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Wednesday, May 3, 2017

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर




नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

स्वर्ण किरण के तारों से नित बुनी सुनहरी धूप की चादर

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

 

शेष हुआ साम्राज्य तिमिर का संसृति में छाया उजियारा

भोर हुई चहके पंछी गण मुखरित हुआ तपोवन सारा

लुप्त हुए चन्दा तारे सब सुन तेरे अश्वों की आहट

जाल समेट रुपहला अपना लौट चला नि:शब्द सुधाकर ! 

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

 

स्वर्णरेख चमकी प्राची में दूर क्षितिज छाई अरुणाई

वन उपवन में फूल फूल पर मुग्ध मगन आई तरुणाई

पिघल-पिघल पर्वत शिखरों से बहने लगी सुनहली धारा

हो कृतज्ञ करबद्ध प्रकृति भी करती है सत्कार दिवाकर !

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

 

जगती के कोने कोने में भर देते आलोक सुनहरा

पुलक उठी वसुधा पाते ही परस तुम्हारा प्रीति से भरा

झूम उठीं कंचन सी फसलें खेतों में छाई हरियाली

आलिंगन कर कनक किरण का करता अभिवादन रत्नाकर !

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

 

चित्रकार न कोई तुमसा इस धरिणी पर उदित हुआ है 

निश्चल निष्प्राणों को गति दी निज किरणों से जिसे छुआ है  

अंग-अंग सँवरा वसुधा का, सुरभित सुमनों की शोभा से

इन्द्रधनुष की न्यारी सुषमा से पुलकित हर प्राण प्रभाकर !  

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

 

स्वर्ण किरण के तारों से नित बुनी सुनहरी धूप की चादर !

नमन तुम्हें हे भुवन भास्कर !

 

साधना वैद

 

Monday, May 1, 2017

कथनी और करनी



कितनी मुश्किल चुनौतियों का संकल्प ले लिया है रे तू ने मूरख मन ! कथनी और करनी में कितना अंतर होता है कभी यह भी जाना है ? यह अंतर दोनों शब्दों के मध्य के वर्ण थ और र का ही नहीं है एक सम्पूर्ण जीवन दर्शन का है !
कथनी कितनी आसान है ! बस जिह्वा का खेल है सारा !
लच्छेदार पांडित्यपूर्ण भाषा में खूब बड़ी-बड़ी बातें कहलवा लो उससे ! ऊँचे-ऊँचे दुर्गम पर्वत शिखरों पर चढ़ाई करवा लो ! चाहे अतल अथाह सागर की तलहटी से दुर्लभ बेशकीमती मोतियों से भरी सीपियों का खजाना ढुँढवा लो, अंतरिक्ष के नितांत अनजान एवं अनचीन्हे ग्रहों की भूमि का निरीक्षण परीक्षण करवा लो या फिर धधकता दहकता पिघलता लावा उगलते ज्वालामुखियों की पाताल तक उतरी गहराई को नपवा लो ! जिह्वा के लिए सब कुछ आसान है क्योंकि उसे केवल हिलना भर है ! लेकिन जब बारी करने की आती है तो सारी कल्पनाएँ, सारी योजनायें, सारे हवाई किले ध्वस्त हो जाते हैं और तब सामने आई हुई बड़ी मामूली सी मुश्किलें भी इतनी अलंघ्य हो जाती हैं कि हम उन्हें पार नहीं कर पाते !
करनी के लिए अपनी समूची सामर्थ्य, क्षमता, निष्ठा और शक्ति को झोंक देना पड़ता है ! लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अदम्य धैर्य, लगन, समर्पण, आत्मविश्वास और साहस की आवश्यकता होती है ! बार-बार प्रयत्न करने पर भी जब सफलता कोसों दूर दिखाई देती है तो हताशा भी होती है ! लोगों की कटु आलोचना एवं निंदा भी सुननी पड़ती है और अक्सर उपहास का पात्र भी बनना पड़ता है ! किन्तु यदि सफलता के मधुर फल का रस चखना है तो बारम्बार असफलता के दंश झेलने के बाद भी निराशा पर विजय प्राप्त कर कर्तव्य पथ पर डटे रहना होगा और प्रयासों में निरंतरता बनाए रखनी होगी ! तब एक न एक दिन सफलता स्वयं कदम चूमने के लिए विवश हो जायेगी !
तो मूरख मन ! तू भी यह जान ले कि वाग्वीर और कर्मवीर में भी यही अंतर होता है ! वाग्वीर का प्रभाव तात्कालिक, चमत्कारिक, त्वरित और प्रबल अवश्य होता है लेकिन उसमें स्थायित्व नहीं होता ! जबकि कर्मवीर का प्रभाव भले ही आरम्भ में धीमा, धुँधला, संदेहास्पद और विलंबित हो वह दूरगामी और स्थाई होता है और कालान्तर में आने वाली पीढ़ियों के लिए दृष्टांत बन जाता है ! 





साधना वैद

Sunday, April 30, 2017

प्यासा मन




रीती गागर 
गहरा सरवर
रीता अंतर 

प्यासा है मन 
प्यासा है मधुबन 
प्यासा जीवन 

अब तो आओ 
तृषित हृदय की 
प्यास बुझाओ 

निहारूँ राह 
दर्शन की है चाह 
करो निर्वाह 


साधना वैद

Thursday, April 27, 2017

मैं नदी हूँ


बहती रही 
अथक निरंतर 
मैं सदियों से 

करती रही 
धरा अभिसिन्चित
मैं सदियों से 


साधना वैद

Thursday, April 20, 2017

अंतहीन सिन्धु सा तेरा अंतर माँ



अंतहीन सिन्धु सा तेरा अंतर माँ



सर्वोच्च स्थान

आदि शक्ति माता का

शाश्वत सत्य



असीम नभ

अपरिमित धरा

तेरा आलय



माँ तेरी कृपा

अथाह सागर सी

अपरम्पार



जग जननी

अगाध तेरा प्यार

सुखी संसार



दयामयी माँ

बेहद दीन पर  

करम कर



ममतामयी

अंतहीन सिन्धु सा

तेरा अंतर



अनंत शून्य

व्योम तक विस्तीर्ण

तेरी महिमा



शब्द अशेष

कैसे हो गुणगान

मैं नादान माँ



करूँ गुहार

माँ तेरी ममता का

आर न पार



कैसे समेटूँ

विपुल तेरा प्यार

गयी मैं हार



गाये संसृति

चिरंतन युग से

माँ की वन्दना



दीप जलाऊँ

आरती गाऊँ करूँ

माँ की अर्चना





साधना वैद