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Thursday, July 17, 2014

प्रेमगीत



मेघों ने गुनगुना कर
हवा के लहराते आँचल पर
पानी की सियाही से
एक मधुर सा
प्रेमगीत लिख दिया है !
उत्फुल्ल धरा ने
उल्लसित हो
अपने रोम-रोम में इस
प्यार भरी इबारत को
आत्मसात कर लिया है !
बारिश के इस प्रेमगीत ने
आकुल धरा पर जैसे
जादू सा कर दिया है !
बूंदों के स्नेहिल स्पर्श की
प्यार भरी थपकी से 
उसका म्लान मुख
पल भर में ही
पुलकित हो उठा है !
नवोढ़ा अभिसारिका
की तरह वह
सोलह श्रृंगार कर
और चमचमाती
धानी चूनर ओढ़  
अपने प्रियतम की
प्रतीक्षा में
सजने संवरने लगी है !
इस प्रेम गीत की
मधुर लय पर
सारी सृष्टि ही जैसे
थिरकने लगी है !

साधना वैद


Friday, July 4, 2014

सावनी ताँका



बरस गयी
सावन की फुहार
अलस्सुबह,
भिगो गयी बदन
   सुलगा गयी मन ! 




झाँक रहा है
बादल की ओट से
नन्हा सूरज,
बाहर कैसे आऊँ 
कहीं भीग न जाऊँ !



भाग रहे थे
श्वेत श्याम बादल
आ जाये हाथ 
धरा माँ का आँचल
   ना मिला तो रो पड़े ! 



सुहावनी है
सावन की बयार
लाती है साथ 
मधुरिम पलों की
स्मृतियाँ बारम्बार !




याद आता है
बारिश में भीगना
चलते जाना
नर्म गीली दूब पे
पाँव थकने तक !


साधना वैद 

Tuesday, May 14, 2013

बादल तेरे आ जाने से ...






बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है,
मुझको जैसे कोई अपना,
 कुछ कहने को मिल जाता है !

पहरों कमरे की खिड़की से
तुझको ही देखा करती हूँ ,
तेरे रंग से तेरे दुःख का
अनुमान लगाया करती हूँ !
यूँ उमड़ घुमड़ तेरा छाना
तेरी पीड़ा दरशाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

तेरे हर गर्जन के स्वर में
मेरी भी पीर झलकती है,
तेरे हर घर्षण के संग-संग
अंतर की धरा दरकती है !
तेरा ऐसे रिमझिम रोना
मेरी आँखें छलकाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

कैसे रोकेगा प्रबल वेग
इस झंझा को बह जाने दे ,
मत रोक उसे भावुक होकर
अंतर हल्का हो जाने दे !
धरिणी माँ का आकुल आँचल
व्याकुल हो तुझे बुलाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

हैं यहाँ सभी तेरे अपने
झरने, नदिया, धरती, सागर ,
तू कह ले इनसे दुःख अपना
रो ले जी भर नीचे आकर !
तेरा यूँ रह-रह कर रिसना
इन सबका बोझ बढ़ाता है
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

तेरे आँसू के ये मोती
जब खेतों में गिर जायेंगे ,
हर एक फसल की डाली में
सौ सौ दाने उग जायेंगे !
धरती माँ का सूखा आँचल
तेरे आँसू पी जाता है !
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है ,
मुझको जैसे कोई अपना
   कुछ कहने को मिल जाता है !  

साधना वैद