मुझे यात्रा करने का बड़ा शौक है, वह भी रेल से । रास्ते में मिलने वाले जंगल, पहाड़, नदियाँ, तालाब, खेत, खलिहान सभी मुझे बहुत लुभाते हैं । लेकिन जैसे ही रेल किसी शहर या कस्बे के पास आने को होती है खिड़की के बाहर टँगी मेरी चिर सजग आँखे संकोच और शर्मिंदगी से खुद ब खुद बन्द हो जाती हैं । इसकी केवल एक ही वजह है कि जैसे ही रेल किसी भी रिहाइशी इलाके में प्रवेश करती है वहाँ की गन्दगी और नज़ारा देख वितृष्णा से मन कसैला हो जाता है । यह समस्या वैसे तो पूरे भारत में ही पसरी हुई है लेकिन विशेष रूप से पंजाब , हरियाणा, उत्तर प्रदेश व बिहार में अधिक विकट है । जिस तरह से हम अपने हवाई अड्डों को विश्वस्तरीय बनाने के लिये प्रयत्नशील हैं , अपने शहर के सड़क मार्गों को भी साफ सुथरा और आकर्षक बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं वैसे ही हम अपने रेल मार्ग को सुन्दर बनाने की कोशिश क्यों नहीं करते ? जबकि यथार्थ रूप में अधिकांश शहरों में सड़क मार्ग से आने वालों की तुलना में रेल मार्ग से आने वाले यात्रियों की संख्या कहीं अधिक होती है । फिर रेल मार्ग के प्रति इतनी उपेक्षा क्यों ? क्या उसके द्वारा आने वाले यात्री और अतिथि हमारे शहर के लिये कोई महत्व नहीं रखते या फिर हमारे शहर या गाँव के प्रति बनाई हुई उनकी धारणा कोई अर्थ नहीं रखती ? आगंतुकों के स्वागत सम्बन्धी बोर्ड्स और पोस्टर्स सड़क मार्ग पर तो कभी कभी दिखाई भी दे जाते हैं लेकिन रेल मार्ग से गुजरने वाले अतिथियों को यह सम्मान नसीब नहीं हो पाता । रेल के द्वारा शहर में प्रवेश करने वाले मेहमानों को स्टेशन पर पहुँचने से पहले किस प्रकार के अशोभनीय दृश्य और गन्दगी से दो चार होना पड़ता है इस ओर हमारा ध्यान कभी नहीं जाता । किसी भी आबादी वाले हिस्से के आने से पूर्व कम से कम डेढ़ दो किलो मीटर पहले से रेल यात्रियों को खुले में शौच जाने वाले लोगों के निर्लज्ज एवम अशोभनीय दृश्यों से न चाहते हुए भी दो चार होना पड़ता है । समूचा मार्ग गन्दगी और दुर्गन्ध से भरा होता है । हमारे शहरों के नागरिक और रेल प्रशासन इस नारकीय स्थिति को सुधारने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाते ।
रेलवे स्टेशन के आस पास के रिहाइशी इलाकों में प्रयोग के लिये अनेक शौचालयों का निर्माण कराया जाना चाहिये जिनके नि:शुल्क प्रयोग के लिये आम जनता को प्रोत्साहित करने के लिये सभी सार्थक प्रयास किये जाने चाहिये । इसके लिये सुलभ इंटरनेशनल वालों के अनुभवों और ज्ञान का लाभ उठाया जा सकता है । घनी आबादी के बीच से जहाँ रेल मार्ग गुजरते हैं उसके दोनों तरफ छोटी बड़ी निजी सम्पत्तियों के जो मालिक इस अभियान में सहयोग करें उन्हें टैक्स आदि में रियायत देकर प्रोत्साहित किया जाना चाहिये ।
रेल मंत्रालय के पास ना तो संसाधनों की कमी है ना ही रेलवे फ्रण्ट के सौंदर्यीकरण के लिये अधिक खर्च की आवश्यक्ता है । थोड़ी सी सफाई और खूब सारी हरियाली ही तो चाहिये । क़्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो शहर और कस्बे अपने रेलवे फ्रण्ट को सुन्दर रखें उन्हें प्रति माह रेलवे कुछ नगद पुरस्कार दे । इस पुरस्कार राशि में पर्यटन विभाग तथा केन्द्र व राज्य की सरकारें भी चाहें तो भागीदार बन सकती हैं । इस प्रयास को और अधिक व्यापक रूप से प्रचारित करने के लिये रेल मंत्रालय द्वारा अंतर्शहरी प्रतियोगितायें भी आयोजित कराई जा सकती हैं जिससे नागरिकों को एक अच्छे काम के लिये प्रोत्साहित किया जा सके । आशा है नई रेल मंत्री सुश्री ममताजी इस दिशा में भी विचार करेंगी और रेल मार्गों के सौंदर्यीकरण की दिशा में सार्थक कदम उठायेंगी ।
साधना वैद
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Monday, July 20, 2009
Tuesday, July 14, 2009
पता नहीं क्यों
पता नहीं क्यों
पलकों मे बंद तुम्हारी छवि
मेरी आँखों में चुभ सी क्यों जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे जुड़ी हर बात
छलावे के प्रतिमानों की याद क्यों दिला जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे जुड़ी हर याद
गहराई तक अंतर को खरोंच क्यों जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे मिलने के बाद
आस्था अपना औचित्य खो क्यों बैठी है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे मिले हर अनुभव के बाद
विश्वास की परिभाषा बदली सी क्यों लगती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे बिछुड़ने के बाद
हार की टीस की जगह जीत का दर्द क्यों सालता है ?
पता नहीं क्यों
तुम्हें देखने की तीव्र लालसा के बाद भी
आँखे खोलने से मन क्यों डरता है ?
पता नहीं क्यों
सालों पहले तुम्हारे दिये ज़ख्म
पर्त दर पर्त आज तक हरे से क्यों लगते हैं ?
पता नहीं क्यों
जीवन के सारे अनुत्तरित प्रश्न
उम्र के इस मुकाम पर आकर भी
अनसुलझे ही क्यों रह जाते हैं ?
पता नहीं क्यों .....
साधना वैद
पलकों मे बंद तुम्हारी छवि
मेरी आँखों में चुभ सी क्यों जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे जुड़ी हर बात
छलावे के प्रतिमानों की याद क्यों दिला जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे जुड़ी हर याद
गहराई तक अंतर को खरोंच क्यों जाती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे मिलने के बाद
आस्था अपना औचित्य खो क्यों बैठी है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे मिले हर अनुभव के बाद
विश्वास की परिभाषा बदली सी क्यों लगती है ?
पता नहीं क्यों
तुमसे बिछुड़ने के बाद
हार की टीस की जगह जीत का दर्द क्यों सालता है ?
पता नहीं क्यों
तुम्हें देखने की तीव्र लालसा के बाद भी
आँखे खोलने से मन क्यों डरता है ?
पता नहीं क्यों
सालों पहले तुम्हारे दिये ज़ख्म
पर्त दर पर्त आज तक हरे से क्यों लगते हैं ?
पता नहीं क्यों
जीवन के सारे अनुत्तरित प्रश्न
उम्र के इस मुकाम पर आकर भी
अनसुलझे ही क्यों रह जाते हैं ?
पता नहीं क्यों .....
साधना वैद
Monday, July 13, 2009
कसक
कैसा लगता है
जब गहन भावना से परिपूर्ण
सुदृढ़ नींव वाले प्रेम के अंतर महल को
सागर का एक छोटा सा ज्वार का रेला
पल भर में बहा ले जाता है ।
क़ैसा लगता है
जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत ।
क़ैसा लगता है
जब शीतल छाया के लिये रोपा हुआ पौधा
खजूर की तरह ऊँचा निकल जाता है
जिससे छाया तो नहीं ही मिलती उसका खुरदरा स्पर्श
तन मन को छील कर घायल और कर जाता है ।
कैसा लगता है
जब पत्तों पर संचित ओस की बूंदों की
अनमोल निधि हवा के क्षणिक झोंके से
पल भर में नीचे गिर धरा में विलीन हो जाती हैं
और सारे पत्तों को एकदम से रीता कर जाती हैं ।
साधना वैद
जब गहन भावना से परिपूर्ण
सुदृढ़ नींव वाले प्रेम के अंतर महल को
सागर का एक छोटा सा ज्वार का रेला
पल भर में बहा ले जाता है ।
क़ैसा लगता है
जब अनन्य श्रद्धा और भक्ति से
किसी मूरत के चरणों में झुका शीश
विनयपूर्ण वन्दना के बाद जब ऊपर उठता है
तो सामने न वे चरण होते हैं और ना ही वह मूरत ।
क़ैसा लगता है
जब शीतल छाया के लिये रोपा हुआ पौधा
खजूर की तरह ऊँचा निकल जाता है
जिससे छाया तो नहीं ही मिलती उसका खुरदरा स्पर्श
तन मन को छील कर घायल और कर जाता है ।
कैसा लगता है
जब पत्तों पर संचित ओस की बूंदों की
अनमोल निधि हवा के क्षणिक झोंके से
पल भर में नीचे गिर धरा में विलीन हो जाती हैं
और सारे पत्तों को एकदम से रीता कर जाती हैं ।
साधना वैद
Monday, July 6, 2009
माँ
रात की अलस उनींदी आँखों में
एक स्वप्न सा चुभ गया है ,
कहीं कोई बेहद नर्म बेहद नाज़ुक ख़याल
चीख कर रोया होगा ।
सुबह के निष्कलुष ज्योतिर्मय आलोक में
अचानक कालिमा घिर आयी है ,
कहीं कोई चहचहाता कुलाँचे भरता मन
सहम कर अवसाद के अँधेरे में घिर गया होगा ।
दिन के प्रखर प्रकाश को परास्त कर
मटियाली धूसर आँधी घिर आई है ,
कहीं किसी उत्साह से छलछलाते हृदय पर
कुण्ठा और हताशा का क़हर बरपा होगा ।
शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में
आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है ,
कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।
साधना वैद
एक स्वप्न सा चुभ गया है ,
कहीं कोई बेहद नर्म बेहद नाज़ुक ख़याल
चीख कर रोया होगा ।
सुबह के निष्कलुष ज्योतिर्मय आलोक में
अचानक कालिमा घिर आयी है ,
कहीं कोई चहचहाता कुलाँचे भरता मन
सहम कर अवसाद के अँधेरे में घिर गया होगा ।
दिन के प्रखर प्रकाश को परास्त कर
मटियाली धूसर आँधी घिर आई है ,
कहीं किसी उत्साह से छलछलाते हृदय पर
कुण्ठा और हताशा का क़हर बरपा होगा ।
शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में
आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है ,
कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।
साधना वैद
Friday, June 19, 2009
क्या कोई सुन रहा है ?
आगरा में राष्ट्रीय राजमार्ग पर मृत जानवरों के अंगों से चर्बी निकाल कर देशी घी बनाया जा रहा था और उसे धड़ल्ले से मशहूर ब्राण्ड्स के नकली रैपर लगा कर सालों से बाज़ार में बेचा जा रहा था लेकिन हमारी पुलिस और प्रशासन किसी को कानोंकान खबर भी ना हुई आश्चर्य होता है । फिर किसी तरह मामला संज्ञान में आया भी तो जिस त्वरित गति से उस पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है वह बेहद शर्मनाक है ।
जिस दिन से इस घिनौने कृत्य के बारे में पता चला है उसी दिन से अधिकारियों के द्वारा इस पर लीपापोती कर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है । सबूतों के साथ कोई छेड़ छाड़ ना हो सके इसके लिये ज़रूरत थी कि कारखाने को सील कर दिया जाता और सूक्ष्म निरीक्षण परीक्षण के लिये सारे सामान को ज्यों का त्यों छोड़ दिया जाता । लेकिन यहाँ तो उल्टी गंगा ही बहती है । कारखाने को सील करने के बजाय उस पर बुलडोज़र चलाकर उस जगह को मैदान में तब्दील कर दिया और सारे सबूत मिटा डाले । इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना कार्यवाही के लिये कौन जवाब देगा ? किसके आदेश से वहाँ बुलडोज़र चलाया गया ? क्या उस अधिकारी को कोई दण्ड मिलेगा ? कारखाना किसका था , किसके वरद हस्त के नीचे वह इस जघन्य काण्ड को बेखौफ चला पा रहा था , उसके इस गुनाह में कौन विशिष्ट लोग उसके भागीदार थे क्या इन रहस्यों से पर्दा उठेगा ? इस विषय पर सारे अधिकारी मौन क्यों साधे हुए हैं ? आखिर किसे बचाने के लिये सारी मशक्कत की जा रही है ? वैसे तो मीडिया तिल का ताड़ बनाने में माहिर है लेकिन इस मामले में वह भी दबे स्वरों में दिन भर में एकाध संक्षिप्त समाचार देकर चुप्पी साध लेता है ?
समाज को भयमुक्त और अपराधमुक्त बनाने के मुख्यमंत्री जी के दावे कहाँ गये ? आगरा आजकल आये दिन होने वाली आपराधिक वारदातों से थर्राया हुआ है । हर रोज़ समाचार पत्र चोरी , डकैती , लूट , खसोट , हत्या , आगजनी आदि के समाचारों से भरे रहते हैं । अपराधी इतने निडर हैं कि दिन दहाड़े ऐसे जघन्य कारनामों को अंजाम देते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता ना पुलिस ना प्रशासन । आखिर क्यों ? यह सब किसकी शै पर हो रहा है ? आगरा ही नहीं पूरा उत्तर प्रदेश अपराधियों की गिरफ्त में है ? क्या हमारे नेता निजी स्वार्थों से अपना ध्यान हटा कर आम जनता के हितों के बारे में भी कभी सोचेंगे या जनता के साथ अंतरंगता केवल चुनाव के महीने में चन्द आम सभाओं तक ही सिमट कर खत्म हो जाती है ? अभी कुछ समय पूर्व नकली दूध के काले धन्धे का पर्दाफाश हुआ था । टी वी पर बाकायदा नकली दूध बनाने वालों के साक्षात्कार तक दिखाये गये थे ? क्या हुआ इस मामले में ? अपराधियों को क्या सज़ा मिली ? अगर नहीं मिली तो कब मिलेगी ? इसी तरह इस केस की फाइल भी सालों के लिये किसी न्यायालय के गोदाम में धूल चाटती रहेगी और मिलावटी खाद्य पदार्थों के बनाने और बचने का सिलसिला इसी तरह से धडल्ले के साथ बखौफ चलता रहेगा । है कोई माई का लाल जो इसको रोक सके ?
हमें कब तक इन हृदयहीन मुनाफाखोरों के हाथों का खिलौना बने रहना पड़ेगा जिनके पास ना तो मानवीयता है ना ही उन्हें ईश्वर का भय है ? राजनीति के बाहुबलियों के साथ साँठ गाँठ उनके ऐसे काले धन्धों को पनपने पसरने में मददगार सिद्ध होती है । जनता के स्वास्थ्य और विश्वास के साथ खिलवाड़ किया जाता है और हम निरुपाय हो सब सहने के लिये मजबूर हैं क्योकि यह तो अंधेर नगरी चौपट राजा का देश बन चुका है । जिनसे न्याय की आशा हो वे ही गुनाहों के दलदल में आकण्ठ डूबे हों तो आम आदमी किसके सामने जाकर अपना दुखडा रोये और उसके आँसू पोंछने के लिये किसके हाथ उठेंगे ? ऐसे में ज़रूरत है कि जनता को समाज के चन्द प्रबुद्ध प्रतिनिधियों के नेतृत्व में एकजुट हो इस तरह के जघन्य काण्डों का पुरज़ोर विरोध करना चाहिये और जब तक मामले की गहन जाँच पड़ताल होकर ठोस नतीजे सामने ना आ जायें प्रशासनिक कार्यवाही पर पैनी नज़र रखनी चाहिये कि वे मामले को दबाने की कोशिश ना कर पायें ।
साधना वैद
जिस दिन से इस घिनौने कृत्य के बारे में पता चला है उसी दिन से अधिकारियों के द्वारा इस पर लीपापोती कर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है । सबूतों के साथ कोई छेड़ छाड़ ना हो सके इसके लिये ज़रूरत थी कि कारखाने को सील कर दिया जाता और सूक्ष्म निरीक्षण परीक्षण के लिये सारे सामान को ज्यों का त्यों छोड़ दिया जाता । लेकिन यहाँ तो उल्टी गंगा ही बहती है । कारखाने को सील करने के बजाय उस पर बुलडोज़र चलाकर उस जगह को मैदान में तब्दील कर दिया और सारे सबूत मिटा डाले । इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना कार्यवाही के लिये कौन जवाब देगा ? किसके आदेश से वहाँ बुलडोज़र चलाया गया ? क्या उस अधिकारी को कोई दण्ड मिलेगा ? कारखाना किसका था , किसके वरद हस्त के नीचे वह इस जघन्य काण्ड को बेखौफ चला पा रहा था , उसके इस गुनाह में कौन विशिष्ट लोग उसके भागीदार थे क्या इन रहस्यों से पर्दा उठेगा ? इस विषय पर सारे अधिकारी मौन क्यों साधे हुए हैं ? आखिर किसे बचाने के लिये सारी मशक्कत की जा रही है ? वैसे तो मीडिया तिल का ताड़ बनाने में माहिर है लेकिन इस मामले में वह भी दबे स्वरों में दिन भर में एकाध संक्षिप्त समाचार देकर चुप्पी साध लेता है ?
समाज को भयमुक्त और अपराधमुक्त बनाने के मुख्यमंत्री जी के दावे कहाँ गये ? आगरा आजकल आये दिन होने वाली आपराधिक वारदातों से थर्राया हुआ है । हर रोज़ समाचार पत्र चोरी , डकैती , लूट , खसोट , हत्या , आगजनी आदि के समाचारों से भरे रहते हैं । अपराधी इतने निडर हैं कि दिन दहाड़े ऐसे जघन्य कारनामों को अंजाम देते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता ना पुलिस ना प्रशासन । आखिर क्यों ? यह सब किसकी शै पर हो रहा है ? आगरा ही नहीं पूरा उत्तर प्रदेश अपराधियों की गिरफ्त में है ? क्या हमारे नेता निजी स्वार्थों से अपना ध्यान हटा कर आम जनता के हितों के बारे में भी कभी सोचेंगे या जनता के साथ अंतरंगता केवल चुनाव के महीने में चन्द आम सभाओं तक ही सिमट कर खत्म हो जाती है ? अभी कुछ समय पूर्व नकली दूध के काले धन्धे का पर्दाफाश हुआ था । टी वी पर बाकायदा नकली दूध बनाने वालों के साक्षात्कार तक दिखाये गये थे ? क्या हुआ इस मामले में ? अपराधियों को क्या सज़ा मिली ? अगर नहीं मिली तो कब मिलेगी ? इसी तरह इस केस की फाइल भी सालों के लिये किसी न्यायालय के गोदाम में धूल चाटती रहेगी और मिलावटी खाद्य पदार्थों के बनाने और बचने का सिलसिला इसी तरह से धडल्ले के साथ बखौफ चलता रहेगा । है कोई माई का लाल जो इसको रोक सके ?
हमें कब तक इन हृदयहीन मुनाफाखोरों के हाथों का खिलौना बने रहना पड़ेगा जिनके पास ना तो मानवीयता है ना ही उन्हें ईश्वर का भय है ? राजनीति के बाहुबलियों के साथ साँठ गाँठ उनके ऐसे काले धन्धों को पनपने पसरने में मददगार सिद्ध होती है । जनता के स्वास्थ्य और विश्वास के साथ खिलवाड़ किया जाता है और हम निरुपाय हो सब सहने के लिये मजबूर हैं क्योकि यह तो अंधेर नगरी चौपट राजा का देश बन चुका है । जिनसे न्याय की आशा हो वे ही गुनाहों के दलदल में आकण्ठ डूबे हों तो आम आदमी किसके सामने जाकर अपना दुखडा रोये और उसके आँसू पोंछने के लिये किसके हाथ उठेंगे ? ऐसे में ज़रूरत है कि जनता को समाज के चन्द प्रबुद्ध प्रतिनिधियों के नेतृत्व में एकजुट हो इस तरह के जघन्य काण्डों का पुरज़ोर विरोध करना चाहिये और जब तक मामले की गहन जाँच पड़ताल होकर ठोस नतीजे सामने ना आ जायें प्रशासनिक कार्यवाही पर पैनी नज़र रखनी चाहिये कि वे मामले को दबाने की कोशिश ना कर पायें ।
साधना वैद
Friday, June 5, 2009
दस सूत्रीय सुझाव
न्याय प्रणाली में सुधार भारत में लोकतंत्र को सुदृढ़ करने के लिये आपके दस सूत्रीय सुझाव आमंत्रित हैं । आशा है हम सबके सम्मिलित प्रयासों से प्रस्तावित सुझावों की जो सूची सामने आयेगी उस पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा तो अवश्य ही अनुकूल परिणाम सामने आयेंगे ।
1. भ्रष्टाचार उन्मूलन
2. न्याय प्रणाली में सुधार
त्वरित न्याय का प्रावधान
मुकदमों में तारीखें कम से कम पडें
मुकदमें की प्रकृति को देखते हुए समय सीमा का निर्धारण
सज़ा सुनाये जाने बाद उसे तुरंत लागू किया जाये
छोटी मोटी शिकायतों के मुकदमों को आउट ऑफ कोर्ट निपटा दिया जाये
विचाराधीन मुकदमों को निपटाने के लिये और न्यायालयों का निर्माण हो
लोक अदालतों और पंचायतों को और अधिक अधिकार सम्पन्न किया जाये
3. शिक्षा का प्रसार
4. सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार
5. पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार
6. आम लोगों को स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति जागरूक करना
7. बेरोज़गार युवाओं के लिये स्व रोज़गार के अवसरों को उपलब्ध कराना
8. नारी सशक्तिकरण के लिये कारगर उपाय
9. निर्धन बच्चों के लिये बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना
10.देश के संविधान में आवश्यक्तानुसार परिवर्तन और कानून का कड़ाई के साथ अनुपालन करना
मेरे दृष्टिकोण से इन बिन्दुओं पर कार्य किया जाये तो भारत में लोकतंत्र को सुदृढ़ किया जा सकता है । आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं । जब सभी प्रबुद्ध लोग इस दिशा में सोचेंगे तो आशा है कि कोई भी बिन्दु अछूता नहीं रह जायेगा ।
साधना वैद
1. भ्रष्टाचार उन्मूलन
2. न्याय प्रणाली में सुधार
त्वरित न्याय का प्रावधान
मुकदमों में तारीखें कम से कम पडें
मुकदमें की प्रकृति को देखते हुए समय सीमा का निर्धारण
सज़ा सुनाये जाने बाद उसे तुरंत लागू किया जाये
छोटी मोटी शिकायतों के मुकदमों को आउट ऑफ कोर्ट निपटा दिया जाये
विचाराधीन मुकदमों को निपटाने के लिये और न्यायालयों का निर्माण हो
लोक अदालतों और पंचायतों को और अधिक अधिकार सम्पन्न किया जाये
3. शिक्षा का प्रसार
4. सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार
5. पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार
6. आम लोगों को स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति जागरूक करना
7. बेरोज़गार युवाओं के लिये स्व रोज़गार के अवसरों को उपलब्ध कराना
8. नारी सशक्तिकरण के लिये कारगर उपाय
9. निर्धन बच्चों के लिये बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना
10.देश के संविधान में आवश्यक्तानुसार परिवर्तन और कानून का कड़ाई के साथ अनुपालन करना
मेरे दृष्टिकोण से इन बिन्दुओं पर कार्य किया जाये तो भारत में लोकतंत्र को सुदृढ़ किया जा सकता है । आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं । जब सभी प्रबुद्ध लोग इस दिशा में सोचेंगे तो आशा है कि कोई भी बिन्दु अछूता नहीं रह जायेगा ।
साधना वैद
Tuesday, June 2, 2009
घर फूँक तमाशा
देश में कहीं कुछ हो जाये हमारे मुस्तैद उपद्रवकारी हमेशा बड़े जोश खरोश के साथ हिंसा फैलाने में, तोड़ फोड़ करने में और जन सम्पत्ति को नुक्सान पहुँचाने में सबसे आगे नज़र आते हैं । अब तो इन लोगों ने अपना दायरा और भी बढ़ा लिया है । वियना में कोई दुर्घटना घटे या ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में कोई हादसा हो या इंग्लैंड में, हमारे ये ‘जाँबाज़’ अपने देश की रेलगाड़ियाँ या बसें जलाने में ज़रा सी भी देर नहीं लगाते । विरोध प्रकट करने का यह कौन सा तरीका है समझ में नहीं आता । यह तो हद दर्ज़े का पागलपन है ।
आजकल यह रिवाज़ सा चल पड़ा है कि सड़क पर कोई दुर्घटना हो गयी तो तुरंत रास्ता जाम कर दो । जितने भी वाहन आस पास से गुज़र रहे हों उनको आग के हवाले कर दो फिर चाहे उनका दुर्घटना से कोई लेना देना हो या ना हो और घंटों के लिये धरना प्रदर्शन कर यातायात को बाधित कर दो । किसी अस्पताल में किसी के परिजन की उपचार के दौरान मौत हो गयी तो डॉक्टर के नर्सिंग होम में सारी कीमती मशीनों को चकनाचूर कर दो और डॉक्टर और उसके स्टाफ की जम कर धुनाई कर दो । जनता का यह व्यवहार कुछ विचित्र लगता है । हद तो तब हो जाती है जब अपना आक्रोश प्रदर्शित करने के लिये ये लोग आम जनता की सहूलियत और ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्षों के प्रयासों और जद्दोजहद के बाद जैसे तैसे जुटायी गयी बुनियादी सेवाओं को अपनी वहशत का निशाना बनाते हैं ।
आम जनता के मन में यह भ्रांति गहराई तक जड़ें जमाये हुए है कि सारी रेलगाड़ियाँ, बसें या सरकारी इमारतें ‘सरकार’ की हैं जो कोई दूसरे पक्ष का व्यक्ति है और उसके सामान की तोड़ फोड़ करके वे अपना बदला निकाल सकते हैं । हम सभी यह जानते हैं कि हमारा देश अभी पूरी तरह से सुविधा सम्पन्न नहीं हुआ है । अभी भी किसी क्षेत्र की किसी ज़रूरत को पूरा करने के लिये सरकार को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और उस सुविधा का उपभोग करने से पहले आम जनता को भारी मात्रा में टैक्स देकर धन जुटाने में अपना योगदान करना पड़ता है तब कहीं जाकर दो शहरों को जोड़ने के लिये किसी बस या किसी रेल की व्यवस्था हो पाती है या किसी शहर में बच्चों के लिये स्कूल या मरीज़ों के लिये किसी अस्पताल का निर्माण हो पाता है । लेकिन चन्द वहशी लोगों को उसे फूँक डालने में ज़रा सा भी समय नहीं लगता । अपने जुनून की वजह से वे अन्य तमाम नागरिकों की आवश्यक्ताओं की वस्तुओं को कैसे और किस हक से नुक्सान पहुँचा सकते हैं ? जो लोग इस तरह की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं क्या वे कभी रेल से या बस से सफर नहीं करते ? अपने परिवार के बच्चों को स्कूलों में पढ़ने के लिये नहीं भेजते या फिर बीमार पड़ जाने पर उन्हें अस्पतालों की सेवाओं की दरकार नहीं होती ? फिर बुनियादी ज़रूरतों की इन सुविधाओं को क्षति पहुँचा कर वे किस तरह से एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभा रहे होते हैं ?
लोगों तक यह संदेश पहुँचना बहुत ज़रूरी है कि जिस सरकारी सम्पत्ति को वे नुक्सान पहुँचाते हैं वह जनता की सम्पत्ति है और उसके निर्माण के लिये उनकी खुद की भी गाढ़े पसीने की कमाई कर के रूप में जब सरकार के पास पहुँचती है तब ये सुविधायें अस्तित्व में आती हैं । इन के नष्ट हो जाने से पुन: इनकी ज़रूरत का शून्य बन जाता है और उसकी पूर्ति के लिये पुन: अतिरिक्त कर भार और उसके परिणामस्वरूप बढ़ने वाली मँहगाई का दुष्चक्र आरम्भ हो जाता है जिसका खामियाज़ा चन्द लोगों की ग़लतियों की वजह से सभी को भुगतना पड़ता है । यह नादानी कुछ इसी तरह की है कि घर में किसी बच्चे की नयी कमीज़ की छोटी सी माँग पूरी नहीं हुई तो वह अपने कपड़ों की पूरी अलमारी को ही आग के हवाले कर दे ।
इस समस्या के समाधान के लिये ज़रूरी है कि जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के नागरिकों को केवल धरना प्रदर्शन का प्रशिक्षण ही ना दें वरन उनके कर्तव्यों के लिये भी उन्हें जागरूक और सचेत करें । नेता गण खुद भी धरना प्रदर्शन और हिंसा की राजनीति से परहेज़ करें और आम जनता के सामने संयमित और अनुशासित आचरण कर अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करें ताकि जनता के बीच उद्देश्यपूर्ण संदेश प्रसारित हो । रेडियो और टी.वी. चैनल्स पर नागरिकों को इस दिशा में जागरूक करने के लिये समय समय पर संदेश प्रसारित किये जायें और मौके पर तोड़ फोड़ की असामाजिक गतिविधि में लिप्त पकड़े गये लोगों को कठोर दण्ड दिया जाये उन्हें सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ा ना जाये । जब तक कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे हम इसी तरह पंगु बने हुए इन उपद्रवकारियों के हाथों का खिलौना बने रहेंगे ।
साधना वैद
आजकल यह रिवाज़ सा चल पड़ा है कि सड़क पर कोई दुर्घटना हो गयी तो तुरंत रास्ता जाम कर दो । जितने भी वाहन आस पास से गुज़र रहे हों उनको आग के हवाले कर दो फिर चाहे उनका दुर्घटना से कोई लेना देना हो या ना हो और घंटों के लिये धरना प्रदर्शन कर यातायात को बाधित कर दो । किसी अस्पताल में किसी के परिजन की उपचार के दौरान मौत हो गयी तो डॉक्टर के नर्सिंग होम में सारी कीमती मशीनों को चकनाचूर कर दो और डॉक्टर और उसके स्टाफ की जम कर धुनाई कर दो । जनता का यह व्यवहार कुछ विचित्र लगता है । हद तो तब हो जाती है जब अपना आक्रोश प्रदर्शित करने के लिये ये लोग आम जनता की सहूलियत और ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्षों के प्रयासों और जद्दोजहद के बाद जैसे तैसे जुटायी गयी बुनियादी सेवाओं को अपनी वहशत का निशाना बनाते हैं ।
आम जनता के मन में यह भ्रांति गहराई तक जड़ें जमाये हुए है कि सारी रेलगाड़ियाँ, बसें या सरकारी इमारतें ‘सरकार’ की हैं जो कोई दूसरे पक्ष का व्यक्ति है और उसके सामान की तोड़ फोड़ करके वे अपना बदला निकाल सकते हैं । हम सभी यह जानते हैं कि हमारा देश अभी पूरी तरह से सुविधा सम्पन्न नहीं हुआ है । अभी भी किसी क्षेत्र की किसी ज़रूरत को पूरा करने के लिये सरकार को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और उस सुविधा का उपभोग करने से पहले आम जनता को भारी मात्रा में टैक्स देकर धन जुटाने में अपना योगदान करना पड़ता है तब कहीं जाकर दो शहरों को जोड़ने के लिये किसी बस या किसी रेल की व्यवस्था हो पाती है या किसी शहर में बच्चों के लिये स्कूल या मरीज़ों के लिये किसी अस्पताल का निर्माण हो पाता है । लेकिन चन्द वहशी लोगों को उसे फूँक डालने में ज़रा सा भी समय नहीं लगता । अपने जुनून की वजह से वे अन्य तमाम नागरिकों की आवश्यक्ताओं की वस्तुओं को कैसे और किस हक से नुक्सान पहुँचा सकते हैं ? जो लोग इस तरह की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं क्या वे कभी रेल से या बस से सफर नहीं करते ? अपने परिवार के बच्चों को स्कूलों में पढ़ने के लिये नहीं भेजते या फिर बीमार पड़ जाने पर उन्हें अस्पतालों की सेवाओं की दरकार नहीं होती ? फिर बुनियादी ज़रूरतों की इन सुविधाओं को क्षति पहुँचा कर वे किस तरह से एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभा रहे होते हैं ?
लोगों तक यह संदेश पहुँचना बहुत ज़रूरी है कि जिस सरकारी सम्पत्ति को वे नुक्सान पहुँचाते हैं वह जनता की सम्पत्ति है और उसके निर्माण के लिये उनकी खुद की भी गाढ़े पसीने की कमाई कर के रूप में जब सरकार के पास पहुँचती है तब ये सुविधायें अस्तित्व में आती हैं । इन के नष्ट हो जाने से पुन: इनकी ज़रूरत का शून्य बन जाता है और उसकी पूर्ति के लिये पुन: अतिरिक्त कर भार और उसके परिणामस्वरूप बढ़ने वाली मँहगाई का दुष्चक्र आरम्भ हो जाता है जिसका खामियाज़ा चन्द लोगों की ग़लतियों की वजह से सभी को भुगतना पड़ता है । यह नादानी कुछ इसी तरह की है कि घर में किसी बच्चे की नयी कमीज़ की छोटी सी माँग पूरी नहीं हुई तो वह अपने कपड़ों की पूरी अलमारी को ही आग के हवाले कर दे ।
इस समस्या के समाधान के लिये ज़रूरी है कि जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के नागरिकों को केवल धरना प्रदर्शन का प्रशिक्षण ही ना दें वरन उनके कर्तव्यों के लिये भी उन्हें जागरूक और सचेत करें । नेता गण खुद भी धरना प्रदर्शन और हिंसा की राजनीति से परहेज़ करें और आम जनता के सामने संयमित और अनुशासित आचरण कर अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करें ताकि जनता के बीच उद्देश्यपूर्ण संदेश प्रसारित हो । रेडियो और टी.वी. चैनल्स पर नागरिकों को इस दिशा में जागरूक करने के लिये समय समय पर संदेश प्रसारित किये जायें और मौके पर तोड़ फोड़ की असामाजिक गतिविधि में लिप्त पकड़े गये लोगों को कठोर दण्ड दिया जाये उन्हें सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ा ना जाये । जब तक कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे हम इसी तरह पंगु बने हुए इन उपद्रवकारियों के हाथों का खिलौना बने रहेंगे ।
साधना वैद
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