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Tuesday, May 14, 2013

बादल तेरे आ जाने से ...






बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है,
मुझको जैसे कोई अपना,
 कुछ कहने को मिल जाता है !

पहरों कमरे की खिड़की से
तुझको ही देखा करती हूँ ,
तेरे रंग से तेरे दुःख का
अनुमान लगाया करती हूँ !
यूँ उमड़ घुमड़ तेरा छाना
तेरी पीड़ा दरशाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

तेरे हर गर्जन के स्वर में
मेरी भी पीर झलकती है,
तेरे हर घर्षण के संग-संग
अंतर की धरा दरकती है !
तेरा ऐसे रिमझिम रोना
मेरी आँखें छलकाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

कैसे रोकेगा प्रबल वेग
इस झंझा को बह जाने दे ,
मत रोक उसे भावुक होकर
अंतर हल्का हो जाने दे !
धरिणी माँ का आकुल आँचल
व्याकुल हो तुझे बुलाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

हैं यहाँ सभी तेरे अपने
झरने, नदिया, धरती, सागर ,
तू कह ले इनसे दुःख अपना
रो ले जी भर नीचे आकर !
तेरा यूँ रह-रह कर रिसना
इन सबका बोझ बढ़ाता है
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

तेरे आँसू के ये मोती
जब खेतों में गिर जायेंगे ,
हर एक फसल की डाली में
सौ सौ दाने उग जायेंगे !
धरती माँ का सूखा आँचल
तेरे आँसू पी जाता है !
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है ,
मुझको जैसे कोई अपना
   कुछ कहने को मिल जाता है !  

साधना वैद

Friday, May 10, 2013

कितने कर्ज़ उतारूँ माँ..... ?













ओ माँ...
मैं तेरे कितने कर्ज़ उतारूँ ?
तूने जीने के जो लिये साँसें दीं
उसका कर्ज़ उतारूँ या फिर
तूने जो जीने का सलीका सिखाया
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
तूने ताउम्र मेरे तन पर   
ना जाने कितने परिधान सजाये
कभी रंग कर, कभी सिल कर   
उसका क़र्ज़ उतारूँ
या फिर शर्म ओ हया की
धवल चूनर में
मर्यादा का गोटा टाँक  
जिस तरह से मेरी
अंतरात्मा को उसमें लपेट दिया   
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
माँ तूने अपने हाथों से नित नये
जाने कितने सुस्वादिष्ट पकवान
बना-बना कर खिलाये कि
जिह्वा उसी स्वाद में गुम
आज तक अतृप्त ही है
उसका क़र्ज़ उतारूँ या फिर
जो मिला जितना मिला उसीमें
संतुष्ट रहने का जो पाठ  
तूने मुझे पढ़ाया
उसका क़र्ज़ उतारूँ !   
मासूम बचपन में जो तूने स्लेट
और तख्ती पर का ख ग घ और
एक दो तीन लिखना सिखाया
उसका क़र्ज़ उतारूँ या मेरे अंतरपट
पर अनुशासन की पैनी नोक से
जो सीख और संस्कार की
एक स्थायी इबारत तूने उकेर दी
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
तूने माँ बन कर मुझे जिस
प्यार, सुरक्षा, और निर्भीकता के
वातावरण में जीने का अवसर दिया
उसका क़र्ज़ उतारूँ या फिर
जिस तरह से मेरे व्यक्तित्व में
माँ होने के सारे तत्वों को ही
समाहित कर मुझे एक अच्छी माँ
बनने के लिये तैयार कर दिया
उसका क़र्ज़ उतारूँ !
माँ... यह एक ध्रुव सत्य है कि
तेरे क़र्ज़ मुझ पर अपरम्पार हैं
जितना उन्हें उतारने का
प्रयास मैं करूँगी
मेरे पास बची अब थोड़ी सी
समय सीमा में
तेरे ऋण से उऋण होने का
मेरा यह उपक्रम
अधूरा ही रह जायेगा !
उस परम पिता परमेश्वर से
बस इतनी ही प्रार्थना है कि
अपने बच्चों की माँ होने के लिये
यदि वह मुझमें तेरे व्यक्तित्व का
हज़ारवाँ अंश भी डाल देगा
तो मेरा माँ होना सफल हो जायेगा
और शायद तुझे भी
वहाँ स्वर्ग में मुझ पर
अभिमान करने की कोई तो
वजह मिल ही जायेगी !
है ना माँ ... !

साधना वैद

Tuesday, May 7, 2013

माँ



रात की अलस उनींदी आँखों में
एक स्वप्न सा चुभ गया है ,
कहीं कोई बेहद नर्म बेहद नाज़ुक ख़याल
चीख कर रोया होगा ।

सुबह के निष्कलुष ज्योतिर्मय आलोक में
अचानक कालिमा घिर आयी है ,
कहीं कोई चहचहाता कुलाँचे भरता मन
सहम कर अवसाद के अँधेरे में घिर गया होगा ।

दिन के प्रखर प्रकाश को परास्त कर
मटियाली धूसर आँधी घिर आई है ,
कहीं किसी उत्साह से छलछलाते हृदय पर
कुण्ठा और हताशा का क़हर बरपा होगा ।

शिथिल शाम की अवश छलकती आँखों में
आँसू का सैलाब उमड़ता जाता है ,
कहीं किसी बेहाल भटकते बालक को
माँ के आँचल की छाँव अवश्य मिली होगी ।

साधना वैद

Sunday, May 5, 2013

हर शाख पे उल्लू बैठा है.......




इकबाल का एक शेर है –

बर्बाद गुलिस्तां करने को तो एक ही उल्लू काफी था
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा !

भारतीय राजनीति के फलक पर यह शेर इन दिनों बिलकुल सटीक बैठता है ! घोटालों की लंबी फेहरिस्त में आज एक और नया नाम जुड़ गया है रेल गेट घोटाला ! यू पी ए 2 में तो घोटालों की बरसात थमने का नाम ही नहीं ले रही है ! हमारे विश्वप्रसिद्ध मौनी बाबा अर्थशास्त्री, जिनकी ईमानदारी का डंका भी बड़ी ज़ोर से पीटा जाता था, उन्होंने अपने देश को दस सालों में दिवालिया बना कर विश्व प्रसिद्ध घोटालेबाज और बेईमान देशों की सूची में सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दिया ! 

भ्रष्टाचार निवारण के सन्दर्भ में बहुत से भ्रम और उम्मीदें अब चकनाचूर हो चुकी हैं ! सोचा था देश में शिक्षा के प्रसार के बाद जब पढ़े लिखे नेता राजनीति में आयेंगे तो इस दुखी और दीन हीन देश के आँसू पोंछेंगे और कष्टों को कम करेंगे ! परन्तु हुआ क्या ? जितना उच्च शिक्षित और प्रोफेशनल नेता उतना ही बड़ा घोटाला ! घोटालों के नाम गिना कर आपका अमूल्य समय बर्बाद करना नहीं चाहती ! बच्चे-बच्चे की ज़बान से इन दिनों तेज़ाब फिल्म के ‘एक दो तीन’ वाले गीत की तरह इन घोटालों की गिनती आप सुन सकते हैं ! अफ़सोस इस बात का है कि हमारे चुने हुए इन ‘अनमोल रत्नों’ ने देश को किस गर्त में पहुँचा दिया है ! 

भला हो अपनी मीडिया का और इलेक्ट्रोनिक तकनीक का जिसके माध्यम से सबकी पोल तो कम से कम अब खुल रही है और जनता के सामने भेड़ का मुखौटा पहन कर आने वाले नेताओं के भेड़ियों वाले चहरे बेनकाब हो रहे हैं ! यह भी सच है कि अब तो चुनाव भी करीब हैं ! हमको नये नेता चुनने का अवसर मिलेगा लेकिन अच्छे नेता चुनना उतना ही मुश्किल होगा जितना बासी सब्जियों की ढेर में से छाँट-छाँट कर कम खराब और काम चलाऊ सब्जी छाँटना ! और मेरे हिसाब से तो सब्जी छाँटना तो फिर भी आसान है क्योंकि वह जैसी है आपके सामने है ! चुनाव के प्रत्याशियों में से अच्छे प्रत्याशी का चयन करना बहुत टेढ़ी खीर है क्योंकि किसके मन में क्या है या जीतने के बाद वह किस तरह से गिरगिट की तरह रंग बदलेगा यह अनुमान लगाना और भी मुश्किल होता है !

अभी तो गुलिस्तां के हर पेड़ और हर शाख पर रोशनी डाली ही नहीं गयी है ! इस गुलशन को उजाड़ कर अपने छोटे-छोटे घोंसलों की जगह आलीशान महल बनाने के मंसूबे मन में दबाये ना जाने कितने और उल्लू वहाँ छिपे बैठे मिल जायेंगे यह कहना मुश्किल है ! जिनके हाथों में हमने में रोशनी करने के लिये मशाल थमाई थी और इन लुटेरे उल्लुओं को मार भगाने के लिये सारे इंतजाम करके दिये थे वे या तो नींद में गाफिल हैं या गाँधीजी के बंदरों की तरह तटस्थ भाव से आँख कान और मुँह बंद किये बैठे हैं ! ना उन्हें कुछ गलत सुनाई देता है, ना दिखाई देता है, ना ही वे किसीके खिलाफ मुँह खोलने की हिम्मत करते हैं ! वे बस बेमतलब की बयानबाजी कर रहे हैं या एक दूसरे को देख कर खों-खों कर रहे हैं ! कहेंगे भी कैसे ! जिसके खिलाफ मुँह खोलेंगे वह ना जाने किस-किस की काली करतूतों का हमराज़ है और डर है कि ना जाने किस-किस के चेहरों से नकाब उतरने का खतरा सामने आ जाये ! इसीलिये नेताओं ने सोच रखा है कि भला इसी में है कि चुप्पी साध लो ! ना किसीके लेने में रहो ना देने में ! हमारे मौनी बाबा भी इसी बात में यकीन रखते हैं कि ---

किस-किस को याद कीजिये, किस-किस को रोइये,
आराम बड़ी चीज़ है, मुँह ढक के सोइये !  


साधना वैद  

Wednesday, May 1, 2013

रानी







वह रोज आती है मेरे यहाँ अपनी माँ के साथ ! छोटी सी बच्ची है पाँच छ: साल की ! नाम है रानी ! माँ बर्तन माँज कर डलिया में रखती जाती है वह एक-एक दो-दो उठा कर शेल्फ में सजाती जाती है ! छोटे-छोटे हाथों से बड़े-बड़े भारी बर्तन कुकर कढ़ाई उठाती है तो डर लगता है कि कहीं गिरा न ले अपने पैरों पर ! कितनी चोट लग जायेगी !
मैं उसे प्यार से अपने पास बिठा लेती हूँ अक्सर ! बिस्किट, रस्क या कुछ खाने को दे देती हूँ कि उसकी माँ उसे काम ना बता पाये ! लेकिन ज़रा देर में ही उसकी पुकार लग जाती है ! कभी पुचकार के साथ तो कभी खीझ भरी झिड़की के साथ !
चल रानी ! जल्दी-जल्दी डला खाली कर दे बेटा ! फिर झाडू भी तो लगानी है ! ज़रा जल्दी हाथ चला ले !
मेरे मन में मरोड़ सी उठती है ! मेरे परिवार में भी बच्चियाँ हैं ! अच्छे स्कूल में पढती हैं ! क्या इस बच्ची को पढ़ने का हक नहीं है ! क्या उसका बचपन इसी तरह अपनी माँ के साथ बर्तन माँजते और झाडू लगाते ही बीत जायेगा ! अगर यह नहीं पढ़ा पा रही है तो मैं उसके स्कूल की फीस भर दूँगी ! कम से कम उसका भविष्य तो बन जायेगा ! मैं उसकी माँ मीरा को बुलाती हूँ ! उसे अपने मन की बात बताती हूँ ! लेकिन मेरी बात सुन कर जब उसके चहरे पर कोई अपेक्षित प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती है तो मुझे आश्चर्य के साथ कुछ निराशा भी होती है !
मैं तो उसका स्कूल में एडमीशन करवाना चाहती हूँ और तुम कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखा रही हो ! इतनी ज़रा सी बच्ची से घर का काम करवा रही हो पता है यह अपराध होता है ! बच्चों से काम नहीं कराते ! किसीने रिपोर्ट कर दी तो हमें भी सज़ा हो जायेगी और तुम भी लपेटे में आ जाओगी ! इसे अपने साथ मत लाया करो !
 तो कहाँ छोड़ कर आऊँ इसे आप बताओ ! मीरा जैसे फट पड़ी ! सारा दिन तो मेरा आप लोगन के घर के काम करने में निकल जाता है ! इसे घर में किसके पास छोड़ूँ ! इसका बाप सुबह से ही कारखाने चला जाता है काम पर ! लड़के भी दोनों अभी बच्चा ही हैं ! स्कूल से आकर बाहर दोस्तों में डोलने चले जाते हैं ! उनके ऊपर इसकी जिम्मेदारी कैसे डाल सकू हूँ ! लड़की जात है इसीके मारे साथ लेकर आती हूँ ! सबका काम निबटाते-निबटाते मुझे संजा के सात बज जाते हैं ! कैसा बुरा बखत चल रहा है आजकल ! अकेली छोरी चार पाँच बजे संजा को स्कूल से घर लौटेगी तो कौन इसे देखेगा ! इसीलिये इसका नाम नहीं लिखवाया ! मेरी आँख के सामने रहेगी तो बची तो रहेगी ! नहीं तो आजकल तो हर जगह बस एक ही बात सुनाई देत है ! कैसा बुरा ज़माना आ गया है !
मुझे कोई जवाब नहीं सूझ रहा था ! वाकई मीरा जैसे लोगों की समस्या गंभीर है ! यह भी कामकाजी महिला है ! लेकिन अपने बच्चों को क्रेच में नहीं डाल सकती ! लड़कों को पढ़ा रही है लेकिन लड़की को स्कूल में सिर्फ इसलिए नहीं भर्ती कराया कि उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किस पर डाले ! कैसे विचित्र नियम और क़ानून हमने बनाये हैं ! श्रम दिवस के गुणगान बहुत गाये जाते हैं लेकिन जो वास्तव में श्रमजीवी हैं उनके लिये ये क़ानून कितने सुविधाजनक एवँ फलदायी हैं और कितने समस्याएँ बढ़ाने वाले और दिक्कतें पैदा करने वाले हैं इसका आकलन करने की ज़हमत कौन उठाता है ! जबकि सबसे ज्यादह ज़रूरत इसी बात की है !
 स्वयंसेवी संस्थायें जो निर्धन बस्तियों में इनकी सहायता के लिये काम कर रही हैं उन्हें इन बच्चों के लिये नि:शुल्क क्रेच खोलने चाहिये जहाँ इन्हें प्रारम्भिक शिक्षा भी मिल सके, इनके खेलकूद, मनोरंजन एवँ उम्र के अनुसार इनकी कलात्मकता को बढ़ावा देने वाली ट्रेनिंग की भी समुचित व्यवस्था हो और ये एक सुरक्षित एवँ स्वस्थ माहौल में रह सकें ! मँहगाई इतनी बढ़ी हुई है कि इस वर्ग के परिवार में एक व्यक्ति की कमाई से सबका पेट भर जाये यह कल्पना भी असंभव है ! और माता पिता जब दोनों ही काम पर निकल जाते हैं तो नासमझ बच्चे गली मोहल्लों में असुरक्षित यहाँ वहाँ घूमते रहते हैं जिन्हें समाज में व्याप्त नकारात्मक प्रवृत्ति के लोग आसानी से मिठाई, चॉकलेट्स या खिलौने इत्यादि का लालच देकर आसानी से फुसला लेते हैं और फिर हृदय विदारक पाशविक घटनाओं को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं !
बच्चों के यौन शोषण की समस्या की जड़ें कहाँ पर हैं उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है यह तो बहुत ही पेचीदा सवाल है ! सबकी मानसिकता में रातों रात सुधार आ जाये, फिल्मों, टीवी, या सेंसर बोर्ड के सारे कायदे कानूनों में बदलाव कर दिया जाये, लोगों को नैतिक शिक्षा और संस्कारों की घुट्टी पिलाना शुरू कर दी जाये ये सब बातें कहने सुनने में भले ही अच्छी लगें पर व्यावहारिकता के स्तर पर अमल में लाना असंभव हैं ! लेकिन अगर हम सचमुच गंभीरता से कोई निदान ढूँढना चाहते हैं तो इतना तो कर ही सकते हैं कि नासमझ छोटे बच्चे सड़कों पर लावारिस घूमते ना दिखें इसके लिये कुछ ऐसी व्यवस्था की जाये कि माता पिता पर बिना कोई अतिरिक्त भार डाले हुए बच्चों की बुनियादी शिक्षा और सुरक्षा का दायित्व उठा लिया जाये ! और ज़रूरी नहीं है कि प्रोफेशनल एन जी ओज़ ही इस तरह के काम को अंजाम दे सकते हैं ! शहरों में कुछ इस तरह की व्यवस्था होती है कि जहाँ सम्भ्रांत लोगों की रिहाइशी कॉलोनीज़ होती हैं उन्हीं के आस पास उनके घरों में तरह तरह से अपनी सेवाएं देने वाले वर्ग के लोगों की बस्तियाँ भी होती हैं ! सम्भ्रांत लोग अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा तो चाक चौबंद रखते हैं लेकिन दरिंदों की लपेटे में ये बच्चे आ जाते हैं जिनके पास उनके घर वालों की रहनुमाई उपलब्ध नहीं होती क्योंकि वे उस समय आपको घरों में आपकी सेवा में उपस्थित होते हैं और जिनके बिना आपका एक वक्त भी काम नहीं चल सकता ! तो क्या हम इनकी सेवाओं के बदले इतना भी नहीं कर सकते कि इनके बच्चों को कुछ समय देकर उनकी सुरक्षा, शिक्षा और खुशी के लिये थोड़ा सा वक्त दे दें ! इससे कितनी ही रानी, गुड़िया, मुनिया, बिटिया तो बच ही जायेंगी हमें भी खुद पर नाज़ करने के लिये एक पुख्ता वजह मिल जायेगी !

साधना वैद