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Monday, February 7, 2011

मुझे मत पुकारो

मैंने तो अंतस को
उजागर
करने के लिये
तेरी यादों की प्रखर ज्वाला को
मन के हर कोने में
प्रज्वलित किया था ,
ये गीली लकड़ियों की कसैली,
सीली-सीली सी आग
कैसे मेरे मन में घुट गयी है
जिसने मेरी आँखें कड़वे
धुँए से भर दी हैं !

मैंने तो मंज़िल तक जाने के लिये
हर फूल, हर पत्ती,
हर शाख, हर पंछी ,
यहाँ तक कि उस दिशा से
आने वाले हवा के हर झोंके से
तेरी रहगुज़र का पता पूछा था ,
लेकिन ना जाने क्यों तब
सबके होंठ सिले हुए थे !

अब जब मुझे इस कड़वे,
कसैले धुँए को झेलने की ,
अनजाने, अनचीन्हे लंबे रास्तों
पर नितांत एकाकी चलने की
और खुद से ही अपने दुःख दर्द
बाँटने की आदत हो गयी है
तो अब तुम पीछे से
मुझे मत पुकारो !



साधना वैद