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Tuesday, August 20, 2024

हाइकु दोहे

 



धरा पुकारे, चीख कर सुन ले, पागल गाँव

बंद करो ना, छीनना मनहर, शीतल छाँव !

 

तप्त ज़मीं थी, रो पड़े खग जन, कर धिक्कार

अब तो रोको, मूर्खजन अपना, दुर्व्यवहार !

 

बरस रही, है झूम के शीतल, मंद फुहार

चलती देखो, घूम के सुरभित, मस्त बयार !

 

चितवन से, घायल करे अरु, स्मित से घात

अँखियन से, सब दुःख हरे दे, बातों से मात !

 

परम पिता, करुणा तेरी की है, हमको आस,

बुझ जायेगी, शरण में व्याकुल, मन की प्यास !

 

साधना वैद

 

 


Thursday, August 1, 2024

लॉस एंजीलिस से सेंटा बारबारा का यादगार सफ़र

 

बोस्टन फर्न 


मुझे यात्रा करना बहुत पसंद है ! सबसे ज्यादह ट्रेन से, फिर सड़क मार्ग से; पर हवाई जहाज से तो बिलकुल भी नहीं ! जानते हैं क्यों ? इसलिए कि ट्रेन के माध्यम से रास्ते में आने वाले सभी नदी तालाब, पर्वत, झरने, खेत खलिहानों से बातें भी हो जाती हैं और गाँव देहात की सुन्दर इन्द्रधनुषी जीवन शैली के दर्शन भी हो जाते हैं ! सड़क मार्ग से भी कई शहरों के अंदरूनी भाग के दर्शन हो जाते हैं और वहाँ के रहवासियों के जनजीवन की कुछ झलक तो मिल ही जाती है ! हवाई जहाज से क्या ! टेक ऑफ के कुछ देर बाद ही बस बादलों के बीच उड़ते रहो ! न ज़मीन दिखाई दे न आसमान ! न कोई परिंदा दिखे न पहाड़ ! बस एक डिब्बे में बंद बैठे रहो हाथ पैर सिकोड़े ! न ठीक से खड़े होने के, न पैर सीधे करने के और जो साथ वाली सीट पर कोई बंद किताब सा बन्दा बैठा हो तो बोलने बतियाने से भी गए ! 

इन दिनों अमेरिका में हूँ ! बस शिकागो ही हवाई जहाज से गए थे और लौटे थे बाकी बच्चों के साथ शिकागो से परड्यू यूनीवर्सिटी, जहाँ मेरा बड़ा पोता कम्प्युटर साइंस में ग्रेजुएशन कर रहा है, और सेनोजे से सैनफ्रांसिस्को, सेंटा बारबारा, लॉस एन्जीलिस, लेक टाहो, सेक्रामेन्टो, सेंटा क्लारा, ओकलैंड, लिवरमोर आदि कई स्थानों की सैर सड़क मार्ग से ही कर रहे हैं ! ये ड्राइव इतनी खूबसूरत हैं कि उस सौन्दर्य को शब्दों में व्यक्त कर पाने की क्षमता अभी तक तो मुझमें विकसित नहीं हो पाई है ! कदाचित भविष्य में शायद हो जाए आप सब प्रतिष्ठित साहित्यकारों की संगति में रह कर !

यहाँ के खेत खलिहान जंगल मैदान इतने सुन्दर हैं कि नज़रें हटने का नाम ही नहीं लेतीं ! बस दिल करता है देखते ही रहें ! एक ओर ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ तो दूसरी ओर क्षितिज तक फैला महासागर, एक ओर हर तरह के नयनाभिराम वृक्षों की समृद्ध प्रजातियाँ तो दूसरी ओर सुदूर एकांत में आमंत्रण सा देते गिने चुने खिलौने जैसे खूबसूरत घरों के छोटे-छोटे समूह ! बस यहाँ एक ही चीज़ की कमी महसूस होती है कि किसी भी छोटे शहर में आपको किसी भी प्रकार की गतिविधि या सक्रियता का आभास नहीं मिलता ! न कोई शोर, न भीड़, न सडकों पर आदमियों की आवाजाही ! यहाँ तक कि पेट्रोल पम्प पर भी कोई कर्मचारी नज़र नहीं आता ! आप खुद कार्ड से पेमेंट करें, अपने आप पेट्रोल गाड़ी में भरें और अपनी राह पकड़ लें ! न किसीसे दुआ न सलाम ! सिर्फ कुछ कारें सडकों पर चलती हुई ज़रूर दिखाई दे जाती हैं या इक्का दुक्का लोग अपने पेट डॉग्स को टहलाते हुए भूले से दिखाई दे जाते हैं ! ऐसा नहीं है कि दिन में भी नगरवासी गहरी निंद्रा में लीन रहते हैं ! बस यहाँ की संस्कृति यही है कि कोई भी सड़क पर अकारण नहीं निकलता ! शायद यहाँ का मौसम इसकी एक वजह हो ! लेकिन इन दिनों तो मौसम भी सुहाना है ! जैसा भारत में सिंतंबर अक्टूबर में होता है ! न अधिक गर्मी है न अधिक ठण्ड ! यहाँ पान की दुकानों का चलन जो नहीं है और वो भी शायद इसीलिये नहीं है कि कोई पान का खोका लगाता भी तो वह तो घाटे में ही जाता ! रेस्टोरेंट्स के अन्दर खूब चहल पहल होती है ! सिनेमा हॉल्स और थियेटर्स में भी खूब भीड़ होती है लेकिन सड़क पर किसी हॉर्न तक की आवाज़ सुनाई नहीं देती ! भीड़ के दर्शन करने के लिए महानगरों की राह पकड़नी होगी जैसे, न्यू यॉर्क, लॉस एंजीलिस, शिकागो इत्यादि ! यहाँ लोग सड़कों पर भी घूमते हुए दिखाई दे जाते हैं ! लेकिन शोर शराबा यहाँ भी नहीं होता ! किसीको ज़ोर से आवाज़ लगाते हुए आज तक नहीं सुना, न किसीके घर में, न बाग़ बगीचे में, न ही पार्क या बीच पर !  

कैलीफोर्निया खूबसूरत पाम वृक्षों के लिए जाना जाता है ! सेंटा बारबारा से लॉस एंजीलिस तक का मार्ग बहुत ही खूबसूरत है ! एक तरफ वेस्टर्न कोस्ट की हरी भरी पहाड़ियाँ हैं तो दूसरी ओर जहाँ तक दृष्टि जाए दूर तक फैला हुआ प्रशांत महासागर का अपने नाम को चरितार्थ करता बिलकुल खामोश सा विस्तार है जिसमें कहीं-कहीं कुछ उत्साही साहसी सैलानियों की नावें दिखाई दे जाती हैं या कुछ शौक़ीन लोग सर्फिंग करते हुए भी दिखाई दे जाते हैं ! आने जाने वाली कई लेन्स की सड़कों के बीच में डिवाईडर पर बेहद ही खूबसूरत फूलों से सजी अनेकों रंगों की खुशनुमां झाड़ियाँ शोभायमान हैं ! इन झाड़ियों की कटिंग इतनी सफाई से और निपुणता के साथ की जाती है कि लगता है सुन्दर रंग बिरंगे फूलों के गुलदस्तों से पूरे रास्ते को सजाया गया है ! मुझे तो अपनी दाईं ओर की हरी भरी पहाड़ियाँ और तरह-तरह के सुन्दर वृक्षों से सुसज्जित घाटियाँ ही अधिक लुभाती रहीं ! आपको एक राज़ की बात बताऊँ ! मुझे लगता है ये पेड़ भी मुझसे बातें करते हैं ! मुझे उनकी बातों में बड़ा रस आता है ! लगता है घंटों उनकी गुफ्तगू सुनती रहूँ ! एक फर्न का पेड़ है उसका नाम शायद बोस्टन फर्न है वह मुझे हमेशा गुस्से में भरा लगता है ! मैंने उसका नाम ‘चिड़चिड़ा पेड़’ रखा है ! बड़ा अनुशासनहीन सा और रूठा हुआ लगता है मुझे ! भय लगता है कुछ बोलते ही जैसे अपनी ऊबड़ खाबड़ सी डालियों से जम के खबर ले लेगा ! अगर न देखा हो तो उसे गूगल पर सर्च करके देखिएगा ज़रूर ! क्या आपको भी वही महसूस हुआ जो मुझे होता है ! बाकी पेड़ तो इतने सुन्दर थे कि क्या ही कहूँ उनकी खूबसूरती के बारे में ! छोटे बड़े, ऊँचे ठिगने, सुतवाँ लम्बे या पीपल नीम जैसे घने गोल छायादार, घने पत्तों वाले या झीनी पत्तियों वाले, सब के सब अपने पूरे अनुपम सौन्दर्य के साथ सजे धजे खड़े हुए थे जैसे किसी ब्यूटी कांटेस्ट के रैंप वॉक में हिस्सा लेने के लिए तैयार हुए हों और अभी अपने नाम की घोषणा सुन पूरे नाज़ो अंदाज़ के साथ चल पड़ेंगे प्रतियोगिता जीतने के लिए ! हमारी कार सड़क पर दौड़ रही थी और मुझे लग रहा था किनारे खड़े पाम, देवदार, फर्न, साइप्रस, ओक, पाइन आदि के पेड़ मुझे आवाज़ देकर बुला रहे हैं,
“अरे ! कहाँ जा रहे हो ? हमारी बारी आने तक तो रुक जाओ !” इन मधुर आवाजों को नकारना बहुत कष्टप्रद था ! लेकिन अपने गन्तव्य पर समय से पहुँचना भी ज़रूरी था ! छोटा पोता प्रशान्त सेंटा क्लारा यूनीवर्सिटी में अपने समर डिस्कवरी कैम्प के समापन के बाद कॉलेज में हमारा इंतज़ार कर रहा था ! मैं भी अपने अनुभव बच्चों को और पतिदेव को सुनाती तो सब मुझे पागल ही समझते ! आप भी मुझे ऐसा ही कुछ कहें इससे पहले अपना यह संस्मरण यहीं समाप्त करती हूँ ! अब तो आगरा आने में दो सप्ताह ही बाकी हैं ! वहीं आने के बाद कुछ लिखना हो पायेगा ! आज के लिए इतना
ही !

 नमस्कार !



साधना वैद   


Friday, July 12, 2024

कमाओ कीर्ति

 



किसीने किसीसे कुछ कहा !  

क्या ? 

किसीने किसीसे कुछ कहा !

किसने किससे कुछ कहा ? 

क्या कहा ? 

क्यों कहा ? 

किसने कहा ?

किससे कहा ?

कब कहा ? 

कहाँ कहा ? 

कैसे कहा ? 

कितना कहा ?

कुपित किया क्या ?  

क्यों कुपित किया ? 

क्यों करते करुण क्रंदन 

कम करो कोलाहल 

करो कोई कालजयी कृत्य 

कमाओ कीर्ति 

कमाओ कुमुदिनी कर कमल 

करें कोटिजन करतल कलरव 

करें किरीटाभिषेक !  


साधना वैद 


Wednesday, July 3, 2024

जल ही जीवन है

 



जल जीवन के लिए सबसे महत्वपूर्ण घटक है ! जल के बिना जीवन की कल्पना ही असंभव है ! इसलिए जल की कीमत और महत्त्व को समझना हमारे लिए परम आवश्यक है ! अभी तक वैज्ञानिकों द्वारा जितने भी ग्रह नक्षत्रों के बारे में जानकारी जुटाई गयी है उसके अनुसार केवल हमारी पृथ्वी पर ही पानी मिला है ! किसी और ग्रह पर पानी मिलने के संकेत नहीं मिले हैं इसीलिये जीवन भी पृथ्वी पर ही है ! सारे ही प्राणियों का जीवन, जिनमें हम मनुष्य भी शामिल हैं, जल के बिना असंभव है ! इसलिए यह बात स्वयं सिद्ध हो जाती है कि जल है तो जीवन है !   

यूँ तो हमारी पृथ्वी का तीन चौथाई हिस्सा पानी है और एक चौथाई हिस्सा ज़मीन है लेकिन यह सारा पानी पीने योग्य नहीं है ! इस जल का ९७% हिस्सा बिलकुल खारा है और जो तीन प्रतिशत पानी पीने योग्य है उसमें भी दो प्रतिशत पानी बर्फ व ग्लेशियर के रूप में जमा हुआ है ! इस तरह केवल एक प्रतिशत पानी ही हमें पीने के लिए उपलब्ध हो पाता है ! इस बात को समझना बहुत ज़रूरी है कि बढ़ती जनसंख्या के साथ इस सीमित पेयजल के इस्तेमाल के लिए अनेकों प्राणी प्रतिदिन और जन्म ले रहे हैं ! इसलिए यह बहुत ज़रूरी हो जाता है कि हम इस सीमित मात्रा में मिलने वाले पेयजल का समझदारी के साथ उपयोग करें और इसे बर्बाद तो बिलकुल भी न होने दें ! अक्सर हम देखते हैं कि लोग नल खुले छोड़ देते हैं और कोई ध्यान नहीं देता ! सार्वजनिक स्थानों पर लगे पेयजल के नलों की टोंटियाँ खराब हो जाती हैं और पानी बेवजह बहता रहता है ! ये नल राहगीरों की सुविधा के लिए लगाए गए हैं ! अगर इनकी देखभाल नहीं की जायेगी तो इनको लगाने का उद्देश्य ही ख़त्म हो जाएगा ! एक ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारा दायित्व है कि उचित विभाग में सम्बंधित अधिकारी के संज्ञान में इसे लाया जाए और पानी की बर्बादी को रोका जाए ! 

पानी की आवश्यकता पशु पक्षियों को भी होती है ! उनके लिए पेय जल की व्यवस्था की जानी चाहिए !  हमें याद है पहले शहरों में जगह-जगह पर सड़क के किनारे पानी की हौदियाँ बना दी जाती थीं जिन्हें सुबह शाम मशक से भरा जाता था ! उन दिनों ताँगे, इक्के और शिकरम चला करते थे ! सामान को इधर उधर बैलगाड़ियों से या टट्टू से ले जाया जाता था ! यातायात के आधार स्तम्भ इन घोड़ों, बैलों और टट्टुओं की प्यास बुझाने के लिए ये हौदियाँ बहुत काम आती थीं ! 

मनुष्य हो या जानवर पानी तो सभीके लिए जीने का आधार है ! बचपन में एक कविता खूब सुनी थी- मछली जल की रानी है 

जीवन इसका पानी है 

हाथ लगाओ डर जायेगी 

बाहर निकालो मर जायेगी ! 

हमारा भी वही हाल हो जाएगा अगर हमें दो दिन पानी न मिले ! इंसान खाने के बिना जीवित रह सकता है लेकिन पानी के बिना नहीं ! इसीलिये समझदारी इसीमें है कि हम पानी का इस्तेमाल किफायत से करें और यह कभी भी न भूलें कि जो पानी बेवजह बह रहा है उससे किसी प्यासे व्यक्ति की पानी की ज़रुरत पूरी हो सकती है ! 

साधना वैद 


Friday, June 28, 2024

उपहार स्वरुप क्या दें - फूल या फल और सब्जियाँ ?

 

यह बिलकुल सत्य है कि पश्चिमी सभ्यता का अनुकरण करते करते किसी भी समारोह में फूलों का गुलदस्ता देना अब बहुत अधिक प्रचलन में आ गया है ! किसीके प्रति अपनी सद्भावना एवं आदर भाव को व्यक्त करने के लिए यह एक सर्वमान्य, सुन्दर, सुरुचिपूर्ण एवं स्वस्थ परम्परा है ! अंग्रेज़ी में एक मुहावरा भी है, “Say it with flowers”.लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इन फूलों का जीवन बहुत अल्पावधि का होता है और दो तीन दिन बाद ही ये सारे सुन्दर फूल कूड़े के ढेर पर फेंक दिए जाते हैं साथ ही हज़ारों रुपये भी कूड़े के ढेर को समर्पित हो जाते हैं ! फूलों के स्थान पर सब्जियाँ देने का प्रस्ताव भी मुझे कुछ विशेष अच्छा नहीं लगा ! आजकल समाज की जैसी व्यवस्था है प्राय: परिवार बहुत छोटे छोटे हो गए हैं ! किसी समारोह में अगर दस पंद्रह लोगों ने भी सब्जी की बास्केट उपहार में दे दी तो उपहार पाने वाले के सामने कितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जायेगी उन्हें इस्तेमाल करने की ! कोई बड़ा कलाकार हुआ तो उसे तो सब्जी की दूकान लगाने की आवश्यकता पड़ जायेगी ! छोटे से परिवार में फल फ्रूट या सब्जी की खपत ही कितनी होती है ! अधिक से अधिक एक डेढ़ किलो ! एक तो समारोह स्थल से घर ले जाने की समस्या फिर ज़रा सोचिये उनके घर में २५-३० किलो सब्जी और फल आ जायेंगे तो वे क्या करेंगे ! फूल तो मुरझाने के बाद फेंक भी दिए जाते हैं लेकिन फल और सब्जियों को तो फेंकना भी गवारा नहीं होगा न ही इतनी खाई जा सकेंगी ! मोहल्ले पड़ोस में बाँटने की मुसीबत और मढ़ दी जाए उस सम्मानित व्यक्ति पर ! मेरे विचार से सबसे अच्छा उपहार पौधों का ही होता है ! हरे भरे छायादार वृक्षों के या खूबसूरत फूलों के पौधे उपहार स्वरुप दिए जाने चाहिए ताकि पर्यावरण का भी संरक्षण हो, प्रदूषण भी घटे और हरियाली भी भरपूर हो जाए ! सोचिये ज़रा शहर में कितने सम्मान समारोह रोज़ होते हैं ! सम्मानित व्यक्तियों को नीम, पीपल, बरगद, आम, अमरुद, जामुन इत्यादि के पौधे उपहार स्वरुप दिए जाएँ तो शहर की तस्वीर ही बदल जायेगी ! कितना वृक्षारोपण होगा और शहर की वायु शुद्ध हो जायेगी ! पौधे उपहार स्वरुप देने से धन की भी बर्बादी नहीं होगी बल्कि उपहार देने वाले के धन का सच्चे अर्थों में सदुपयोग ही होगा ! सम्मानित व्यक्ति के घर में भी अनुपयोगी उपहारों का ढेर नहीं लगेगा ! धरती माँ और प्रकृति भी प्रसन्न हो जायेगी ! पंछी पखेरुओं की दुआ लगेगी और इतने फूलों को भी असमय पेड़ों से नहीं तोड़ना पड़ेगा ! फूल वृक्षों पर ही शोभित होते हैं, घूरे पर नहीं ! 


साधना वैद 


Tuesday, June 25, 2024

प्रेम प्रसाद - प्रथम प्रांजल प्रस्तुति





प्रियतम पुकारे

प्रेमातुर प्रणयिनी प्रियतमा

परसे परछाईं

पूछे प्रश्न प्रति प्रश्न

प्रबल प्रखर प्रवाहमान प्रेमावेग

प्रस्फुटित प्रेम पाती

पी पी प्याला प्रेमरस

पागल पवन पहुँचाए पाती

प्यारी प्रियतमा

पहने पीत परिधान

पहुँचे पवित्र प्रकोष्ठ

पूजे परम पूज्य

प्राण प्रतिष्ठित पावन प्रतिमा

प्रज्वलित प्रदीप

पहनाये पुष्पहार

प्रति पल प्रार्थनारत

पावे प्रतिदान

प्रेम प्रसाद !



चित्र - गूगल से साभार


साधना वैद 

Thursday, June 20, 2024

क्या कहते हैं ये पेड़

 




जो काट दोगे

कहाँ फिर पाओगे

इतने फल

 

कैसे मिलेगी

इतनी प्राणवायु

इतना बल

 

काट के मुझे

बन जाएगा सोफा

या एक कुर्सी

 

जिन पे बैठ

कर लेना बातें या

मिजाजपुर्सी

 

पर न भूलो

घुट जायेगी साँस

जो पेड़ काटे

  

रोयेगी कुर्सी

धूल फाँकेगा सोफा

सहोगे घाटे

 

कृतघ्न प्राणी

हमने सिर्फ दिया

तुमने लिया

 

कभी न माँगा

उदारतापूर्वक

दिया ही दिया

 

और तुमने ?

हमें ही काट डाला

यह क्या किया ?

 

कितना क्रूर

हमारे सौहार्द्र का

बदला दिया ?

 

कैसे पाओगे

ताकत के प्रतीक

रसीले फल


शीतल हवा

जीने को प्राणवायु

सुखद पल

 

तपी धरती

झुलसता ब्रह्माण्ड

अब तो जागो

 

छोड़ो मूढ़ता

लगाओ हरे पेड़

इन्हें न काटो

 

हरे वृक्ष हैं

जीवन का आधार

यही सत्य है

 

इनकी सेवा

इनका संरक्षण

पुण्य कृत्य है !

 

साधना वैद