किसी स्कूल में कोई जलसा हो उन्हें ही मुख्य अतिथि बनाया जाता है ! अंग्रेज़ी स्कूल तो दो साल पहले ही खुला है गाँव में ! इससे पहले तो सभी बच्चे पुराने वाले हिन्दी स्कूल में ही पढ़ते थे ! स्मिथ साहेब की बेटी मेरी भी श्याम की क्लास में पढ़ती थी ! बिलकुल सोने जगने वाली गुड़िया की तरह सुन्दर थी मेरी ! गोरी इतनी कि हाथ लगे मैली हो जाये ! उसकी नीली-नीली आँखें बिलकुल परी जैसी लगती थीं ! स्कूल के जलसे में बिलकुल सही और पूरा राष्ट्रीय गान गाने पर स्मिथ साहेब ने श्याम को अपने पास से प्रोत्साहन पुरस्कार भी दिया था जिसे अभी तक बहुत सम्हाल कर श्याम ने अपने बक्से में रखा हुआ है !
बापू ने क्या हरिया के साथ मिल कर इन्हीं स्मिथ साहेब को मारने का प्लान बनाया है ? श्याम बहुत उद्विग्न था ! क्या करे कुछ समझ नहीं पा रहा था ! अगर स्मिथ साहेब के पास जाकर सब कुछ सच-सच बता देता है तो बापू पकड़े जायेंगे और उन्हें जेल हो जायेगी ! फिर पुलिस वाले अपराधियों को कितनी बेरहमी से मारते हैं ! श्याम बापू की पिटाई की कल्पना से सिहर उठा ! माँ भी रो-रो कर बेहाल हो जायेगी ! घर का खर्च कैसे चलेगा ! बापू की थोड़ी सी तनख्वाह से क्या होता है ! माँ भी दिन रात काम करती है ! बाहर तीन चार घरों में साफ़ सफाई का काम करती है, फिर घर पर आकर घर का सारा काम करती है ! इस सबके बाद जो थोड़ा बहुत समय बचता है उसमें ग्राम सेविका जी के यहाँ से ऊन लाकर छोटे बच्चों के कपड़े बुन कर उन्हें देती है ! कुछ आमदनी उससे भी हो जाती है !
अगर बापू को पुलिस पकड़ कर ले गयी तो माँ तो रो-रो कर ही मर जायेगी ! फिर तो हम सब अनाथ हो जायेंगे ! श्याम की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे ! कल्पना में वह स्वयं को गाँव की गलियों में असहाय निरुपाय भटकता देख रहा था ! लेकिन अगले ही पल उसकी कल्पना के घोड़े सरपट दौड़ते हुए स्कूल पहुँच गये जहाँ बम के धमाके के बाद भीषण चीख पुकार मची हुई थी ! आसमान में काला धुआँ छाया हुआ था ! स्कूल परिसर में बहुत सारे बच्चे लहुलुहान फूलों की टूटी हुई पंखुरियों की तरह यहाँ-वहाँ बिखरे पड़े थे ! कई लोगों के विस्फोट से चीथड़े उड़ गये थे तो कई आख़िरी साँसें गिन रहे थे और कई बेजान पड़े थे ! इन्हीं लाशों के बीच श्याम ने रक्तरंजित मेरी को भी तड़पते हुए देखा ! वह सर से पाँव तक थर-थर काँप रहा था !
नहीं ऐसा नहीं हो सकता ! मैं अपने जीते जी ऐसा कभी नहीं होने दूँगा ! श्याम का मन कुछ स्थिर हुआ ! अगले ही पल वह खुद ब खुद पुलिस स्टेशन की ओर बढ़ चला ! उसकी आँखों में संकल्प की चमक थी, कदमों में दृढ़ता और मन में टीचर जी की सिखाई पंक्तियाँ गूँज रही थी ....

जो भरा नहीं है भावों से
बहती जिसमें रसधार नहीं
वह हृदय नहीं है पत्थर है
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं !


साधना वैद