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Tuesday, July 5, 2016

पेड़ का दर्द



अभी तो खड़ा हूँ
 अभी तो हरा हूँ  
अनगिनत पंछियों का
बसेरा खरा हूँ  !
लगाया था बाबा ने
मुझको तुम्हारे
हज़ारों ने खाए
मधुर फल हमारे !
हर इक शाख ने थामे  
झूले तुम्हारे
हर इक गीत पर
पात बजते हमारे !
मैं दादी से पोती
झुलाता रहा हूँ
मैं गीतों में हर दुःख
भुलाता रहा हूँ !
सम्हाला जतन से
न गिरने दिया है 
छिली बाँह का दर्द
 चुप हो पिया है !  
मेरी छाँह में सोये
जी भर मुसाफिर
हों बंदे खुदा के या
हों चाहे काफिर !
मैं सबको मधुर फल
खिलाता रहा हूँ  
मैं पत्तों से पंखा
झुलाता रहा हूँ !
न माँगा किसीसे
कभी कुछ भी मैंने  
न पाया किसीसे
कभी कुछ भी मैंने !
फिर क्यों आज आये
मुझे तुम गिराने
मेरी ऊँची हस्ती को
भू पर लिटाने !
कहाँ जायेंगे सारे
पंछी बेचारे
रहेंगे जहाँ में
 कहाँ ग़म के मारे !
ना झूले पड़ेंगे
ना गूँजेगी कजरी
हवा बंद ठण्डी 
कड़ी धूप ठहरी ! 
लिटा दो मुझे
काट डालो धरा पर 
मिलेगी न छाया
न होंगे मधुर फल !
ज़रा कुछ तो सोचो
किया क्या है मैंने
इस खुदगर्ज़ जग से
लिया क्या है मैंने !
यही इस जहाँ का
है दस्तूर प्यारे
  मिले जिससे जी भर  
उसे जग ये मारे !
  

साधना वैद