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Monday, February 28, 2011

मैं खड़ी हूँ आज भी उस मोड़ पर


जिस्म ने तय कर लिये कई फासले ,
उम्र भी है चढ़ चुकी कई सीढ़ियाँ ,
रूह उस लम्हे में लेकिन क़ैद है ,
जो बीता था, बीता है कभी !

जब हवाएं ठिठकती थीं द्वार पर ,
जब फुहारें भिगोती थीं आत्मा ,
जब सितारे चमकते थे नैन में ,
चाँद सूरज हाथ में थे जब सभी !

एक सूखा पात अटका है वहाँ ,
गुलमोहर के पेड़ की उस शाख पर ,
जो धधकता था सिंदूरी रंग में ,
अस्त होती सूर्य किरणों से कभी !

गीत अब भी गूँजता है अनसुना ,
भावना के पुष्प बिखरे हैं वहाँ ,
नेह की लौ जल रही है आज भी ,
जो बुझी थी, ना बुझेगी अब कभी !

थीं कभी तुमसे मिलीं सौगात में ,
मोह की उन श्रंखलाओं से बँधी ,
मैं खड़ी हूँ आज भी उस मोड़ पर ,
पलट कर तो देखते तुम भी कभी !


साधना वैद