जिस
तरह एक तस्वीर दर्शक के समक्ष सोचने समझने के लिये असंख्य आयाम बिना कुछ कहे ही
खोल देती है उसी तरह शब्दों के जाल में उलझे बिना यदि आँकड़ों को सरल रूप में
प्रस्तुत किया जाये तो वे भी तस्वीर की तरह ही बहुत कुछ कह जाते हैं ! आइये भारत
में शिक्षा की स्थिति पर कुछ आँकड़ों का अध्ययन करें !
भारत
की कुल जनसंख्या --- १२४ करोड़
कुल
साक्षर ( ७४ % ) – ९२ करोड़
विश्व
साक्षरता का औसत ( ८४ % )
देखने
से तो साक्षरता का यह प्रतिशत अधिक चिंताजनक नहीं लगता लेकिन आइये अब साक्षर लोगों
के शिक्षा के स्तर पर भी एक नज़र डाल ली जाये !
नीचे
दिये गये प्रतिशत कुल जनसंख्या के नहीं वरन केवल साक्षर लोगों का ही प्रतिशत
दर्शाते हैं !
डिप्लोमा,
डिग्री और उससे ऊपर – ७.५%
हाई
स्कूल, हायर सेकेंड्री, इण्टरमीजियेट --- २१%
मिडिल
स्कूल अर्थात कक्षा आठ तक – १६%
मात्र
प्राइमरी स्कूल अर्थात कक्षा पाँच तक --
२६%
प्राइमरी
से भी कम – २६%
साक्षर,
पर कभी स्कूल नहीं गये – ३.५%
निश्चय
ही शिक्षा का यह स्तर चिंताजनक है लेकिन आइये इस समस्या के हल के लिये उपलब्ध
साधनों पर विचार किया जाये ! यहाँ हम निरंतर चलने वाली समस्याओं जैसे भ्रष्टाचार,
राजनीति व लालफीताशाही पर चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि इन समस्याओं से तो हमें जूझना
ही है ! हम अपने साधनों पर, विशेष कर शिक्षा के क्षेत्र में हम कितना धन खर्च कर
रहे हैं इसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहेंगे ! तुलना के लिये हम भारत से अधिक
संपन्न देश अमेरिका और भारत से कम संपन्न देश नेपाल में शिक्षा पर खर्च की जाने
वाली धन राशि पर भी एक नज़र डालेंगे !
अमेरिका
जनसंख्या
– ३२ करोड़
देश
की कुल आमदनी प्रतिवर्ष (जी डी पी) – १५ ट्रिलियन डॉलर्स ( पन्द्रह लाख करोड़ डॉलर्स )
शिक्षा
पर खर्च – कुल आमदनी का ५.५%
भारत
जनसंख्या
– १२४ करोड़
देश
की कुल आमदनी प्रतिवर्ष (जी डी पी) – १.८५ ट्रिलियन डॉलर्स ( एक लाख पचासी हज़ार
करोड़ डॉलर्स)
शिक्षा
पर खर्च – ३.१%
नेपाल
जनसंख्या
– ३ करोड़
देश
की कुल आमदनी प्रतिवर्ष (जी डी पी) – १९ बिलियन डॉलर्स (एक करोड़ अठासी लाख अस्सी
हज़ार डॉलर्स)
शिक्षा
पर खर्च – कुल आमदनी का ४.६%.
हमारे
साधन बहुत कम हैं, इन सीमित साधनों को भी यदि बुद्धिमानी से और उचित प्राथमिकताओं
को समझते हुए प्रयोग नहीं किया जायेगा तो हम कहीं भी नहीं पहुँचेंगे ! देश के
साक्षर लोगों के तुलनात्मक अध्ययन में हमने देखा कि हम अपने देश के साक्षर लोगों
के भी ७१.५% लोगों को कक्षा आठ तक की शिक्षा ही दे पा रहे हैं ! इसीमें हमारे सारे
साधन चुक जाते हैं ! हम देश से गरीबी हट जाने का, देश के भ्रष्टाचार से मुक्त हो
जाने का इंतज़ार नहीं कर सकते ! फिलहाल हमको अपनी कक्षा एक से कक्षा आठ तक की
शिक्षा को ही इतना उपयोगी और जीविका अर्जित करने योग्य बनाना होगा कि उसके बाद यदि
आगे पढ़ने की संभावनायें ना भी रहें तो भी शिक्षार्थी का जीवन भली प्रकार से चल सके
! इससे एक लाभ यह भी होगा कि उच्च शिक्षा के लिये व्यर्थ की आपाधापी नहीं होगी और
शिक्षा के संस्थानों पर दबाव भी कम पड़ेगा !
कक्षा
आठ तक कम से कम भाषा का ज्ञान, संवाद के तरीके, हिसाब किताब की समझ और किसी रोज़गार
को करने का हुनर तो आ ही जाना चाहिये ! हम क्लास आठ तक अपने यहाँ सिर्फ साधारण
विज्ञान ही पढ़ाते हैं जबकि जर्मनी में जनरल इंजीनियरिंग का विषय भी कक्षा आठ में
पढ़ाया जाता है ! कक्षा आठ तक ऑफिस में इस्तेमाल होने वाली मशीनें जैसे कि कम्प्यूटर
आदि के बारे में पढ़ाना हमारे देश में भी आरम्भ कर दिया गया है लेकिन इसकी सुविधा
चंद गिने चुने संस्थानों में ही है ! आठवीं क्लास पास करने तक बच्चे की आयु लगभग
पन्द्रह साल हो जाती है ! इस आयु के बाद यदि साधन की कमी से परिवार बच्चे को आगे
पढ़ाने में सक्षम ना भी हो तो भी शिक्षा प्रणाली इतनी मजबूत और सार्थक होनी चाहिये
कि बच्चा आसानी से जीवन यापन कर सके !
लेकिन
समस्या इतनी ही नहीं है ! सरकारी स्कूल, जहाँ निशुल्क शिक्षा का प्रावधान है, की
हालत इतनी खराब है कि वहाँ कोई जाना ही नहीं चाहता ! या तो वहाँ स्थान नहीं है या
शिक्षक ही नहीं है ! इसलिए आज शहरों में जहाँ स्कूल जाने वालों की संख्या का
प्रतिशत गाँवों से अधिक है वहाँ भी छोटे बच्चों के लिये गली-गली में अनेकों स्कूल
खुल गये हैं जिन्हें सरकार तो कोई मान्यता नहीं देती लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि आबादी
के एक बड़े हिस्से को ये स्कूल ही शिक्षित कर रहे हैं ! विडम्बना यह है कि एक तरफ
तो हमारे पास अशिक्षितों की फ़ौज है और दूसरी तरफ ट्रेंड और अनुभवी बेरोजगार टीचर्स
की लंबी कतारें हैं जिनका सदुपयोग नहीं किया जा रहा है ! इनकी प्रतिभा एवँ
कार्यक्षमताओं का उपयोग करने का तरीका भी निकाला जाना चाहिये चाहे वह
अपराम्परावादी ही क्यों न हो ! इसी तरह अशिक्षा से जंग जीती जा सकती है ! कक्षा आठ
तक का सिलेबस इस तरह से दोबारा बनाया जाना चाहिये कि देश की परिस्थतियों के अनुसार
कम खर्च और सीमित साधनों के साथ भी रंग चोखा आ सके ! इस हकीकत से आँखें नहीं चुराई
जा सकतीं कि आने वाले कई वर्षों तक हमारी जनसंख्या का बड़ा प्रतिशत आठवीं क्लास से
ऊपर नहीं पढ़ सकेगा इसलिये घरों में खुले हुए स्कूलों को और मज़बूत और सुविधा संपन्न
करना चाहिए तथा बेरोजगार टीचर्स द्वारा पढ़ाये गये बच्चों के लिये भी प्राइवेट
परिक्षा देकर सर्टीफिकेट प्राप्त करने की सुविधा दी जानी चाहिये जो नौजवानों को
नौकरी अथवा स्वरोजगार के लिये सहायता हासिल करने में काम आ सके ! इस सत्कार्य के लिए
यदि धन की कमी आड़े आती है तो निजी व्यक्तियों, समाजसेवी संस्थाओं तथा धार्मिक
संस्थानों को सहयोग करने के लिये भी प्रेरित करना होगा ! इसके लिये टैक्स में छूट देने के नियम भी बनाये
जा सकते हैं !
देश
में शिक्षा की यह तस्वीर निश्चित रूप से चिंताजनक है ! ये आँकड़े सरकारी विभागों की
रिपोर्ट्स से एकत्रित किये गये हैं ! यदि कहीं कोई त्रुटि दिखे तो उन्हें सुधारने
के लिये आपकी प्रतिक्रियाएँ एवँ सुझावों का स्वागत है ! इस स्थिति से उबरने के
लिये और क्या किया जा सकता है इस बारे में भी पाठकों के व्यावहारिक सुझावों की
अपेक्षा रहेगी !
साधना
वैद