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Thursday, January 14, 2010

जैसी मेरी टोपी वैसी राजा की भी नहीं ( बाल कथा ) -1

मेरे घर में जो नन्हे मुन्ने बच्चे हैं उन्हें यह कहानी बहुत पसन्द है । खाना हो या सोना जब तक यह कहानी उन्हें ना सुनाई जाये उनका काम नहीं चलता । यह कहानी है एक चंचल और शरारती चिड़िया की जो कभी हार नहीं मानती थी और हर विषम परिस्थिति में भी कुछ ना कुछ सकारात्मक और सुखद उसे ज़रूर दिखाई दे जाता था । सोचा ऐसी बहादुर और साहसी चिड़िया की कहानी और बच्चों को भी सुनाऊँ शायद उन्हें भी यह अच्छी लगे । तो लीजिये आप भी सुनिये और यदि पसन्द आये तो अपने बच्चों को भी सुनाइये ।

एक थी चिड़िया । छोटी सी, नन्हीं सी, बहुत प्यारी सी । एक दिन उसको कहीं से थोड़ी सी रुई मिल गयी । वह सोचने लगी ‘ इस रुई का मैं क्या करूँ ।‘ तभी उसने देखा कि एक धुनिया धुन-धुन करके रुई धुन रहा है । चिड़िया दौड़ी-दौड़ी उसके पास गयी और उससे बोली -
” धुन्नक धुन्ना कर दे रे, धुन्नक धुन्ना कर दे रे । “
धुनिये ने चिड़िया की रुई को धुन कर उसे दे दिया । थोड़ी सी रुई फूल कर खूब सारी हो गयी । अब तो चिड़िया बहुत खुश हो गयी । सोचने लगी ‘ अगर मेरी इस रुई से कपड़ा बन जाये तो कितना अच्छा हो ।‘ वह दौड़ी-दौड़ी गई जुलाहे के पास और उससे बोली -
” मेरा कपड़ा बुन दे रे, मेरा कपड़ा बुन दे रे । “
जुलाहे ने चिड़िया की रुई से उसके लिये एक छोटा सा रूमाल बुन कर दे दिया । अब तो चिड़िया और खुश हो गयी । सोचने लगी ‘ लेकिन यह रूमाल तो सफेद-सफेद है अगर यह रंगीन होता तो कितना सुन्दर लगता ।‘ वह दौड़ी-दौड़ी रंगरेज के पास गयी और उससे बोली -
” मेरा कपड़ा रंग दे रे, लाल रंग में रंग दे रे । “
रंगरेज ने चिड़िया के रूमाल को लाल रंग में रंग दिया । अब तो चिड़िया और भी खुश हो गयी । फिर सोचने लगी ‘ लेकिन इस कपड़े का मैं क्या करूँगी । अगर कोई इसकी मेरे लिये टोपी बना देता तो कितना अच्छा होता ।‘ वह दौड़ी-दौड़ी गयी दर्ज़ी के पास और उससे बोली -
” सीमा पोई कर दे रे, सीमा पोई कर दे रे । “
दर्ज़ी ने नन्हीं सी चिड़िया के कपड़े से उसके लिये एक सुन्दर सी टोपी बना दी और उसमें लगा दिया चमकीला-चमकीला गोटा । अब तो चिड़िया की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था । टोपी पहन कर वह सीधे राजा के महल में जा पहुँची और राजा के सामने बैठ कर ज़ोर-ज़ोर से गाना गाने लगी -
” जैसी मेरी टोपी वैसी राजा की भी नहीं, जैसी मेरी टोपी वैसी राजा की भी नहीं । “
चिड़िया का गाना सुन कर राजा को बहुत गुस्सा आया । सोचने लगा ‘ छोटी सी चिडिया की इतनी हिम्मत कि यह मुझे चिढ़ा रही है । मेरे पास तो हीरे मोती जड़ा इतना सुन्दर मुकुट है । ‘ राजा गुस्से से चिल्लाया -
” सिपाहियों इस चिड़िया की टोपी छीन लो “
सिपाहियों ने चिड़िया से उसकी टोपी छीन कर राजा को दे दी ।
चिड़िया फिर गाना गाने लगी -
“ राजा कंगाल मेरी टोपी ले गया लाल, राजा कंगाल मेरी टोपी ले गया लाल । “
राजा शरमाया । छोटी सी चिड़िया की बात का क्या बुरा मानना । यह अपनी करनी पर पछता कर बोला -
” सिपाहियों चिड़िया की टोपी उसको वापिस कर दो । “ चिड़िया फिर गाना गाने लगी –
“ राजा डरपोक मेरी टोपी दे गया लाल, राजा डरपोक मेरी टोपी दे गया लाल । “
राजा परेशान हो गया । वह गुस्से में चिल्लाया -
” सिपाहियों इस चिड़िया को खड़की के बाहर फेंक दो । “
सिपाहियों ने चिड़िया को खिड़की के बाहर फेंक दिया । वहाँ पर थीं ढेर सारी कँटीली झाड़ियाँ । चिड़िया को काँटे चुभ गये लेकिन वह वहाँ भी ज़ोर-ज़ोर से गाने लगी -
“ अच्छे-अच्छे नाक कान छिदाये मेरे लाल, अच्छे-अच्छे नाक कान छिदाये मेरे लाल । “
राजा को और गुस्सा आया । वह फिर गुस्से से चिल्लाया -
” सिपाहियों इस चिड़िया को कूए में फेंक दो । “
सिपाहियों ने चिड़िया को कूए में फेंक दिया । शरारती चिड़िया वहाँ भी गाना गाने लगी -
” अच्छी-अच्छी गंगा नहलाये मेरे लाल, अच्छी-अच्छी गंगा नहलाये मेरे लाल । “
राजा और परेशान हो गया । सोचने लगा ‘ यह तो बड़ी ढीठ चिड़िया है । मुझे चिढ़ाये ही जा रही है । ‘ वह और ज़ोर से चिल्लाया-
” सिपाहियों इस चिड़िया को फाँसी पर लटका दो । “
सिपाहियों ने चिड़िया को सुतली से बाँध पेड़ से लटका दिया । चिड़िया वहाँ भी गाना गाने लगी -
” अच्छे-अच्छे झूला झुलाये मेरे लाल, अच्छे-अच्छे झूला झुलाये मेरे लाल । “
राजा गुस्से के मारे पागल हो गया । ज़ोर से चिल्ला कर बोला -
” सिपाहियों मैं इस चिड़िया की आवाज़ और नहीं सुनना चाहता इसे गड्ढा खोद कर ज़मीन में गाढ़ दो । “
सिपाहियों ने चिड़िया को गड्ढा खोद कर ज़मीन में गाढ़ दिया । उधर से आरही थी एक बिल्ली । ताज़ी-ताज़ी खुदी ज़मीन से उसे चिड़िया की खुशबू आयी तो वह वहीं बैठ कर ध्यान से उस गड्ढे को देखने लगी । तभी अंदर से आवाज़ आयी - ” बैठी-बैठी क्या देखे खोद-खोद के खा ले तू । “
बिल्ली चौंक गयी । सोचने लगी यह आवाज़ कहाँ से आयी । इतने में फिर से वही आवाज़ सुनाई दी -
” बैठी-बैठी क्या देखे खोद-खोद के खा ले तू । “
बिल्ली ने जल्दी-जल्दी अपने पंजों से ज़मीन को खोद दिया । अन्दर से निकल पड़ी वही शरारती चिड़िया । बिल्ली के मुँह में पानी आ गया । वह जैसे ही उसे खाने लिये आगे बढ़ी चिड़िया बोल पड़ी -
” गन्दी सन्दी क्यों खाये धोय धाय के खाले तू । “
बिल्ली ने सोचा यह बात भी ठीक है । वह चिड़िया को लेकर नदी के किनारे गयी और चिड़िया को अच्छी तरह से नहला धुला कर साफ कर दिया । अब जैसे ही वह चिड़िया को खाने के लिए दोबारा आगे बढ़ी चिड़िया फिर बोल पड़ी –
“ गीली-गीली क्यों खाये सूख जाऊँ तो खा ले तू । “
बेवकूफ़ बिल्ली फिर चिड़िया की बातों में आ गयी और उसने चिड़िया को धूप में सूखने के लिये रख दिया और खुद उसके पास बैठ कर उसके सूखने का इंतज़ार करने लगी । थोड़ी देर में चिड़िया के पंख सूख गये । जैसे ही बिल्ली उसे खाने के लिये आगे बढ़ी चिड़िया फुर्र से उड़ गयी और फिर राजा के महल में उसके सामने जाकर बैठ गयी और ज़ोर-ज़ोर से गाने लगी -
” जैसी मेरी टोपी वैसी राजा की भी नहीं, जैसी मेरी टोपी वैसी राजा की भी नहीं । “

साधना वैद