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Monday, June 5, 2023

घनेरी घटाओं का आलय – मेघालय – 4

 



10 मई – स्मोकी फाल्स रिज़ोर्ट की सुहानी भोर  

गुवाहाटी से चेरापूँजी के लिए चले तो रास्ते में उमियम झील, एलीफैंट फाल्स और डाइम्प्ड वैली के खूबसूरत नज़ारे देखते देखते कब साँझ उतर आई पता ही नहीं चला ! देर शाम जब हम अपने रिज़ोर्ट स्मोकी फाल्स पर पहुँचे तो अँधेरा घिर आया था ! चारों तरफ घने ऊदे बादलों से घिरे एक छोटी से पहाड़ी पर स्थित इस रिज़ोर्ट पर आने के बाद ऐसा लग रहा था जैसे किसी फ़िल्मी लोकेशन पर पहुँच गए हैं ! बादलों के बीच चटक मैरून रंग की ढलवाँ छतों वाले बेहद खूबसूरत कमरों वाले इस रिजोर्ट की सुन्दरता देखते ही बनती थी ! यह होटल किसी एक बड़ी सी आधुनिक इमारत में नहीं था ! इसका हर कमरा स्वतंत्र रूप से खुले आसमान के नीचे बना हुआ था और इन सुन्दर कमरों की खूबसूरती थके हुए तन मन और आँखों को बहुत ठंडक पहुँचा रही थी ! बस अब जल्दी से फ्रेश होकर बिस्तर में घुसने की इच्छा हो रही थी !

होटल जितना सुन्दर था यहाँ खाने की व्यवस्था उतनी ही ढीली ढाली थी ! आर्डर देने के बाद खाना बनाना शुरू करते थे वो लोग और जो बन कर सामने आता था वह भी बस कामचलाऊ ही होता था ! बिलकुल घर जैसा माहौल था ! कच्ची उम्र के युवा बच्चे होटल की व्यवस्था देख रहे थे ! और हमारे कुछ मुखर और कुछ दबंग से ग्रुप को देख कर मुझे तो कुछ घबराये से भी लग रहे थे ! बेसिक परम आवश्यक सुविधाओं के अलावा उनके पास शायद हमारी किसी भी ज़रुरत को पूरा करने का इंतजाम नहीं था ! हम जिस भी चीज़ के लिए कहें उनका जवाब ‘न’ ही होता था ! खैर यह तो मज़ाक की बात हो गयी ! रिज़ोर्ट के आसपास की खूबसूरती और जो नज़ारा हम देख पा रहे थे उसके ऊपर तो ऐसी हज़ारों असुविधाएं कुर्बान की जा सकती हैं ! और अभी भी अगर हमें दोबारा चेरापूँजी जाने का अवसर मिले तो हम उसी रिज़ोर्ट में रुकना पसंद करेंगे !

शाम को जल्दी ही खाना खाकर हम लोग सोने के लिए अपने अपने कमरों में चले गए ! गुवाहाटी से जब से चले थे पूअर सिग्नल्स और ब्रोकन कनेक्टीविटी के कारण किसीसे भी ठीक से बात नहीं हो पा रही थी ! लेकिन रिज़ोर्ट में अच्छे सिग्नल्स आ रहे थे ! सोने से पहले बच्चों से बात हो गयी और सबके साथ दिन भर की रिपोर्ट और कुछ तस्वीरों का आदान प्रदान हो गया कुछ देर सबसे वीडियो चैट भी हो गयी तो लगा दिन सार्थक हो गया ! रात को भरपूर नींद आई !
सुबह जब खिड़की से बाहर की रोशनी अन्दर आई और चिड़ियों के चहचहाने के स्वर सुनाई देने लगे तो मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी ! लगा बहुत देर हो गयी है ! रात को ही सबको ताकीद कर दी गयी थी कि सुबह ठीक साढ़े आठ बजे सब बस में बैठने के लिए तैयार मिलें ! नहा धोकर तैयार भी होना था ! चाय नाश्ता भी सबके साथ बैठ कर डाइनिंग हॉल में करना था ! बाहर फैले उजाले को देख कर मुझे घबराहट होने लगी कहीं ऐसा न हो कि हमारी वजह से सबको देर हो जाए और सबको हमारी प्रतीक्षा करनी पड़े ! मैंने जल्दी से चाय का पानी केतली में डाल कर स्विच ऑन किया और राजन ( मेरे पतिदेव ) को भी जगा दिया ! फोन पर नज़र गयी तो मैं हैरान थी ! उस समय सुबह के सिर्फ साढ़े चार बज रहे थे ! बाहर इतनी रोशनी हो रही थी जैसी आगरा में सुबह के साढ़े छह सात बजे होती है ! तब हमने इस बात को समझा कि यह तो भारत का उत्तर पूर्वी इलाका है ! यह उगते सूरज का देश है ! यहाँ सूर्योदय जल्दी होता है और प्रकृति के नैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण इस अछूते हिस्से में तो और भी जल्दी होता है क्योंकि यहाँ उसकी रोशनी को रोकने के लिए गगनचुम्बी इमारतों के जंगल जो नहीं उगे हुए हैं !

हम लोग जाग तो चुके ही थे ! चाय भी बन गयी थी ! चाय के प्याले हाथ में लिए कमरे का दरवाज़ा खोल हम बाहर निकले तो बाहर का खूबसूरत नज़ारा देख कर ठगे से रह गए ! आसमान के वक्ष पर सर टिकाए आस पास की पहाड़ियाँ अलसाई सी सोई हुई थीं ! आदित्य नारायण अपनी सुनहरी रश्मियों से उनके बालों में उँगली फेर उन्हें जगाने का प्रयास कर रहहे थे और वादी के हर कोने से पक्षियों की मधुर चहचहाहट में प्रभाती के स्वर मुखरित होकर सम्पूर्ण सृष्टि को जगाने के लिए ही जैसे गूँज रहे थे ! बगीचे में बहुत ही खूबसूरत ताज़े ताज़े फूल खिले हुए थे ! रात वादी में घिर आये बादल सुबह के बढ़ते उजास के साथ तिरोहित होते जा रहे थे जैसे उन्हें भी स्कूल, कॉलेज, कारखाने, ऑफिस, हाट बाज़ार या अपने कार्यस्थल पर समय से पहुँचने की हड़बड़ाहट हो ! रात को जहाँ बादलों के सिवा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था इस समय घनी हरियाली से लदी हुई गहरी गहरी घाटियाँ दिखाई दे रही थीं और उनमें कहीं कहीं माचिस की डिब्बियों जैसे दिखाई देते घरों के छोटे छोटे समूह वहाँ लोगों की बस्तियों के अस्तित्व की गवाही दे रहे थे ! घने पेड़ों से आच्छादित इन वादियों को देख कर ‘जुरासिक पार्क’ फिल्म की याद आ गयी !

एक-एक कर हमारे ग्रुप के सभी लोग बाहर आ चुके थे ! सबके हाथों में चाय की प्यालियाँ थीं और मुख पर अपरिमित संतोष और आनंद से भरी मुस्कान ! सबके हाथों के मोबाइल फोटो खींचने में व्यस्त थे और सब ख़ास पोज़ देकर अपनी-अपनी तस्वीरें खिंचवाने में मगन थे !

फोटो सेशन के बाद नाश्ते के लिए आवश्यक निर्देश देकर सब लोग जल्दी-जल्दी तैयार होने के लिए अपने-अपने कमरों में चले गए और फिर जल्दी ही नाश्ते के लिए डाइनिंग हॉल में सब समय से आ भी गए ! ऐसा सुना था कि विश्व में सबसे अधिक बारिश चेरापूँजी में होती है ! हम सब लोग अपने साथ छाते वगैरह सब लेकर भी गए थे लेकिन न तो नौ तारीख को बारिश मिली न ही आज बारिश के आसार दिखाई पड़ रहे थे ! मन में कहीं मलाल भी था कि बारिश के लिए विश्व प्रसिद्ध स्थान में हमने बारिश की हल्की सी फुहार भी नहीं देखी ! हमारे छाते तो खुले ही नहीं ! और कौन बेवजह बोझा उठाये यह सोच कर हम अपने साथ छाते ले भी नहीं गए ! आसमान तो बिलकुल खुला था और खूब धूप खिली हुई थी !

बस अब तो घूमने जाने के लिए बस में बैठना था सो सबने अपना-अपना आसन ग्रहण किया और चेरापूँजी की सर्पीली पहाड़ी सड़कों पर हमारा काफिला गायत्री मन्त्र और गणपति वन्दना के उद्घोष के साथ चल पड़ा ! हमारे रिजोर्ट से पहला स्थान केवल चार किलोमीटर की दूरी पर था ! जल्दी ही पहुँच गए ! लेकिन उसके बारे में आपको मैं आज नहीं बल्कि अगली पोस्ट में बताउँगी ! बहुत देर हो चुकी है और पोस्ट भी काफी लम्बी हो चुकी है ! आप भी तो थक गए होंगे ना ! तो चलिए आप भी विश्राम करिए और मैं भी चलती हूँ अब किचिन में ! अगली पोस्ट में आपसे फिर मुलाक़ात होगी ! तब तक के लिए मुझे इजाज़त दीजिये ! शुभ रात्रि !

 

साधना वैद   

 

 


Saturday, June 3, 2023

घनेरी घटाओं का आलय – मेघालय – 3

 



9 मई – गुवाहाटी से चेरापूँजी तक का सफ़र

 

आहार रेस्टोरेंट से बाहर निकलने के बाद सही अर्थों में घूमने के कार्यक्रम का शुभारम्भ अब होने जा रहा था ! सबने बस में अपना अपना स्थान ग्रहण कर लिया ! बस के स्टार्ट होते ही संतोष जी के कहने पर सबसे पहले समवेत स्वरों में सबने गायत्री मन्त्र का पाठ किया फिर अंजना जी ने बड़ी तन्मयता से गणेश जी की स्तुति की और इसके साथ ही शुद्ध मन एवं पवित्र भावना के साथ हमारी यात्रा का शुभारम्भ हुआ ! आधुनिकता और मौज मस्ती के साथ साथ आस्था और आध्यात्मिकता की इस बानगी ने मन को मुग्ध कर दिया ! मैंने देखा प्रतिदिन घूमने जाने के लिए जैसे ही हम लोग बस में सवार होते थे सबसे पहले गायत्री मन्त्र एवं गणेश वन्दना का पाठ अवश्य ही होता था ! हम सब अनजान प्रदेश में किसी भी प्रकार की विघ्न बाधाओं से सुरक्षित रहें और हमारा यह अभियान सकुशल संपन्न हो सर्वजन हिताय की यही भावना इस पार्थना के पीछे होती थी यही सोच कर सच्चे मन से हम सभी के हाथ स्वत: ही जुड़ जाया करते थे !

गुवाहाटी से शिलौंग और फिर शिलौंग से चेरापूँजी तक का फासला लगभग १५० किलो मीटर्स का है ! कहीं रुके बिना सीधे ही जाना हो तो कम समय लगता है लेकिन हमें तो रास्ते के सुन्दर पर्यटन स्थलों को भी देखना था इसलिए चेरापूँजी कब पहुँचेंगे इस ओर किसी का भी ध्यान नहीं था ! खूब गाते गुनगुनाते, अन्ताक्षरी खेलते हुए हम लोगों का काफिला सफ़र पर चल पड़ा ! रास्ते में इतने बढ़िया ताज़े रसीले फल मिल रहे थे कि सबका मन उन फलों का रसास्वादन करने के लिए अधीर हो रहा था ! बीच में दो तीन जगहों पर रुक कर अंजना जी, यामिनी और रचना जी ढेर सारे बढ़िया बढ़िया प्लम, केले और आलूचे खरीद कर ले आईं जो सबने बड़े शौक से खाए ! बीच बीच में सबके अपने निजी बैग्स से भी स्वादिष्ट नमकीन और नाना प्रकार की खाद्य सामग्रियाँ निकलती रहीं जिनसे मुख का ज़ायका बदला जाता रहा ! गर्मी भी खूब थी तो पानी भी खूब पिया जा रहा था !

इस सफ़र का पहला पड़ाव था उमियम झील ! उमियम झील मेघालय राज्य की राजधानी शिलौंग से उत्तर दिशा में लगभग १५ किलोमीटर दूर पहाड़ों में स्थित एक विशाल जलाशय है ! इसे आमतौर पर बारापानी झील भी कहा जाता है ! इसका निर्माण १९६० के दशक के आरम्भ में उमियम नदी को बाँधकर किया गया था ! झील और बाँध २२० वर्ग किमी के क्षेत्र में फैला है ! यह एक मानव निर्मित झील है जो अमेरिकी समोआ सैन मैरिनो या बरमूडा की झील से भी बड़ी है ! उमियम का शाब्दिक अनुवाद है ‘उम’ अर्थात बड़ा या अधिक और ‘यम’ अर्थात जल, यानि बड़ा या अधिक जल ! एक मान्यता के अनुसार इसका शाब्दिक अनुवाद ‘आँसू का पानी’ है ! इस झील से जुडी एक किवदंती भी मशहूर है कि पुरातन युग में दो बहने स्वर्ग से उतर कर यहाँ आई थीं, यात्रा के दौरान एक बहन खो गई और दूसरी बहन इतनी दुखी हो गई कि अपनी बहन को खोजते खोजते जब वह मेघालय पहुँची तब भी उसके आँसू बहने बंद नहीं हुए ! माना जाता है कि उसके आँसुओं से ही इस झील का निर्माण हुआ ! बहुत सुन्दर स्थान है ! झील के किनारे बड़े सुन्दर व्यू पॉइंट्स भी बने हुए हैं ! सबने खूब जम कर यहाँ फोटोग्राफ़ी की ! झील के स्पॉट पर हों और पानी का स्पर्श न मिले तो क्या मज़ा ! लेकिन पानी को छूने के लिए काफी दूर नीचे उतर कर जाना था ! अंजना जी, यामिनी और रचना नीचे उतर गयी थीं ! मैं और विद्या जी भी बोलते बतियाते धीरे धीरे नीचे उतर गए और झील के शीतल जल से हाथ पैर धोकर ही ऊपर लौटे ! एडवेंचर वाली फीलिंग आ रही थी ! उमियम झील का भरपूर आनंद लेकर हमारा काफिला फिर आगे की ओर बढ़ चला !

हमारा अगला पडाव था एलीफैंट फाल्स ! एलिफेंट फॉल्स उत्तर-पूर्व में सबसे लोकप्रिय फॉल्स में माने जाते हैं, जिन्हें स्थानीय खासी लोगों के द्वारा ‘क्षैद लाई पातेंग खोसिएव’ के नाम से पुकारा जाता है ! बाद में, अंग्रेजों ने इसका नाम एलीफेंट फॉल्स रखा क्योंकि स्थानीय नाम का उच्चारण करना उन्हें कठिन लगा ! इस झरने का शाब्दिक अर्थ है तीन चरणों वाला झरना !
यह जलप्रपात एक पहाड़ी जलधारा का परिणाम है जो जंगल की ढलान के अनुसार बहते हुए कई स्तरों पर गिरती है !
 रेलिंग वॉकवे फॉल्स के शीर्ष पर शुरू होते हैं और नीचे तक जारी रहते हैं ! नीचे झरने तक जाते हुए हम न केवल फॉल्स की भव्यता को करीब से देखते हैं बल्कि ठंडे पानी के स्प्रे और प्रवाह की गड़गड़ाहट को भी महसूस करते हैं !  झरने के तल पर स्थित पूल एक शांत स्थान है जहाँ घुटने तक गहराई में  साफ पानी में जा सकते हैं और पृष्ठभूमि में विशाल झरने के साथ एक शानदार तस्वीर खिंचवा सकते हैं !

एलिफेंट फाल्स का नाम आज के सन्दर्भ में भ्रामक लगता है लेकिन इस नाम के पीछे भी एक रोचक तथ्य है ! पहले इस झरने के पास हाथी के आकार की एक विशाल चट्टान हुआ करती थी जिसके आधार पर अंग्रेजों ने इसका नाम एलीफैंट फाल्स रखा था, 1897 में एक तीव्र भूकंप में यह चट्टान नष्ट हो गई लेकिन झरना इसी नाम से जाना जाता रहा !  एलिफेंट फॉल्स के प्रवेश द्वार पर चाय, स्नैक्स और स्मृति चिन्ह बेचने वाले स्टाल्स का एक छोटा सा खूबसूरत बाज़ार है ! यहाँ पर्यटकों के मनोरंजन एवं आकर्षण के लिए मात्र ५० रुपये अदा करके स्थानीय फैंसी ड्रेस पहन कर अपनी फोटो खिंचवाने के लिए एक छोटा सा स्टूडियो भी है ! झरने की सैर के बाद ग्रुप की सभी महिलाओं ने फैसी ड्रेस में अपनी खूब तस्वीरें खिंचवाईं ! बड़ा आनंद आया ! यह स्थान सच में बड़ा ही सुन्दर था ! ऊपर आकर सबने बेहद जायकेदार चाय का आनंद लिया ! ख़ास किस्म की अंगीठियों में बिलकुल साफ़ चमचमाती हुई केतली में चाय बना कर दूकान में बैठी युवा लड़की सबको बड़ी अदा से मुस्कुरा कर चाय पेश कर रही थी ! यहाँ के लोगों की मेहमाननवाज़ी देख कर दिल खुश हो गया !

बहुत शाम हो चुकी थी ! पिछली रात का जागरण, और दिन भर बस का सफ़र सबको खूब थका चुका था ! अब जल्दी से चेरापूँजी पहुँच कर बिस्तर में घुस कर सोने का मन हो रहा था ! रास्ते के दोनों ओर की वादियाँ घने ऊदे बादलों से पूरी तरह भर चुकी थीं ! शाम होते ही जैसे हम सब अपने अपने घरों को लौटने के लिए बेताब हो जाते हैं चाहे ऑफिस में काम करने वाले लोग हों, पार्क में खेलने वाले बच्चे हों या सैर सपाटे के लिए घर से निकले युवा हों ठीक वैसे ही छोटे बड़े बादलों के समूह के समूह इन वादियों में एकत्रित होते जा रहे थे और बादलों के सिवा वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था ! इस दृश्य को देख कर इस बात का बड़ी शिद्दत से अहसास हुआ कि इस प्रदेश का नाम ‘मेघालय’ क्यों पड़ा है !
अँधेरा होते होते हम चेरापूँजी अपने रिजोर्ट ‘स्मोकी फाल्स वैली’ में पहुँच गए थे ! इतना खूबसूरत रिज़ोर्ट है कि हम तो देखते ही रह गए ! इस हिस्से को स्कॉटलैंड ऑफ़ नॉर्थ ईस्ट ऐसे ही नहीं कहा जाता ! यह वास्तव में बेहद सुन्दर है ! कमरों का आर्किटेक्चर इतना लाजवाब और कलर स्कीम इतनी लुभावनी कि लग रहा था यूरोप के किसी शानदार पिकनिक स्पॉट पर खड़े हुए हैं ! उस दिन भी रिज़ोर्ट में पहुँचते पहुँचते बहुत थक गए थे ! आज भी यह पोस्ट लिखते लिखते बहुत थक गयी हूँ ! कल सुबह नयी ऊर्जा के साथ नए दिन का आरम्भ होगा और आपको ले चलूँगी मैं अपने साथ कुछ और बेहद खूबसूरत स्थानों पर ! तो कल तक के लिए विदा दीजिये ! शुभ रात्रि !

 

साधना वैद   

 


Wednesday, May 31, 2023

घनेरी घटाओं का आलय – मेघालय - 2

 


नौ मई – दिल्ली से गुवाहाटी, गुवाहाटी से चेरापूँजी रात के तीन बजे होली डे इन होटल से चेक आउट किया और कैब से हम इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए ! समय से एयरपोर्ट पहुँच गए ! यहाँ थोड़ी सी समस्या का सामना करना पड़ा ! हमारे पास हमारे टिकिट्स की कोई हार्ड कॉपी या प्रिंट आउट नहीं था ! मात्र वही सूचना और टिकिट्स थे जो बुकिंग के बाद संतोष जी ने हमारे पास फोन के द्वारा भेजे थे ! प्रवेश द्वार पर जब हमने अपना फोन दिखाया तो वहाँ तैनात ड्यूटी ऑफीसर ने हमें पूरा टिकिट दिखाने के लिए कहा ! हमने बताया कि हमारे पास तो यही है तो उसने हमें इंडिगो के काउंटर से इनके प्रिंट आउट निकलवा कर लाने के लिए कहा ! हम गेट न. 4 पर थे और इंडिगो का काउंटर एयर पोर्ट के बिलकुल एक कोने में था ! राजन, मेरे पतिदेव, की पीठ में दर्द था ! मेरे भी घुटनों में तकलीफ थी ! उस समय तो उसका फरमान बिलकुल ऐसा लगा जैसे किसीने हिमालय पर चढ़ने के लिए कह दिया हो ! लेकिन और कोई चारा भी तो नहीं था ! सामान की ट्रॉली धकेलते हुए इंडिगो के काउंटर पर पहुँचे ! वहाँ जो सज्जन काउंटर पर थे वे बहुत ही हेल्पिंग थे ! उन्होंने तुरंत हमारे टिकिट्स के प्रिंट आउट निकाल कर दे दिए ! हमने लौटने वाली यात्रा के प्रिंट आउट भी उनसे उसी वक्त निकलवा लिए ! जिससे लौटने वाले दिन फिर से यही कवायद न दोहरानी पड़े ! इस सारी प्रक्रिया में बहुत देर लग गयी ! लेकिन उस भले आदमी ने हमारी उम्र और डॉक्टर का रेकमेंडेशन लेटर देख कर हमारे लिए तुरंत ही व्हील चेयर्स की व्यवस्था कर दी ! उसके बाद सब कुछ बहुत आसान हो गया ! सामान इत्यादि के चेक इन कराने की ज़िम्मेदारी हमारे अटेंडेंट ने सम्हाल ली ! हमें कुछ नहीं करना पड़ा ! हमारे बैग्स चेक इन करवा कर, सीक्योरिटी चेक की औपचारिकताओं से हमें निकलवा कर चार सवा चार बजे तक बोर्डिंग लाउंज में हमें पहुँचा कर हमारे व्हील चेयर के अटेंडेंट्स हमें बाय बाय कर चले गए ! राजन ने उन्हें विदा कर दिया ! जबकि उनकी ड्यूटी हमें हवाई जहाज की सीट तक ले जाकर बैठाने की होती है ! खैर कोई बात नहीं ! दरअसल यह पहला अवसर था कि हम लोगों ने व्हील चेयर की सुविधा का उपयोग किया था ! इसके पूर्व देश विदेश की कई यात्राएं कर चुके थे लेकिन कभी व्हील चेयर पर नहीं बैठे ! इसलिए शायद उनका मन इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था कि हम अब फिजीकली इतने फिट नहीं रहे ! बोर्डिंग लाउंज में हमारे इस खूबसूरत सफ़र के बाकी हमसफ़र भी प्रसन्न चित्त हँसते बतियाते चाय कॉफ़ी की चुस्कियाँ लेते हुए मिल गए ! देहरादून से विद्या सिंह जी, शोलापुर से प्रमिला वर्मा जी, भोपाल से संतोष श्रीवास्तव जी और अंजना श्रीवास्तव जी, दिल्ली से रचना पंडया जी और प्रमिला जी की बेटी यामिनी श्रीवास्तव जी सबसे मिल कर बहुत अच्छा लग रहा था ! हमारे ग्रुप में विभिन्न आयु वर्ग के लोग थे लेकिन एक बात तय थी कि जोश, उत्साह और ऊर्जा में सब किसी भी टीन एजर से कम न थे और आने वाले सफ़र के लिए सब समान रूप से उल्लसित उत्साहित थे ! अंतत: प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं और सही वक्त पर हम दिल्ली से इंडिगो एयरलाइन के विमान में सवार हुए और सही वक्त पर गुवाहाटी के लोकप्रिय गोपीनाथ बोरडोलोई हवाई अड्डे पर उतर गए ! असम प्रदेश का एक महत्वपूर्ण शहर है गुवाहाटी ! यहाँ का एयरपोर्ट छोटा सा है लेकिन सुन्दर और साफ़ सुथरा है ! कन्वेयर बेल्ट से अपना सामान लेकर जल्दी ही एयरपोर्ट से हम बाहर निकल आये ! हमें यहीं से मिनी बस के द्वारा रास्ते के सुन्दर पर्यटन स्थलों को देखते हुए मेघालय प्रदेश के चेरापूँजी तक जाना था ! नौ तारीख की रात हमें चेरापूँजी के बेहद खूबसूरत रिसोर्ट में गुज़ारनी थी जहाँ पहले से ही हम लोगों के लिए कमरे बुक हो चुके थे ! हम लोग जल्दी ही इस यात्रा पर निकलना चाह रहे थे लेकिन हमारी बस पता नहीं क्यों लेट हो रही थी ! हम सब एयरपोर्ट के बाहर बस की प्रतीक्षा में बैठे हुए थे ! आगे की यात्रा से पूर्व सबको नाश्ता भी करना था क्योंकि फ्लाइट में कुछ न खाने की वजह से सबको इस समय तक जम के भूख भी लग आई थी ! बस के आते ही सबके चेहरों पर बत्तीस इंच की मुस्कराहट फ़ैल गयी ! हमारे बस के चालक और सहचालक दोनों बहुत ही भले और विनम्र खासी नौजवान थे जिनके नाम थे दुद्दू और दिन्तू ! दिन्तू हमारी मिनी बस के चालक थे और बस को पहाड़ी रास्तों पर चलाने में बहुत ही निपुण थे और दुद्दू बहुत ही हँसमुख, मिलनसार और मददगार प्रवृत्ति के इंसान थे जो कंडक्टर के रूप में इस बस पर नियुक्त थे ! जितने दिन हमारे साथ रहे दोनों ने हम सभी की छोटी से छोटी ज़रुरत का बहुत ही अच्छी तरह से ध्यान रखा और हर संभव हमारी सहायता की ! उन्होंने हम सीनियर सदस्यों के लिए जंगल से बाँस काट कर बहुत ही बढ़िया लाठियाँ बना कर दीं जो पूरे सफ़र में हमारे बहुत काम आईं ! अगर बाँस की यह लाठी हमारे पास नहीं होती तो लिविंग रूट ब्रिज तक पहुँचने की तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते थे ! इसका किस्सा उचित समय पर सुनायेंगे न आपको ज़रा धैर्य रखिये ! किसी भी जगह के आम नागरिकों का स्वभाव और आचरण देख कर हम इस बात का अनुमान लगा सकते हैं कि यहाँ के लोग किस तरह के होंगे तो मेरा और मेरे पतिदेव दोनों का यही मत है कि आसाम और मेघालय के लोग बहुत ही सरल और मिष्टभाषी हैं और ये अपने पकृति से जुड़े सीधे शांत एवं सरल जीवन से बहुत संतुष्ट और सुखी हैं ! इन्हें अपनी प्राकृतिक संपदा और समृद्धि पर बहुत नाज़ है ! जैसे ही हम सब बस में सवार हुए हमारा गुवाहाटी का पहला स्पॉट एक छोटा सा रेस्टोरेंट था जहाँ सबने छोले और पराँठे का जम कर ब्रंच लिया ! इस रेस्टोरेंट का नाम था आहार रेस्टोरेंट ! शोकेस में कई प्रकार की मिठाइयाँ व नमकीन इत्यादि भी बिक रहे थे ! यहाँ दीवार पर लगा हुआ मेन्यू हमारा ध्यान आकर्षित कर रहा था तो मैंने उसकी भी एक फोटो ले ली ! एक प्यारी सी युवा लड़की हम सबको अटेंड कर रही थी जो शायद उस रेस्टोरेंट की मालकिन भी थी ! बहुत अच्छा लग रहा था उसका आत्मविश्वास देख कर ! पराँठे ठीक थे लेकिन छोले बिलकुल बेस्वाद और फीके थे ! मन कर रहा था किचिन में जाकर उसे बता आऊँ कैसे बनाते हैं ढंग के छोले ! लेकिन कहते हैं ना भूख लगने पर किवाड़ भी पापड़ लगते हैं ! बिना हीले हवाले के हम सबने बड़े प्रसन्न भाव से इस नाश्ते का आनंद लिया ! मंज़िल दूर थी और हमें रास्ते में कई सुन्दर झीलों और झरनों को देखते हुए जाना था इसलिए बिना समय नष्ट किये हुए भरपेट नाश्ता करके हम आगे की यात्रा के लिए चल पड़े ! रास्ते में हाईवे के किनारे बड़ी खूबसूरती से सजी हुई फलों की अनेकों दुकाने दिखाई दीं ! उनमें बहुत ही बढ़िया बेमिसाल रसीले फल सजे हुए रखे थे ! बड़े बड़े टोकरों में आलूचे, प्लम, अंगूर इत्यादि रखे हुए थे ! केले तो इतनी खूबसूरती से सजे हुए थे कि उन्हें देख कर मन मुग्ध हो गया ! हमारे यहाँ कैसे ढेर बना कर ठेलों पर या बोरों पर रख कर फल वाले केलों को बेचते हैं ! कई बार तो अपने वज़न से ही दब कर केले खराब और पिलपिले हो जाते हैं ! लेकिन वहाँ केले ज़मीन पर या टोकरों में नहीं रखे हुए थे बल्कि बड़े करीने से दूकान में रस्सी के सहारे केले के गुच्छों को टाँग कर रखा गया था जिससे सभी केलों को पर्याप्त हवा भी मिल रही थी और कोई भी केला काला या पिलपिला नहीं दिख रहा था ! वहाँ कमल के फूल की कलियाँ भी फलों की दुकानों पर बहुतायत में मिल रही थीं जो दूर से देखने में बड़े साइज़ के भुट्टे जैसी लग रही थीं ! इनकी भी बहुत स्वादिष्ट सब्जी बनती है ! फलों का साइज़ देख कर हम हैरान थे और केले तो इतने स्वादिष्ट थे कि क्या कहें ! आगरा लौट कर आने के बाद केले खाने का मन ही नहीं हुआ ! चलिए आज की पोस्ट यहीं तक ! अगली पोस्ट में आपको अपने साथ ले चलूँगी कुछ बहुत ही सुन्दर पर्यटन स्थलों पर जहाँ के दिलकश नजारों से आपकी नज़रें हटना ही नहीं चाहेंगी ! तो आज इजाज़त दीजिये ! अगली पोस्ट में चलते हैं मेघालय की खूबसूरत वादियों की सैर पर ! तैयार रहिएगा ! फिलहाल शुभ रात्रि !

साधना वैद

Monday, May 29, 2023

घनेरी घटाओं का आलय : मेघालय - 1

 


आठ मई - आगरा से दिल्ली की ओर प्रस्थान- 


एक लम्बी अवधि के बाद फिर से प्रोग्राम बना था घूमने का और वह भी मेरी मनपसंद जगह का जिसे देखने की साध वर्षों से अपने मन में संजोये थी और जहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता के बारे में पढ़ सुन कर उसे साक्षात देखने की उत्सुकता अपने चरम पर थी ! आप समझ तो गए ही होंगे यह स्थान है उत्तर पूर्वी भारत का बेहद खूबसूरत स्थान मेघालय !
उज्बेकिस्तान की यात्रा के बाद विश्व मैत्री मंच के तत्वावधान में पर्यटन के प्रसार प्रचार के हितार्थ मेघालय त्रिपुरा की सैर का यह प्रस्ताव मेरे लिए एक सुखद फुहार जैसा ही था जिसे मैंने बिना एक पल गँवाए तुरंत ही स्वीकार कर लिया ! पतिदेव को मनाने के लिए भी बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी क्योंकि इन प्रदेशों को देखने की इच्छा इनके मन में भी कहीं न कहीं बलवती तो थी ही ! लिहाजा तुरंत ही इच्छित धनराशि जमा करवा कर हमने अपना नाम जाने वालों की सूची में दर्ज करवा लिया !

पिछले वर्ष काश्मीर का जो कार्यक्रम बना था मैं उसमें नहीं जा पाई थी ! एक तो मेरी पसली में फ्रैक्चर हो गया था दूसरे मेरी पोती बरखा का टेंथ बोर्ड का इम्तहान था ! उसे सालाना परीक्षाओं के दौरान छोड़ कर जाना मुझे उचित नहीं लगा फिर मेरी पसली में भी काफी दर्द था इसलिए सब्र करना पड़ा लेकिन मेघालय त्रिपुरा घूमने के इस अवसर को मैं किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी इसलिए अति व्यस्त होते हुए भी और कई प्रतिकूल परिस्थितियों की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए भी हमने अपने सूटकेस इस यात्रा के लिए पैक करना आरम्भ कर दिए !

अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच की संस्थापिका एवं संचालिका आदरणीया संतोष श्रीवास्तव जी हमारी ग्रुप लीडर थीं ! जैसा वो कहती गयीं हम करते गए और हमारे आने जाने के सारे टिकिट्स वगैरह भी उन्हीं के सौजन्य से बुक हो गए ! इस सुखद आनंदमय प्रवास का समय था नौ मई से सोलह मई के बीच ! बहुत छोटा सा ग्रुप था कुल आठ लोगों का ! यह भी हमें जाने से दो चार दिन पहले ही पता चला था ! इस यात्रा में हमें मेघालय के कुछ बहुत ही प्रसिद्ध एवं बहुत ही खूबसूरत प्राकृतिक पर्यटन स्थल देखने थे जो कुछ चेरापूँजी में और कुछ उसके आस पास स्थित हैं ! मेघालय की राजधानी शिलौंग की सैर करनी थी जो अपने सम्पूर्ण नैसर्गिक सौन्दर्य के साथ भी एक छोटा सा बहुत ही आकर्षक एवं आधुनिक नगर है ! इसके अलावा अपने धार्मिक, सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक वैभव से समृद्ध त्रिपुरा प्रांत की राजधानी अगरतला एवं उसके आस पास के स्थानों की सैर भी हमें करनी थी जो अपने प्राचीन मंदिरों, महलों एवं राजसी ऐश्वर्य के लिए सारे विश्व में प्रसिद्ध हैं !  

उज्बेकिस्तान की यात्रा में लगभग तीस लोगों का ग्रुप था ! लेकिन इस बार केवल आठ ही लोग थे लेकिन मत पूछिए कि हम आठ लोगों ने ही कितना धमाल किया, कितने मज़े लिए और हम सबको इस ट्रिप में कितना आनंद आया ! एक छोटा सा परिवार सा बन गया था हम लोगों का ! सब एक दूसरे के दुख तकलीफ में पूर्ण समर्पण के साथ बराबर से खड़े हुए और समान रूप से चिंतित और प्रभावित !
नौ मई की सुबह पौने छ: पर हमारी फ्लाइट को दिल्ली से गुवाहाटी के लिए उड़ान भरनी थी ! इसके लिए हमें रात को दो से तीन के बीच एयरपोर्ट पहुँच जाना था ! अगर आगरा से ही देर से निकलते और सीधे एयरपोर्ट ही पहुँचते तो बड़ी थकान हो जाती और सारी रात का जागरण हो जाता सो अलग ! इसलिए यही उचित समझा गया कि आठ तारीख को ही आगरा से दिल्ली के लिए प्रस्थान कर लिया जाए और एक रात के लिए किसी होटल में ठहर कर कुछ घंटों की नींद लेकर तीन साढ़े तीन बजे तक एयरपोर्ट पहुँच जाएँ ताकि अगले दिन के लिए यथेष्ट ऊर्जा भी बची रहे और उत्साह भी ! हमसे भी अधिक हमारे बेटे हमारी इस यात्रा के लिए उत्साहित थे ! एयरपोर्ट के ही पास ‘होली डे इन’ में बड़े बेटे स्वरुप ने हमारे लिए कमरा बुक करा दिया था और हम शाम को लगभग पाँच बजे होटल में चेक इन करके अपने आरामदायक कमरे में दिन भर की थकान उतार रहे थे ! होटल बहुत ही खूबसूरत है और उसका इंटीरियर देखते ही बनता है ! साँझ उतरते-उतरते ही नीचे डाइनिंग हॉल में जाकर बेहद ज़ायकेदार डिनर लेने के बाद हमने रात दो बजे की वेक अप कॉल रिसेप्शन पर बुक कराई ! रात को साढ़े तीन बजे एयर पोर्ट पहुँच कर रिपोर्ट करने की समस्या थी लेकिन इसका भी सामाधान आसानी से हो गया ! रात को तीन बजे होटल की कैब हमें एयर पोर्ट ड्रॉप कर देगी यह सब सुनिश्चित करने के बाद हम जल्दी ही सोने के लिए चले गए !

तो दोस्तों आज का किस्सा यहीं तक ! आपको आगे का यात्रा वृत्तांत भी तो सुनाना हैं ना ! यह था मेघालय त्रिपुरा के ट्रिप के पहले दिन यानि कि आठ तारीख का रोज़नामचा ! अभी तो खूब सारे स्थानों की आपको सैर करानी है तो तैयार रहिये मेरी अगली पोस्ट पढ़ने के लिए ! आपको सैर करायेंगे मेघालय के कुछ बेहद खूबसूरत पर्यटन स्थलों की ! आज विदा दीजिये ! आपसे जल्दी ही मुलाकात होगी यह मेरा वादा है आपसे !

शुभ रात्रि !

साधना वैद    


Saturday, May 27, 2023

जीवन घट

 




देख रही हूँ

जीवन घट रीतता ही जाता है

सुख का कोई भी पल

कहाँ थोड़ी देर भी टिकता है

वक्त के हलके से झोंके के साथ

बीतता ही जाता है !

बड़े नाज़ से उठाये थी मैं

अपने अनमोल रिश्तों की

खूबसूरत सी कलसी

कितनी उल्लसित थी  

बाँध ली थीं खूब कस कर  

सारी खुशियाँ मुट्ठी में !

पुरज़ोर कोशिश रहती थी

एक भी नन्हा सा लम्हा

कभी खिसकने न दूँ अपने हाथों से !

सारी दुनिया गुलज़ार कर दूँ

अपने मधुर गीतों से

अपनी मीठी बातों से !

लेकिन जाने कब, कैसे, किस जतन से

यह निष्ठुर वक्त मुझे छल गया

और मेरी हथेलियों से

मेरी खुशियों का वो राजमहल

रेत की मानिंद फिसल गया !

रीतता जाता है मेरा जीवन घट !

अब जो शेष है उस घट में

वो हैं कुछ आतंकित उम्मीदें,

कुछ सहमी हुई अभिलाषाएं,

कुछ कुम्हलाये हुए सपने

और हैं वक्त के सफ़र में

हाथ छुड़ा कर जाने को तैयार

कई परिचित अपरिचित चहरे

कुछ बेगाने कुछ अपने !

जाने कब कौन हाथ छुड़ा कर

अगले स्टेशन पर उतर जाए

और मेरा जीवन घट

और भी रीता कर जाए !  

 

चित्र - गूगल से साभार 



साधना वैद

 

 


Wednesday, May 24, 2023

कॉकरोच से गुफ्तगू

 



ठहर बच्चू

कहाँ भाग रहा है

पकड़ लिया

 

बड़ा सताया

आज पकड़ आया

चैन आ गया

 

घुस डिब्बे में

मना तू पिकनिक

दोस्तों के संग

 

बंद कर दूँ ?

लगा दूँ ना ढक्कन ?

क्या कहता है ?

 

जी करता है

उखाडूँ तेरी मूँछें

तोडूँ कमर

 

पर जाने दे

माफ़ कर देता हूँ

एक वादे पे

 

नहीं करेगा

कोई चीज़ खराब

शांत रहेगा

 

भागेगा नहीं

नुक्सान न करेगा

चुप बैठेगा

 

बोल करेगा

मुझसे ये प्रोमिस

मानेगा बात ?

 

तो आ जा फिर

दोस्त बन जाएँ औ’  

प्यार से रहें !

 

साधना वैद

 

 


Tuesday, May 2, 2023

श्रमिक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

 




करते रहे
जगत को रौशन
बुझे से हम

बनाते रहे
बुलंद इमारतें
पिद्दी से हम

सजाते रहे
सबके आशियाने
लुटे से हम

छप्पन भोग
परसते थालों में
भूखे से हम

सुनाते रहे
खुशयों के नगमे
रोते से हम

बजाते रहे
ढोल ताशे नगाड़े
थके से हम

पिलाते रहे
मीठे पेय सबको
प्यासे से हम

अमीर वर्ग
श्रमिक दिवस का
आनंद लेगा

श्रमिक वर्ग
उन अतिथियों की
सेवा करेगा

ऐसे ही बस
श्रमिक दिवस भी
मन जाएगा


साधना वैद