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Tuesday, March 31, 2009

स्लमडौग नेता

चुनाव का मौसम आ गया है। तृणमूल काँग्रेस की नेता ममता बैनर्जी का कहना है कि अब वक़्त आ गया है कि स्लमडौग नेता आगे आयें और देश की बागडोर सम्हालें । उनके विचारों और भावनाओं का हम बहुत आदर करते हैं । उनकी दूरदृष्टि भी अत्यंत प्रशंसनीय है । पुराने स्लमडौग नेता तो अब करोड़पति अरबपतियों की श्रेणी में आ चुके हैं जिनकी अथाह दौलत की थाह बड़ी से बड़ी जाँच एजेंसियाँ अभी तक नहीं लगा पाईं । अब नये स्लमडौग प्रत्याशियों की बारी है कि वे भी चुनावी नौका में सवार होकर सत्ता की वैतरिणी में गोते लगायें और अपने और अपने सभी नाते रिश्तेदारों के जर्जर झोंपड़ों का प्रत्यावर्तन आलीशान बंगलों और टूटी फूटी गुल्लकों का प्रत्यावर्तन देश विदेश की अनगिनत बैंकों के खातों में कर सकें । हमारी अशेष ‘शुभकामनायें’ उनके साथ हैं ।
साधना वैद्

Friday, February 20, 2009

कितना चाहा

कितना चाहा
कि अपने सामने अपने इतने पास
तुम्हें पा तुम्हें छूकर तुम्हारे सामीप्य की अनुभूति को जी सकूँ,
लेकिन हर बार ना जाने कौन सी
अदृश्य काँच की दीवारों से टकरा कर मेरे हाथ घायल हो जाते हैं
और मैं तुम्हें छू नहीं पाती ।
कितना चाहा
कि बिन कहे ही मेरे मन की मौन बातों को तुम सुन लो
और मैं तुम्हारी आँखों में उजागर
उनके प्रत्युत्तर को पढ़ लूँ,
लेकिन हर बार मेरी मौन अभ्यर्थना तो दूर
मेरी मुखर चीत्कारें भी समस्त ब्रह्मांड में गूँज
ग्रह नक्षत्रों से टकरा कर लौट आती हैं
लेकिन तुम्हारे सुदृढ़ दुर्ग की दीवारों को नहीं बेध पातीं ।
कितना चाहा
कि कस कर अपनी मुट्ठियों को भींच
खुशी का एक भी पल रेत की तरह सरकने ना दूँ,
लेकिन सारे सुख न जाने कब, कैसे और कहाँ
सरक कर मेरी हथेलियों को रीता कर जाते हैं
और मैं इस उपमान की परिभाषा को बदल नही पाती ।
कितना चाहा
कि मौन मुग्ध उजली वादियों में
सुदूर कहीं किसी छोर से हवा के पंखों पर सवार हो आती
अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज मैं सुन लूँ
और वहीं पिघल कर धारा बन बह जाऊँ,
लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता
और मैं अपनी अभिलाषा को कभी कुचल नहीं पाती ।

साधना वैद

Thursday, January 1, 2009

स्वागतम् नव वर्ष

हर्ष और उल्लास का बन कर प्रतीक,
सुबह का सूरज गगन पर है चढ़ा ।
अश्रु आँखों में लिये बोझिल हृदय,
चाँदनी का काफिला आगे बढ़ा ।

भोर की पहली किरण के साथ में,
अल्पना के बेल-बूटे हैं सजे ।
खेत पोखर पनघटों के रास्ते,
उल्लसित मन ग्रामवासी हैं चले ।

झूम कर प्रकृति सजाती साज है,
है वसंती भाव स्वागत गान में ।
नत वदन है खेत में सरसों खड़ी,
गा रहे पंछी सुरीली तान में ।

ओस की हर जगमगाती बूंद में,
और कल कल छलकती जलधार में ।
बालकों की निष्कपट मुस्कान में,
मन्दिरों में गूँजते प्रभुगान में ।

घन चलाते हाथ के आघात में,
लपलपाती भट्टियों की ज्वाल में ।
भोर के सूरज तेरी अभ्यर्थना,
बोझ लादे हर श्रमिक की चाल में ।

आँख से पर्दे हटा अज्ञान के,
चीर दे अवसाद का यह अंधकार ।
जगमगा दे विश्व ज्ञानालोक से,
दूर कर दे मनुज चिंतन के विकार ।

मान लेना तू मेरी यह प्रार्थना,
हो तेरा अनुग्रह हमारी श्वास पे ।
विश्व सारा कर रहा स्वागत तेरा,
इसी आशा और इस विश्वास पे ।

साधना वैद्

Saturday, December 20, 2008

मुक्तक

न दिल में ज़ख्म न आँखों में ख्वाब की किरचें ,
फिर किस गुमान पर इतने दीवान लिख डाले ,
तमाम उम्र जब इस दर्द को जिया मैंने ,
तब कहीं जाके यह छोटी सी ग़ज़ल लिखी है ।



तू यथार्थ है, स्वप्न भी तू, कल्पना भी तू ,
तू विचार है, कर्म भी तू, भावना भी तू ,
तू पराग है, पुष्प भी तू, गन्धना भी तू ,
तू प्रकाश है, दीप भी तू, दर्शना भी तू ।



ज़िन्दगी जल के मेरी ख़ाक हुई जाती है ,
तेरी यादों के दिये और जले जाते हैं ।


आँख से आँसू हथेली पर गिरे, मोती बने ,
कान में दो बोल जिह्वा से झरे, अमृत बने ,
पुण्यदा है प्रिय तुम्हारी हर छवि मेरे लिये ,
पास आकर अंक में भर लो कि तन कंचन बने |

Sunday, November 2, 2008

जीवन संध्या

प्रिय आओ हम तुम मिल जुल कर
जीवन वैतरणी पार करें,
तट दूर नहीं, नैया भटकी
कुछ तुम खे लो कुछ मैं खे लूँ ।
आई आँधी उजड़ी बगिया
फूलों के पौधे टूट गये,
बिखरी पाँखुरियाँ धरती पर
कुछ तुम चुन लो कुछ मैं चुन लूँ ।
जलधार बही सुख स्वप्न धुले
नयनों के क्षितिज हुए सूने,
लो अब अमृत घट छलक रहा
कुछ तुम पी लो कुछ मैं पी लूँ ।
जीवन की गाथा व्यथा बनी
अंतर में घोर अंधेरा है,
जो फिर यह जीवन मिल जाये
कुछ तुम जी लो कुछ मैं जी लूँ ।
गीतों के स्वर अवरुद्ध हुए
जीवन की बीन लगी थमने,
पर शाश्वत गान हुआ मुखरित
कुछ तुम सुन लो कुछ मैं सुन लूँ ।
जीवन संध्या घिर आयी है
सपनों के शीशमहल टूटे,
जो शेष रहे साझे सपने
कुछ तुम बुन लो कुछ मैं बुन लूँ ।

साधना वैद

Tuesday, October 14, 2008

और सोनू हार गया

    मासूम सोनू ने गहरे बोरवेल में अपनी जान गँवा दी। चार दिन तक गड्ढे के अन्दर् मौत और ज़िन्दगी के बीच लम्बी खींचतान चलती रही और गड्ढे के बाहर ग्रामीणों और अधिकारियों के बीच आरोपों प्रत्यारोपों का निष्प्रयोजन लम्बा सिलसिला चलता रहा। वहाँ लहरा पुरा में हज़ारों ग्रामवासी बोरवेल के पास और सम्पूर्ण देश में करोड़ों दर्शक टी वी के सामने चार दिन तक साँस रोके सोनू के गड्ढे से सही सलामत बाहर आ जाने की प्रतीक्षा करते रहे। लेकिन सभी की प्रार्थनायें निष्फल हो गयीं। किसी की ग़लती का ख़ामियाज़ा उस अबोध बालक ने अपने प्राणों की आहुती देकर चुकाया। आश्चर्य होता है जो ग्रामवासी चार दिन तक खाना पीना सोना सब भूल कर दिन रात बोरवेल के पास सोनू को स्वयम बाहर निकालने की अनुमति देने के लिये प्रशासनिक अधिकारियों से जूझते रहे वे दुर्घटना से पहले चार मिनिट का समय निकाल कर किसी पत्थर से उस एक डेढ़ फीट के गड्ढे को ढँक क्यों नहीं सके ? क्या हमारी ज़िम्मेदारी सिर्फ अपने घर के दरवाज़े के अन्दर तक ही सीमित है ? क्या हम और हमारे बच्चे सड़कों और रास्तों का उपयोग नहीं करते ? तो फिर हम वहाँ उनकी सुरक्षा के प्रति जागरूक क्यों नहीं हैं ? घर के दरवाज़े के बाहर घटी हर दुर्घटना के लिये क्यों हम सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़ने के लिये तत्पर रहते हैं ? क्या नागरिकों का कोई दायित्व नहीं है ? आवश्यक्ता है खुद को चौकस और चुस्त दुरुस्त रखने की। जिस जगह बोरवेल खोदने का काम आरंभ हो उस मोहल्ले के निवासियों को स्वयम काम के ख़त्म होने तक सबकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिये और ठेकेदार या खुदाई करने वाले काम बन्द करने के बाद गड्ढे को ठीक से ढँक कर गये हैं या नहीं इसकी देख रेख करनी चाहिये। जिस गाँव में बोरवेल खुदे वहाँ के प्रधान को खुद अपनी निगरानी में यह काम करवाना चाहिये। अन्यथा ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रहेगी और कई मासूम सोनू की तरह ज़िन्दगी की जंग हारते रहेंगे। नेताओं से मेरी अपील है कि वे भोले भाले ग्राम वासियों को उकसा कर सिर्फ भड़काने का काम ही ना करें उन्हें उनके कर्तव्यों के प्रति भी सचेत करें क्योंकि यह तो निश्चित है जो लोग ज़रा से इशारे पर आगजनी , पथराव ,  घेराव कर सकते हैं , घंटों के लिये जाम लगा सकते हैं , हड़ताल , आन्दोलन और संघर्ष कर सारी व्यवस्था को तहस-नहस कर सकते हैं वे सही दिशा निर्देश मिलने पर एक सुन्दर , स्वस्थ और सुरक्षित समाज का निर्माण भी कर सकते हैं।

साधना वैद 

Saturday, October 11, 2008

आस्था अभी मरी नहीं

हिलती हुई मुंडेरें हैं और चटके हुए हैं पुल,

 दुनिया एक चुरमुराई हुई सी चीज़ हो गई है। 

लड़खड़ाते हुए सहारे हैं और डगमगाये हुए हैं कदम,

लक्ष्य तक पहुँचने की चाह आकाशकुसुम छूने जैसी हो गयी है। 

खण्डहर हो चुकी इमारतें हैं और धराशायी हैं भवन,

मलबे के ढेर में ‘घरों’ को ढूँढने की कोशिश अब थक चली है। 

टूटा हुआ विश्वास है और डबडबाई हुई है आँख,

अंधेरे की डाकिन आशा की नन्हीं सी लौ को 

फूँक मार कर बुझा गयी है। 

बेईमानों की भीड़ है और ख़ुदगर्ज़ों का है हुजूम,

इंसानियत के चेहरे की पहचान कहीं गुम हो गयी है। 

लहूलुहान है शरीर और क्षतविक्षत है रूह,

दुर्भाग्य के इस आलम में सुकून की एक साँस तक जैसे दूभर हो गयी है। 

ऐसे में मलबे के किसी छेद से बाहर निकल 

पकड़ ली है मेरी उँगली नन्हे से एक हाथ ने

भर कर आँखों में भोला विश्वास,

और लिये हुए होठों पर एक कातर गुहार।

आस्था अभी पूरी तरह मरी नहीं!

हे ईश्वर! तुझे कोटिश: प्रणाम,

आस्था अभी पूरी तरह मरी नहीं।

 

साधना वैद