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Tuesday, November 20, 2018

एक फुट के मजनू मियाँ - आदरणीय रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी की नज़र से

एक फुट के मजनू मियाँ की बहुत ही सुन्दर, सार्थक एवं गहन समीक्षा आदरणीय रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी की कलम से !
बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार आपका शास्त्री जी !
Roop Chandra Shastri

सोमवार, नवंबर 19, 2018
समीक्षा "एक फुट के मजनूमियाँ” (समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
“एक फुट के मजनूमियाँ”
कुछ दिनों पहले मुझे साधना वैद की “एक फुट के मजनूमियाँ” प्राप्त हुई मैंने सोचा कि शायद ये कोई उपन्यास होगा। लेकिन जब मैंने इसको खोलकर देखा तो पता लगा कि यह एक बालकृति है। जिसमें बच्चों के लिए छोटी-छोटी बीस बालोपयोगी लघुकथाएँ संकलित हैं।
मैंने अपनी साहित्य की लम्बी यात्रा में यह पाया है कि आजकल बच्चों के लिए बहुत कम साहित्य लिखा जा रहा है। इसीलिए बच्चों का मन पढ़ाई से ऊबने लगा है और वह टी.वी. के भौंडे धारावाहिकों में उलझकर अपना मनोरंजन कर रहे हैं।
इस बालकृति पर चर्चा करने से पहले मैं इसकी रचयिता श्रीमती साधना वैद के बारे में कुछ बताना चाहता हूँ। इससे पहले भी इनकी एक पुस्तक “संवेदना की नम धरा पर” प्रकाशित हो चुकी है जिसकी समीक्षा में मैंने लिखा था- “जिसको मन मिला है एक कवयित्री का, वो सम्वेदना की प्रतिमूर्ति तो एक कुशल गृहणी ही हो सकती है। ऐसी प्रतिभाशालिनी कवयित्री का नाम है साधना वैद। जिनकी साहित्य निष्ठा देखकर मुझे प्रकृति के सुकुमार चितेरे श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी की यह पंक्तियाँ याद आ जाती हैं-
"वियोगी होगा पहला कवि, हृदय से उपजा होगा गान।
निकल कर नयनों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान।।"
आमतौर पर देखने में आया है कि जो महिलाएँ ब्लॉगिंग कर रही हैं उनमें से ज्यादातर चौके-चूल्हे और रसोई की बातों को ही अपने ब्लॉगपर लगाती हैं। किन्तु साधना वैद ने इस मिथक को झुठलाते हुए, सदैव साहित्यिक सृजन ही अपने ब्लॉग “सुधिनामा” में किया है।“
अब “एक फुट के मजनूमियाँ” की बात करता हूँ जिसमें दादी-नानी के मुँह से सुनी हुई बीस रोचक बाल कहानियों का उल्लेख है।
बालकथा संग्रह की शीर्षक कथा “एक फुट के मजनूँ मियाँ” अपने आप में बहुत रोचक है। जिसमें एक छोटे कद के व्यक्ति ने अपनी पसन्द की राजकुमारी से शादी करने के लिए एक गाड़ी बनाई थी, जिसका विवरण कथा निम्नवत् दिया गया है-
“एक फुट के मजनूँमियाँ, दो फुट की दाढ़ी,
चूहे जोत चलाते थे, सरकंडे की गाड़ी।“
माना कि यह कथा सत्य से परे बिल्कुल काल्पनिक है मगर रोचकता से भरपूर है और ऐसी ही कहानी शिशुओं को बहुत पसन्द आती है।
बाल कथा “आलसी-लालची मकड़ी” में मकड़ी ने गिलहरी, खरगोश, चूहे, छछून्दर, गौरैया, बया, मैना आदि के घर आने-जाने के लिए जन्माष्टमी के अवसर पर अपने जाले फैला दिये थे और उनमें उसकी खुद की ही टाँगें फँस गयीं थी। इसी तरह से चिड़ा-चिड़िया और बिल्ली, गपोड़शंख, चीँटी और चील, बन्दर और कछुआ, शेखचिल्ली, आदि सभी दादी नानी की कहानियों में बच्चों को सीख और प्रेरणा मिलती है।
"दिवाली की रात" और "चलो चलें माँ" कहानियों को लेखिका साधना बैद ने अपनी कल्पनाशक्ति से स्वयं रचा है।
"दिवाली की रात" में लेखिका ने यह समझाने की कोशिश की है कि हम त्यौहारों पर आनन्द जरूर मनायें लेकिन उससे किसी को भी कष्ट न हो, साथ ही कथा में मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की भी सीख दी है।
इनकी दूसरी बालकथा “चलो चलें माँ” होली के रंगों और कर्कश आवाजों में बजने वाले ढोल से से होने वाली कठिनाइयों से है। होली के त्यौहार पर बच्चे कुल्हाड़ी लेकर पेड़ काटते हैं जिससे पर्यावरण तो नष्ट होता ही है साथ ही पेड़ों पर जन्तुओं को घोंसले भी उजड़ जाते है। अतः इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि त्यौहारों पर हमारी खुशियों से दूसरों को रंज न हो इसका हमें ध्यान रखना चाहिए।
“एक फुट के मजनूमियाँ” बालकथासंग्रह को पढ़कर मैंने अनुभव किया है कि लेखिका साधना वैद ने बालकों की रुचियों को ध्यान में रखकर बालकहानियों की सभी विशेषताओं का जो निर्वहन किया है वह बच्चों के मन को समझने वाली एक कुशल लेखिका ही कर सकती है। मुझे पूरा विश्वास है कि बच्चे ही नहीं अपितु बड़े भी “एक फुट के मजनूमियाँ” बालकथासंकलन को पढ़कर अवश्य लाभान्वित होंगे और यह कृति समीक्षकों की दृष्टि से भी उपयोगी सिद्ध होगी।
“एक फुट के मजनूमियाँ” बालकथासंकलन को आप लेखिका के पते – श्रीमती साधना वैद,
33/23, आदर्श नगर, रकाबगंज, आगरा (उ.प्र.)
से प्राप्त कर सकते हैं।
इनका सम्पर्क नम्बर - 09319912798 तथा
E-Mail . sadhana.vaid@gmail.com है।
100 पृष्ठों की सजिल्द पुस्तक का मूल्य
मात्र रु. 300/- है।
दिनांकः 19-11-2018
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
कवि एवं साहित्यकार
टनकपुर-रोड, खटीमा
जिला-ऊधमसिंहनगर (उत्तराखण्ड) 262 308
E-Mail . roopchandrashastri@gmail.com
Website. http://uchcharan.blogspot.com/
Mobile No. 7906360576
--
https://powerofhydro.blogspot.com/2018/11/blog-post.html

साधना वैद 

Wednesday, November 14, 2018

एक फुट के मजनूमियाँ - डॉ. अनुपम सारस्वत की नज़र से


आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हर इंसान व्यस्त है | माता पिता बच्चों को संस्कारित  करने की इच्छा तो रखते हैं लेकिन वे उन्हें अच्छे स्कूल में शिक्षा व भौतिक सुख सुविधाएं उपलब्ध कराने की इच्छा लिए मात्र धन की व्यवस्था करने वाले माध्यम बन कर ही रह गए हैं | ऐसे में वे बच्चों के लिए समय नहीं निकाल पाते | बच्चे आज मनोरंजन का एक मात्र साधन मोबाइल को ही मानते हैं जिसके कारण समय से पूर्व ही नज़र क्षीण होने लगती है | संयुक्त परिवार व्यवस्था आज बहुत कम देखने में आती है जहाँ नानी दादी अच्छी व शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से बच्चों को संस्कारित करने का प्रयास किया करती थीं | 

ऐसी परिस्थितियों में यदि कोई बच्चों के लिए ऐसी शिक्षाप्रद व मनोरंजक कहानियाँ लिखे अथवा उनका संकलन करे तो यह बच्चों के लिए एक बहुत ही सार्थक पहल होगी | साधना वैद जी के द्वारा बाल कहानी लेखन की पहल बहुत ही प्रशंसनीय कदम है | मैंने उनकी सभी कहानियाँ पढ़ीं | सभी बहुत ही रोचक एवं शिक्षाप्रद हैं | पुस्तक के रूप में इस कहानी संग्रह का प्रकाशन बालकों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा | इन कहानियों को पढ़ने का अनुभव इतना अच्छा रहा कि मुझे तो व्यक्तिगत रूप से लगता है कि साधना वैद जी की इस पुस्तक को बच्चों के कोर्स की पुस्तक के रूप में पाठ्यक्रम में लगाना चाहिए | सरकार की ओर से यह सराहनीय कदम होगा | आशा करती हूँ कि साधना जी की यह पुस्तक सभी पढ़ेंगे व अपने बच्चों को इन शिक्षाप्रद कहानियों के माध्यम से भरपूर ज्ञान एवं मनोरंजन देंगे | इस पुस्तक की सफलता के लिए मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं ! 

प्रवक्ता डॉक्टर अनुपम सारस्वत 
एम. ए., एम. एड., पी. एच. डी.
धन्वन्तरी एजूकेशनल इंस्टीट्यू्ट, आगरा 


साधना वैद 

Wednesday, November 7, 2018

हे माँ लक्ष्मी




दीपों की माला 
आस्था के मोती 
फूलों के हार 
अर्पित हैं तुझको
हे माँँ लक्ष्मी 
खड़ा हूँ तेरे द्वार !

भर दे झोली 
सँँवार दे जीवन 
नतशिर हूँ आज 
कर दे अनुकम्पा 
पूरी कर आशा 
 बना दे काज !   

हे माता लक्ष्मी
धन धान्य, 
सुख समृद्धि,  
वैभव की दाता
यह माया दो न दो 
बस इतना वर दे दो
किसी दीन के समक्ष 
मैं स्वयं ही 
इतना दीन न बन जाऊँँ 
कि उस पीड़ित की  
व्यथा ही न देख सकूँ,
किसी अबोध के सामने 
इतना बधिर न हो जाऊँ 
कि उसकी कातर 
पुकार ही न सुन सकूँ
किसी असहाय वृद्ध के सामने 
इतना वज्र न बन जाऊँ कि
उसको सहारा भी न दे सकूँ ! 

हे माँँ लक्ष्मी 
आज दया करुणा के 
इन सद्गुणों से 
मेरा अंतर कर दो 
मालामाल 
उदारता और मानवता की 
दौलत देकर 
कर दो मुझे निहाल ! 

साधना वैद 


Friday, November 2, 2018

एक छोटा सा मकान हूँ मैं



एक छोटा सा 
बेहद खूबसूरत सा मकान हूँ मैं 
पर देखो आज कितना सूना 
कितना वीरान हूँ मैं ! 
समेटे हुए तमाम जहान का 
दर्द अपने सीने में 
कितना ग़मज़दा 
कितना हैरान हूँ मैं !
एक छोटा सा मकान हूँ मैं ! 
मेरे बचपन की यादें 
जवानी के किस्से 
ग़ज़ब शान ओ शौकत से 
लबरेज़ हिस्से 
आतंकी फ़िज़ा में 
कहीं सो गए हैं 
खामोश हैं हवाएं और
गुमसुम दरीचे 
गुज़रे ज़माने के वो बुलंद निशाँ 
या खुदा जाने 
कहाँ खो गए हैं ! 
उनके खोने से कितना 
परेशान हूँ मैं 
वादी में तनहा खड़ा
एक छोटा सा मकान हूँ मैं ! 
कितनी रौनक हुआ करती थी 
कितने कहकहे गूँँजा करते थे 
कितनी खुशबुएँ उड़ा करती थीं 
कितने पकवान बना करते थे 
कितने मीठे मीठे गीत 
हवा गुनगुनाती थी 
सैलानियों की एक टोली 
जाती थी कि दूसरी आ जाती थी ! 
तब सरगोशियाँ थीं अब खामोशी है 
तब इबादत थी अब मनहूसी है 
पहले था गुल ओ गुलज़ार 
अब आतंक की पहचान हूँ मैं 
एक छोटा सा मकान हूँ मैं ! 
भेदी घर में घुस कर बैठे 
हर कोना नापाक किया 
फूल बने बम नगमें गोली 
यह कैसा इन्साफ किया 
पकवानों से जाने क्यों 
बारूद की खुशबू आने लगी 
गीतों में जीवन की जगह 
मातम की धुन तड़पाने लगी !
कभी हुआ करता था ज़िंदा 
लेकिन अब बेजान हूँ मैं 
एक छोटा सा मकान हूँ मैं ! 
मेरे मन का कमरा कमरा 
गोली से है दाग दिया 
मेरे नाज़ुक एहसासों को 
रौंद के क्यों बर्बाद किया 
लगा दिया है साख पे बट्टा 
मुस्कानों पर पहरा है ! 
आता नहीं है डर कर कोई
गुलशन था अब सहरा है !
अपनी इस बदनामी से 
कितना पशेमान हूँ मैं 
एक छोटा सा मकान हूँ मैं ! 
मौला मेरे रहम कर मुझ पर 
दूर हटा दे ये तोहमत 
लौटा दे मेरा खोया वकार 
कर दे दफा तू हर लानत 
कर दे रौशन कमरा-कमरा 
हों खुशियों के फूल यहाँ 
दूर दूर तक मायूसी की 
बात करे ना कोई यहाँ !
सारे जहाँँ की जन्नत और 
मोहोब्बत का पैगाम हूँ मैं 
एक छोटा सा मकान हूँ मैं !


साधना वैद

Friday, October 26, 2018

तेरी याद आई



बंद घर के दरवाज़े,
बंद दिल के दरवाज़े
घंटी बजा जब भी अन्दर आई
पग ठिठके, मन उमड़ा,
हूक सी उठी दिल में और
जाने क्यों अम्मा तेरी
बहुत याद आई !

कीमती फानूस, मंहगा कालीन
बीच में सोफे में जड़े बौने से हम
ऐसे में न जाने क्यों अम्मा
आँगन में बीचों बीच पड़ी
तेरी बान की वो झूले सी खटिया
और तेरी गोद में सिर धरे की हुई
दुनिया जहान की वो ढेर सारी बातें   
बहुत याद आईं !

शिमला मसूरी से ठन्डे कमरे
तरह तरह के शरबत जूस ड्रिंक्स
काँच की कीमती क्रॉकरी और
सेवादारों की फ़ौज इन सबके बीच
जाने क्यों अम्मा हौदी के पानी से
तराई किया हुआ सोंधी-सोंधी
खुशबू से महकता आँगन
और मिट्टी के कुल्हड़ में
तेरे हाथ की बनी खुशबूदार लस्सी
बहुत याद आई !

अचानक जो पहुँचे तो
सतही बातों के संग रेस्टोरेंट का
ज़ायकेदार खाना और बाज़ार की
मंहगी मिठाई जब खाई तो  
जल्दी-जल्दी में पकी तेरे हाथों की
चूल्हे की गरमागरम रोटी, 
आलू मटर की चटपटी सब्ज़ी,
धनिये की चटनी और
गुड़ मक्खन की छोटी सी डली
बहुत याद आई !

औपचारिक हेलो हाय और
रस्मी स्वागत भी जब मेज़बान की
खीझ और ऊब ना छिपा पाए तो
असीम प्यार के साथ 
माथे पर जड़ी तेरी 
अनगिनत पप्पियाँ 
और खुशी से छलछलाती 
तेरी आँसू भरी आँखें  
बहुत याद आईं !

युग बदल गए अम्मा
रिश्ते भले ही ना बदले हों
इंसान बदल गए, 
तौर तरीके बदल गए  
रस्मो रिवाज़ बदल गए और  
लोगों के अंदाज़ बदल गए !  
इंसान की हैसियत और औकात 
भले ही बढ़ गयी लेकिन
उसकी कीमत घट गयी क्योंकि
अब जो कुछ है उसके पास
सब सतही है, दिखावटी है
और बनावटी है
न वहाँ अपनापन है 
न आत्मीयता
जानती हो क्यों अम्मा ?
वो इसलिए कि अब इंसान की
फितरत बदल गयी !


साधना वैद  

Tuesday, October 23, 2018

एक फुट के मजनूमियाँ - भूमिका आदरणीय प्रतुल वशिष्ठ जी




बच्चे युगों-युगों से अपने बड़ों से कहानी सुनते आ रहे हैं ! अच्छे मनोरंजन के साथ सुनते-सुनते उनमें दूसरी तमाम क्षमताओं का विकास भी होता है ! सभी मानते हैं कहानियों से बच्चा न केवल व्यावहारिकता सीखता है अपितु उसकी कल्पनाशीलता उसे संवेदनशील बनाने में मदद भी करती है !

प्रस्तुत पुस्तक की कहानियाँ पुस्तक बनने से पहले लेखिका के अपने ब्लॉग ‘सुधिनामा’ पर प्रकाशित होती रहीं और मैं उनका ऐसा पाठक था जिसे उन कहानियों की तलाश थी जो बच्चों को सुनाते हुए उबाए नहीं ! जिस दुनिया में  ‘बालमन घूमते हुए कभी न थके; जहाँ मनमौजीपने को सम्मान और उपहार मिलें; जहाँ हर जीव-जंतु की ज़रूरतें, कार्य और भाव अपने समाज जैसे हों; जहाँ चिढ़ना-चिढ़ाना, रूठना-मनाना, शेखी बघारना, बात-बात में गाना हो; जहाँ किरदार का चलते-चलते घिस जाना, बड़े का छोटे से हार जाना किसीको अचम्भा न लगे; जहाँ सरकंडों की गाड़ी को चूहे खींचते हों; जहाँ चिड़ा-चिड़िया दाल चावल के एक-एक दाने से खिचडी बना लें; जहाँ कूए के अन्दर परियाँ मिलें, कान तहखाना बन जाए – ऐसी दुनिया की सैर करते हुए कौन बाहर आना चाहेगा !

प्रस्तुत पुस्तक की कुछ कहानियों को मैंने अलग-अलग विद्यालयों में प्राथमिक कक्षाओं की कक्षायी प्रक्रिया के दौरान सुनाया और कुछ दिनों बच्चों की बातचीत में उसका प्रभाव भी देखा ! क्योंकि मैं इन कहानियों का स्वयं वाचक भी रहा हूँ तो कह सकता हूँ कि ‘एक थी चिड़िया’, ‘मजनूमियाँ’ जैसी विचित्र कल्पनाओं वाली कहानियाँ आज भी असरकारक हैं ! इन कहानियों में बच्चों के हिसाब से बदलने का एक अजब गुण भी है जो कहानीकार, कथावाचक की गुणग्राहकता पर निर्भर है !

पुस्तक की कहानियाँ जबरन सीख की पैरवी नहीं करतीं, स्वाभाविक सीख देती हैं ! विचित्र कल्पनाओं से स्वस्थ मनोरंजन करती हैं ! बालोचित भाव भंगिमाओं को कहानियों के किरदारों में पाकर पढ़ते हुए गुदगुदाती भी हैं !

दो साल पहले वंडररूम बाल पुस्तकालय के कहानी-कुनबा सत्रों में ‘चना न चब्बूँ क्या ?’ और ‘जैसी मेरी टोपी वैसी राजा की भी नहीं’ कहानियों ने बच्चों की जुबान पर इनके गीति वाक्यों की धुन लगा दी थी ! आज जब फिर से ये कहानियाँ सामने आईं तो अपनी सबसे करीबी गीतकहानी परीक्षणशाला ‘बेटी’ पर दो कहानियों को आजमाया ! कहानी और वाचन दोनों का उसको आनंद लेता देख भूमिका लिखना सहज हुआ !

लेखिका ‘साधना वैद’ ने जो कहानियाँ अपनी दादी-नानी से सुनीं और बरसों तक मानस में जिन्हें संजो कर रखा, समय-समय पर उन्हीं मानस मोतियों को नाती-पोतों को दिखाते हुए आज पुस्तकाकार रूप में वो सुधि पाठकों के बीच लेकर आई हैं ! मेरा विश्वास है कि इन बीस कहानियों की सरिता का श्रुति परम्परा से पाठ्य परम्परा के सागर में आना सभीको रास आयेगा !

प्रतुल वशिष्ठ
बाल साहित्यकार
(वंडररूम बाल पुस्तकालय,
राजीव गाँधी फाउन्डेशन)
दिल्ली     

Saturday, October 20, 2018

बेवजह



कहाँ माँगे थे चाँद और सितारे कभी  

तुम यूँ ही हमसे नज़रें चुराते रहे !


न रही जब ज़ुबानी दुआ और सलाम

बेवजह ख्वाब में आते जाते रहे !


तुम हमारी वफाओं पे हँसते रहे

हम जफा पे तेरी मुस्कुराते रहे !


तेरी यादों ने गाफिल किया इस तरह

बेखुदी में भी तुझको बुलाते रहे ! 


हम तुम्हें याद कर कर के जीते रहे

तुम हमें आदतन बस भुलाते रहे !


जितने नश्तर चुभोये ज़ुबां ने तेरी

हम उन्हें कुल जहाँ से छिपाते रहे ! 


ग़म के सहरा में जलती हुई रूह को  

आँसुओं की नमी से जिलाते रहे !


हम तो मरहम हैं लाये तुम्हारे लिये

तुम अंगारों पे हमको चलाते रहे !
  

वक्त की इन फिज़ाओं में नग़मे तेरे

शाख से टूट कर गुनगुनाते रहे !




साधना वैद