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Sunday, May 5, 2013

हर शाख पे उल्लू बैठा है.......




इकबाल का एक शेर है –

बर्बाद गुलिस्तां करने को तो एक ही उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा !

भारतीय राजनीति के फलक पर यह शेर इन दिनों बिलकुल सटीक बैठता है ! घोटालों की लंबी फेहरिस्त में आज एक और नया नाम जुड़ गया है रेल गेट घोटाला ! यू पी ए 2 में तो घोटालों की बरसात थमने का नाम ही नहीं ले रही है ! हमारे विश्वप्रसिद्ध मौनी बाबा अर्थशास्त्री, जिनकी ईमानदारी का डंका भी बड़ी ज़ोर से पीटा जाता था, उन्होंने अपने देश को दस सालों में दिवालिया बना कर विश्व प्रसिद्ध घोटालेबाज और बेईमान देशों की सूची में सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दिया ! 

भ्रष्टाचार निवारण के सन्दर्भ में बहुत से भ्रम और उम्मीदें अब चकनाचूर हो चुकी हैं ! सोचा था देश में शिक्षा के प्रसार के बाद जब पढ़े लिखे नेता राजनीति में आयेंगे तो इस दुखी और दीन हीन देश के आँसू पोंछेंगे और कष्टों को कम करेंगे ! परन्तु हुआ क्या ? जितना उच्च शिक्षित और प्रोफेशनल नेता उतना ही बड़ा घोटाला ! घोटालों के नाम गिना कर आपका अमूल्य समय बर्बाद करना नहीं चाहती ! बच्चे-बच्चे की ज़बान से इन दिनों तेज़ाब फिल्म के ‘एक दो तीन’ वाले गीत की तरह इन घोटालों की गिनती आप सुन सकते हैं ! अफ़सोस इस बात का है कि हमारे चुने हुए इन ‘अनमोल रत्नों’ ने देश को किस गर्त में पहुँचा दिया है ! 

भला हो अपनी मीडिया का और इलेक्ट्रोनिक तकनीक का जिसके माध्यम से सबकी पोल तो कम से कम अब खुल रही है और जनता के सामने भेड़ का मुखौटा पहन कर आने वाले नेताओं के भेड़ियों वाले चहरे बेनकाब हो रहे हैं ! यह भी सच है कि अब तो चुनाव भी करीब हैं ! हमको नये नेता चुनने का अवसर मिलेगा लेकिन अच्छे नेता चुनना उतना ही मुश्किल होगा जितना बासी सब्जियों की ढेर में से छाँट-छाँट कर कम खराब और काम चलाऊ सब्जी छाँटना ! और मेरे हिसाब से तो सब्जी छाँटना तो फिर भी आसान है क्योंकि वह जैसी है आपके सामने है ! चुनाव के प्रत्याशियों में से अच्छे प्रत्याशी का चयन करना बहुत टेढ़ी खीर है क्योंकि किसके मन में क्या है या जीतने के बाद वह किस तरह से गिरगिट की तरह रंग बदलेगा यह अनुमान लगाना और भी मुश्किल होता है !

अभी तो गुलिस्तां के हर पेड़ और हर शाख पर रोशनी डाली ही नहीं गयी है ! इस गुलशन को उजाड़ कर अपने छोटे-छोटे घोंसलों की जगह आलीशान महल बनाने के मंसूबे मन में दबाये ना जाने कितने और उल्लू वहाँ छिपे बैठे मिल जायेंगे यह कहना मुश्किल है ! जिनके हाथों में हमने में रोशनी करने के लिये मशाल थमाई थी और इन लुटेरे उल्लुओं को मार भगाने के लिये सारे इंतजाम करके दिये थे वे या तो नींद में गाफिल हैं या गाँधीजी के बंदरों की तरह तटस्थ भाव से आँख कान और मुँह बंद किये बैठे हैं ! ना उन्हें कुछ गलत सुनाई देता है, ना दिखाई देता है, ना ही वे किसीके खिलाफ मुँह खोलने की हिम्मत करते हैं ! वे बस बेमतलब की बयानबाजी कर रहे हैं या एक दूसरे को देख कर खों-खों कर रहे हैं ! कहेंगे भी कैसे ! जिसके खिलाफ मुँह खोलेंगे वह ना जाने किस-किस की काली करतूतों का हमराज़ है और डर है कि ना जाने किस-किस के चेहरों से नकाब उतरने का खतरा सामने आ जाये ! इसीलिये नेताओं ने सोच रखा है कि भला इसी में है कि चुप्पी साध लो ! ना किसीके लेने में रहो ना देने में ! हमारे मौनी बाबा भी इसी बात में यकीन रखते हैं कि ---

किस-किस को याद कीजिये, किस-किस को रोइये,
आराम बड़ी चीज़ है, मुँह ढक के सोइये !  


साधना वैद  

Saturday, June 4, 2011

काजल की कोठरी

भ्रष्टाचार का क्षेत्र और विस्तार इतना व्यापक और संक्रामक है कि कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि ऐसे तथ्य सामने आयें कि भारत की आबादी का एक बहुत बड़ा प्रतिशत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भ्रष्टाचार में लिप्त है ! भारत के संविधान के अनुसार रिश्वत लेना और देना दोनों ही दंडनीय अपराध हैं ! इस तरह रिश्वत माँगने वाला भी अपराधी है और रिश्वत देने वाला भी अपराधी है ! कैसी अजीब सी बात है ना ! शिकार करने वाला भी अपराधी है और शिकार होने वाला भी ! जंगल में बाघ निरीह बकरी का शिकार करता है ! खूंखार बाघ तो अपराधी है ही निरीह बकरी भी अपराधी है !

आज यह सवाल जोर शोर के साथ उछाला जा रहा है कि भ्रष्टाचार उन्मूलन के आंदोलन में केवल उन्हीं लोगों को शिरकत करनी चाहिये जिनका दामन बिलकुल पाक साफ़ हो ! जिन्होंने ना कभी रिश्वत ली हो और ना ही कभी रिश्वत दी हो ! विश्व के सबसे भ्रष्ट देशों में शुमार इस देश में यह कल्पना की जा रही है कि यहाँ ऐसे लोग भी मिल जायेंगे जो इस काजल की कोठरी में दिन रात आते जाते तो रहते होंगे लेकिन उनके कपड़ों पर एक भी दाग नहीं लगा होगा ! इस क़ानून का औचित्य क्या है कोई मुझे समझायेगा ?

सैद्धांतिक रूप से यह सच है कि रिश्वत देने से रिश्वत माँगने वालों का हौसला बढ़ता है ! इसलिये रिश्वत माँगने वालों का डट कर विरोध करना चाहिये और रिश्वत के लिये एक भी पैसा नहीं देना चाहिये ! लेकिन जहाँ बिना पैसा लिये फ़ाइल एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक नहीं सरकती वहाँ कोई कैसे इस चक्रव्यूह से बाहर निकले और कैसे अपनी रुकी हुई गाड़ी को आगे बढ़ाये ! चाहे किसी गरीब विधवा की पेंशन से सम्बंधित फ़ाइल हो या किसी गरीब के राशन कार्ड से सम्बंधित दस्तावेज़ हों बिना पैसा लिये बाबू कोई भी कार्यवाही करने के लिये तैयार नहीं होता ! अब ज़रा यह बताइये किसके पास इतना वक्त है और इतना दमखम है कि रोजमर्रा की जीवन की जद्दोज़हद एवं संघर्षों से जूझते हुए वह इस भ्रष्ट व्यवस्था से जूझने के लिये भी कमर कस कर तैयार रहे ! यह काम कोई साधू सन्यासी तो कर सकता है जो सांसारिक बंधनों से मुक्त है, उस पर घर परिवार का कोई बोझ नहीं है या जिसे रसोई में नून तेल लकड़ी जुटाने के लिये, बच्चों के स्कूल की फीस और किताबों की व्यवस्था करने के लिये, बूढ़े माता पिता की दवा दारू के लिये सूर्योदय से चंद्रोदय तक संघर्ष नहीं करना पड़ता ! लेकिन एक आम इंसान के पास ना तो इतना वक्त है बर्बाद करने के लिये ना ही इतनी ऊर्जा ! इसीलिये वह रिश्वत की रकम देकर और अपना काम निकलवा कर जल्दी से जल्दी बाबुओं की इस गिरफ्त से बाहर निकलना चाहता है ! ज़रा सोचिये इस दयनीय स्थिति में फँसा आम आदमी आपको अपराधी दिखाई देता है दया का पात्र दिखाई देता है ? ऐसे लोगों की पीड़ा के बारे में किसीने सोचा है जिन्हें अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार के चलते व्यवस्था में बैठे इन भेड़ियों की भेंट चढ़ाना पड़ जाता है और इसके दंडस्वरूप उन्हें अपराधी की श्रेणी में भी डाल दिया जाता है !

भ्रष्ट तंत्र में फँसे ऐसे लोगों को अपनी आवाज़ उठाने का पूरा अधिकार होना चाहिये ! प्रभावशाली व्यक्तियों को अपने रौब दाब और समाज में ऊँची हैसियत के चलते शायद रिश्वत देने की ज़रूरत ना पड़ती हो ! उनके काम उनके नाम सुनते ही फ़ौरन से पेश्तर कर दिए जाते हैं ! उदाहरण के लिये ज़रा सोचिये कि कभी सोनिया गाँधी या शीला दीक्षित को अपना काम करवाने के लिये किसी ऑफिस में जाकर घंटों क्यू में खड़े रहना पड़ा होगा ? या अपनी एक फ़ाइल आगे बढ़वाने के लिये किसी गराब विधवा की तरह बाबू को मोटी रकम अदा करनी पड़ी होगी ? यह शायद उनके पूर्वजन्म के सत्कर्मों का ही फल होगा को वे इस जन्म में उच्च पदों पर आसीन हैं और समस्त राजसी ठाठ बाट भोग रही हैं ! लेकिन क्या आप बता सकते हैं कि वे उस स्त्री से बेहतर और अधिक आदर्श कैसे हो गयीं जिसे अपनी पेंशन प्राप्त करने के लिये हफ़्तों दफ्तर के चक्कर काट कर बाबू के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा होगा और पेंशन की झीनी सी रकम का एक बड़ा हिस्सा वह बाबू हड़प कर गया होगा ? आम इंसान क्या करे ? उसे तो जीवन में हर पल हर क्षण मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और अपने बाल बच्चों के मुख में दो निवाले डालने के लिये दिन रात मेहनत मशक्कत करनी पड़ती है ! यदि अपना समय बचाने के लिये ऐसा व्यक्ति अपनी गर्दन पर सवार किसी बाबू को रिश्वत के रूप में कुछ रुपये थमा देता है तो वह अपराधी कैसे हो गया ? यह तो वही कहावत हो गयी मारे और रोने ना दे ! फिर यह भी विचारणीय होना चाहिये कि रिश्वत लेने देने के पीछे उद्देश्य क्या है ! यदि अपना फँसा हुआ काम निकालने के लिये और समय, ऊर्जा तथा धन की बर्बादी को रोकने के लिये रिश्वत दी गयी है तो इसे अपराध मानना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है ! हाँ रिश्वत का लेन देन किसीका शोषण करने के लिये किया जा रहा हो या किसीके अधिकारों के हनन के लिये किया जा रहा हो तो यह निश्चित रूप से दंडनीय होना चाहिये !

इसके अतिरिक्त जो लोग पहले भ्रष्ट थे और अब उनका हृदय परिवर्तन हो गया है तो उनको भी सुधरने का पूरा मौक़ा दिया जाना चाहिये ! गाँधीजी ने भी कहा था कि हमें पाप से घृणा करनी चाहिये ना कि पापी से ! गौतम बुद्ध के उपदेशों को सुन कर अंगुलिमाल नामक डाकू का भी हृदय परिवर्तन हो गया था और वह हिंसा का रास्ता छोड़ गौतम बुद्ध की शरण में आ गया था ! इसी तरह यदि पूर्व में भ्रष्ट रह चुके किसी व्यक्ति को अपनी भूलों का ज्ञान हो रहा हो और वह आत्मपरिष्कार की राह पर चल कर प्रायश्चित करना चाहता हो तो हमें उसे एक अच्छा इंसान बनने में उसकी सहायता और सहयोग करना चाहिये !

इसलिए मेरे विचार से ऐसी सोच को कोई बल नहीं दिया जाना चाहिये कि आंदोलन में ऐसे लोगों को भाग लेने का कोई अधिकार नहीं होना चाहिये जो स्वयं पूर्व में भ्रष्ट गतिविधियों में संलग्न पाये गये हैं ! जो स्वयं इस पीड़ा को भोग चुके हैं उन्हें तो इसका विरोध करने का अधिकार दोगुना हो जाता है क्योंकि इस तरह वे अपनी यातना का प्रतिकार भी कर सकेंगे !

साधना वैद