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Friday, July 31, 2020

त्रिशंकु




घर में प्रवेश करते ही प्रतीक ने वेतन का पैकेट पत्नी प्रतिमा के हाथों में थमाया और हाथ मुँह धोने के लिए बाथरूम में घुस गया ! बाथरूम से बाहर आया तो देखा प्रतिमा रुपये गिन रही थी ! अचानक ही प्रतीक असहज सा हो गया !
“अम्माँ के कमरे में जा रहा हूँ ! चाय वहीं ले आना !” प्रतीक ने कमरे से बाहर निकलते हुए प्रतिमा से कहा !
अलमारी में रुपये रख कर प्रतिमा चाय बनाने के लिए किचिन में चली गयी !
अम्माँ की तबीयत बहुत खराब चल रही थी ! बाबूजी भी अस्सी के पार हो चुके थे ! उनका स्वस्थ या अस्वस्थ होना कुछ मायने नहीं रखता था ! वर्षों पहले रिटायर हो चुके थे ! गाँव में न अच्छे डॉक्टर्स थे न इलाज की कोई अच्छी व्यवस्था ! पत्नी की सेहत जब बहुत अधिक गिरने लगी तो इकलौते बेटे के पास दिल्ली आने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था उनके पास ! दिल्ली में इलाज अच्छा हो या न हो मँहगा ज़रूर बहुत था ! यहाँ आकर वे सिर्फ घर के ही होकर रह गए थे ! ना किसीको जानते पहचानते थे ना दिल्ली की जीवन शैली की उन्हें आदत थी ! बस हैरान परेशान बीमार पत्नी के सिरहाने बैठे रहते और उनकी पल पल गिरती दशा को देख व्याकुल होते रहते !
प्रतिमा को अपने छोटे से फ़्लैट में बीमार सास और ससुर का यूँ आ जाना ज़रा भी नहीं सुहाया लेकिन कर भी क्या सकती थी ! इकलौते बेटे बहू का फ़र्ज़ तो निभाना ही था चाहे हँस कर या रोकर !
चाय पीते-पीते बाबूजी ने बताया, “दिन में डॉक्टर आये थे बबुआ ! तुम्हारी अम्माँ को जो बार बार दौरा सा आ जाता है उसके लिए एम आर आई करवाने के लिए कह गए हैं ! कल न हो तो आधे दिन की छुट्टी ले लेना तो दिखा देना अपनी अम्माँ को !” डॉक्टर का पर्चा देख प्रतीक का चेहरा उतर गया था !
“आप फ़िक्र ना करें बाबूजी ! मैं करता हूँ कुछ इंतजाम !” कह कर प्रतीक अपने कमरे में आ गया ! कमरे में प्रतिमा का मूड बहुत उखड़ा हुआ था,”तनख्वाह के रुपयों में दो हज़ार रुपये कम निकले ! किसीको दिए हैं क्या ?”
“हाँ ! अम्माँ बाबूजी अचानक से आये थे ना पिछले महीने ! तब अम्माँ के टेस्ट्स वगैरह कराने के लिए शुक्ला जी से लिए थे दो हज़ार रुपये ! आज सबको तनख्वाह मिली तो उन्होंने माँग लिए ! देने तो थे ही ! मना कैसे करता !” प्रतीक की आवाज़ में मायूसी थी ! “अब कल फिर डॉक्टर ने एम आर आई कराने को बोला है ! कम से कम चार पाँच हज़ार कल खर्च हो जायेंगे !”
प्रतिमा का पारा आसमान पर चढ़ चुका था !
”मुझे कुछ नहीं पता है ! दो महीने से विशु ट्रैकिंग पर जाने के लिए पाँच हज़ार रुपये माँग रहा है ! हमारा भी इकलौता बेटा है ! पिछले महीने भी उसे समझा बुझा कर टाल दिया था मैंने ! इस बार नहीं होगा यह ! अम्माँ बाबूजी को गाँव की बस में बिठा दो कल ! ये रुपये मेरे विशु के लिए हैं ! इनको हाथ नहीं लगाने दूँगी मैं !”
प्रतिमा की आवाज़ तार सप्तक में गूँज रही थी !  प्रतीक सहम गया था !
“अरे क्या हो गया है तुम्हें ? धीरे बोलो ! बाबूजी सुन लेंगे तो क्या सोचेंगे !”
बाबूजी स्याह चेहरा लिये दरवाज़े पर ही खड़े थे ! अम्माँ के कमरे से काँपती थरथराती आवाज़ आ रही थी, “बबुआ रे !”
बाबूजी की छाती फटी जा रही थी ! उनके चहरे पर की स्याही के कुछ छींटे उड़ कर प्रतीक के चहरे पर भी फ़ैल गए थे लेकिन प्रतिमा इस सबसे असम्पृक्त अपने रौद्र रूप में चंडिका बनी खड़ी हुई थी !

चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद

Wednesday, July 29, 2020

खलल



न नींद न ख्वाब
न आँसू न उल्लास,
वर्षों से उसके नैन कटोरे  
यूँ ही सूने पड़े हैं !

न शिकवा न मुस्कान
न गीत न संवाद,
सालों से उसके शुष्क अधरों के
रिक्त सम्पुट
यूँ ही मौन पड़े हैं !

न आवाज़ न आहट
न पदचाप न दस्तक,
युग-युग से उसके मन के
इस निर्जन वीरान कक्ष में
कोई नहीं आया !

न सुख न दुःख
न माया न मोह
न आस न निरास
न विश्वास न अविश्वास  
न राग न द्वेष
हर ध्वनि प्रतिध्वनि से
नितांत असम्पृक्त एवं विरक्त
आजीवन कारावास का
दंड भोगता यह एकाकी बंदी
अपनी उम्र की इस निसंग
अभिशप्त कारा में
पूर्णत: निर्विकार भाव से  
न जाने किस एकांत साधना में
एक अर्से से लीन है ! 

ऐसे में उसकी तपस्या में
‘खलल’ डालने के लिए
किसने उसके द्वार की साँकल
इतनी अधीरता से खटखटाई है ?
यह किसकी पदचाप है जो 
शत्रु सेना के आक्रामक सैनिकों की 
उद्दण्डता लिए हृदय को 
भयाक्रांत कर देने पर आमदा है ?

ओह, तो यह तुम हो मृत्युदूत !
कह देना प्रभु से,
परम मुक्ति का तुम्हारा यह
अनुग्रह्पूर्ण सन्देश 
या यूँ कह लो कि तुम्हारा यह 
धमकी भरा आदेश
आज उस निर्विकारी ‘संत’ को
ज़रा भी प्रभावित नहीं कर पायेगा 
आज वह अपने अंतर की 
अतल गहराइयों में स्वयं ही
समाधिस्थ हो चुका है !
आज उसे किसी सहचर या 
किसी विमान की दरकार नहीं !



चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद  

Saturday, July 25, 2020

तिजोरी




कितने ही सपने जो सच न हुए कभी,
कितने ही गीत जो गाये नहीं गये कभी,
ढेर सारे किस्से जिनका अधूरा रहना ही तय था,
तमाम सारी हसरतों की, ख्वाहिशों की
पुरानी धुरानी जर्जर तस्वीरें
जिन्हें सालों से बरसते हुए आँसुओं ने
भिगो भिगो कर बदरंग कर दिया है !
मेरे दिल की तिजोरी में बस
इसी तरह का फालतू सामान बाकी बचा है
कई दिनों से इस तिजोरी की चाबी
हथियाने की जुगत में थे ना तुम ?
लो यह चाबी और ले जाओ
जो ले जाना चाहते हो
चाहो तो सब कुछ ले जाओ
और मुक्त कर दो मुझे इस बोझ से
कि अब दिल की दीवारें भी थक चली हैं
और यह बोझ अब मुझसे
ढोया नहीं जाता !



साधना वैद

चित्र - गूगल से साभार

Friday, July 24, 2020

बादल तेरे आ जाने से ....




बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है,
मुझको जैसे कोई अपना,
 कुछ कहने को मिल जाता है !

पहरों कमरे की खिड़की से
तुझको ही देखा करती हूँ ,
तेरे रंग से तेरे दुःख का
अनुमान लगाया करती हूँ !
यूँ उमड़ घुमड़ तेरा छाना
तेरी पीड़ा दरशाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

तेरे हर गर्जन के स्वर में
मेरी भी पीर झलकती है,
तेरे हर घर्षण के संग-संग
अंतर की धरा दरकती है !
तेरा ऐसे रिमझिम रोना
मेरी आँखें छलकाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

कैसे रोकेगा प्रबल वेग
इस झंझा को बह जाने दे ,
मत रोक उसे भावुक होकर
अंतर हल्का हो जाने दे !
धरिणी माँ का आकुल आँचल
व्याकुल हो तुझे बुलाता है ,
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

हैं यहाँ सभी तेरे अपने
झरने, नदिया, धरती, सागर ,
तू कह ले इनसे दुःख अपना
रो ले जी भर नीचे आकर !
तेरा यूँ रह-रह कर रिसना
इन सबका बोझ बढ़ाता है
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है !

तेरे आँसू के ये मोती
जब खेतों में गिर जायेंगे ,
हर एक फसल की डाली में
सौ सौ दाने उग जायेंगे !
धरती माँ का सूखा आँचल
तेरे आँसू पी जाता है !
बादल तेरे आ जाने से
जाने क्यूँ मन भर आता है ,
मुझको जैसे कोई अपना
   कुछ कहने को मिल जाता है !  

साधना वैद

Monday, July 20, 2020

विकास या विनाश



वो कभी शहर से गुज़रे तो पूछेंगे
अरे सुलू !
यहीं हुआ करता था न आशियाँ हमारा
आम के इस घने छायादार पेड़ के नीचे ?
कितने परिंदे चह्चहाते थे हरदम और
हमारी अनवरत बातों में
अपना भी मीठा सुर मिला कर
कोयल कितने मीठे सुर में गाती थी,
कच्ची अमिया का स्वाद चखने के लिए
कितने तोते झुण्ड बना कर आ जाते थे
और तुम सुलू !
कैसी ललचाई नज़रों से
गदराई अमिया को देख कर खीझती थीं
ये तोते चोंच मार कर सारी अमिया
ऊपर पेड़ पर ही खराब कर देते हैं  
ये नहीं कि दो चार नीचे भी गिरा दें !
फिर मैं कभी गुलेल से ,कभी पत्थर से
तो कभी पेड़ पर चढ़ कर तुम्हारे लिए
झोली भर अमिया तोड़ दिया करता था !
आम का वह पेड़ कहाँ गया सुलू ?
विकास के नाम पर कट गया क्या ?
वो कभी शहर से गुज़रे तो पूछेंगे
बताओ ना सुलू
छोटे छोटे क्वार्टर्स की लम्बी सी कतार में यहाँ
एक घर तुम्हारा भी तो हुआ करता था न
जिसके दरवाज़े पर आम के कोमल मुलायम
हरे हरे ताज़े पत्तो की सुन्दर सी वन्दनवार
तुम हर रोज़ अपने हाथों से लगाया करती थीं
और जिसके आँगन में बीचों बीच तुम हर सुबह
बहुत ही चिताकर्षक रंगोली बनाया करती थीं
रात को उस रंगोली पर ढेर सारे दीपक
जला कर तुम रख दिया करती थीं
जिसके प्रकाश में वह रंगोली और भी सुन्दर
और भी मनोहारी दिखने लगती थी !
घर की दहलीज पर पाँव रखने से पहले ही 
तुम्हारे आँगन में खिले
मोगरा, बेला और गुलाबों की खुशबू
माँ की बनाई सौंधी रसोई की
खुशबू के साथ मिल कर  
मुझे दीवाना बना दिया करती थी !
कहाँ गया वो स्वर्ग सा छोटा सा घर सुलू ?
यहाँ तो अब कई मंज़िला मॉल
आसमान से बातें कर रहा है !
वो कभी शहर से गुज़रे तो पूछेंगे
बताओ ना सुलू
गहन अवसाद के पलों में
अपनी स्मृतियों में बसी जिन पनाहगाहों में
मैं पल भर के लिए सुकून ढूँढा लिया करता था
मेरी यादों के वो खूबसूरत आशियाने
किसने मिटा दिये सुलू ?
वो कभी शहर से गुज़रे तो पूछेंगे
यह ‘विकास’ है या ‘विनाश’?
तो मैं उन्हें क्या जवाब दूँगी ?

साधना वैद   



Friday, July 17, 2020

मैं धरा हूँ


मैं धरा हूँ
रात्रि के गहन तिमिर के बाद
भोर की बेला में
जब तुम्हारे उदित होने का समय आता है
मैं बहुत आल्हादित उल्लसित हो
तुम्हारे शुभागमन के लिए
पलक पाँवड़े बिछा
अपने रोम रोम में निबद्ध अंकुरों को
कुसुमित पल्लवित कर
तुम्हारा स्वागत करती हूँ !
तुम्हारे बाल रूप को अपनी
धानी चूनर में लपेट
तुम्हारे उजले ओजस्वी मुख को
अपनी हथेलियों में समेट
बार बार चूमती हूँ और तुम्हें
फलने फूलने का आशीर्वाद देती हूँ !
लेकिन तुम मेरे प्यार और आशीर्वाद
की अवहेलना कर
अपने शौर्य और शक्ति के मद में चूर
गर्वोन्नत हो
मुझे ही जला कर भस्म करने में
कोई कसर नहीं छोड़ते !
दिन चढ़ने के साथ-साथ
तुम्हारा यह रूप
और प्रखर, और प्रचंड,
रौद्र और विप्लवकारी होता जाता है !
लेकिन एक समय के बाद
जैसे हर मदांध आतातायी का
अवसान होता है !
संध्या के आगमन की दस्तक के साथ
तुम्हारा भी यह
रौरवकारी आक्रामक रूप
अवसान की ओर उन्मुख होने लगता है
और तुम थके हारे निस्तेज
विवर्ण मुख
पुन: मेरे आँचल में अपना आश्रय
ढूँढने लगते हो !
मैं धरा हूँ !
संसार के न जाने कितने कल्मष को
जन्म जन्मांतर से निर्विकार हो
मैं अपने अंतर में
समेटती आ रही हूँ !
आज तुम्हारा भी क्षोभ
और पश्चाताप से आरक्त मुख देख
मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही हूँ !
आ जाओ मेरी गोद में
मैंने तुम्हें क्षमा किया
क्योंकि मैं धरा हूँ !




साधना वैद

Saturday, July 11, 2020

प्रकृति - हाइकु



मौन मयंक
हर्षित उडुगण
धरा विमुग्ध


गिरि चोटी से
बहे पिघल कर
फेनिल दुग्ध


सूर्य रश्मियाँ
रचें जल कण से
इन्द्रधनुष


विस्मित सृष्टि
पुलकित प्रकृति
मुग्ध मनुष्य


यादें सुलगीं
पिघला दिनकर
सुलगा मन


रोई वसुधा
बादल बन कर
बरसे घन


खिले सुमन
सुरभित पवन
विहँसी उषा


लपेट बाना
गहन तिमिर का
चल दी निशा


हुई सुबह
जगमग हो गयी
संसृति सारी


नीले नभ में
कलरव करतीं
चिड़ियाँ प्यारी


शाम हो गयी
समाधि ली जल में
क्षुब्ध रवि ने


किया उदास
अनुरक्त धरा को
सूर्य छवि ने


घिरी घटाएं
बरसे जल कण
कोयल बोली


मस्त हवा ने
वन उपवन में
खुशबू घोली


नाच रहे हैं
ठुमक ठुमक के
मस्त मयूर


देख रहे हैं
वनचर नभ में
गिरा सिन्दूर



साधना वैद