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Monday, July 6, 2015

विनती सुनो मोरी ( बाल गीत )





तिनका-तिनका चुन कर मैंने
एक बनाया सुन्दर नीड़
नोंच-नोंच कर फेंका तुमने
और बढ़ाई मेरी पीर !

मेरा सुख संसार रौंद कर
बोलो तुम क्या पाओगे ,
मेरे बच्चों के रोदन से
क्या तुम पिघल न जाओगे ?

काठ काँच के नकली पंछी
क्यों तुमको ललचाते हैं
उनके नकली रूप रंग से
क्यों सब भरमा जाते हैं ! 

घर के हर कोने-कोने में
उन्हें सजा कर रखते हो’
लेकिन जीवित विहग वृन्द को
दूर भगाते रहते हो ! 

है तुमको यदि प्यार प्रकृति से  
हमको भी बस जाने दो
अपने घर आँगन में हमको
जी भर कर कुछ गाने दो ! 

द्विगुणित हो जायेगी शोभा
खिल जाएगा घर संसार
मेरी मधुरिम स्वर लहरी से
होगा प्राणों में संचार ! 

सर्वश्रेष्ठ रचना हो प्रभु की
फिर क्यों छोटा हृदय प्रदेश
वृहद् विशाल तुम्हारे घर में  
वर्जित है क्यों हमें प्रवेश ?

साधना वैद














Saturday, July 20, 2013

प्रकृति हमारी माता है !



पर्वत, बादल, झरने, तरुवर,
हवा, फूल, धरती, सागर ,
ये कितना कुछ देते हमको
हैं सारे गुण की गागर !

अटल अडिग निश्चय पर रहना
पर्वत हमें सिखाते हैं ,
बादल हर कर ताप जगत का
रिमझिम जल बरसाते हैं !

कल-कल-कल झरनों के स्वर से
वादी में गूँजे संगीत ,
पात हिला कर करतल ध्वनि से
वृक्ष जताते अपनी प्रीत !

मंद सुगन्धित मलय पवन का
झोंका जब-जब आता है ,
फूलों के भीने सौरभ से
सबका मन हर्षाता है !

त्वरित उर्वरा धरती माता
प्रति पल फसल उगाती है ,
देकर दान अन्न और फल का
सबकी भूख मिटाती है !

दुनिया के हर जन की पीड़ा  
अंतर में हम भर पायें ,
सागर सी गहराई को यदि
आत्मसात हम कर पायें !

कितना कुछ पाते हम प्रकृति से
प्रकृति हमारी माता है ,
इसकी रक्षा करनी है यह
सबकी जीवन दाता है ! 

साधना वैद