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Wednesday, February 2, 2011

रहनुमां

जब-जब मैंने ज़माने के साथ

सुखों की राह पर कदम दर कदम

संग चलने की कोशिश की है

पता नहीं कहाँ से दुःख पीछे से आकर

मेरा आँचल पकड़ मुझे रोक लेते हैं

और बड़ी हिफाज़त से मुझे

सात तालों में बंद कर

पहरे पर बैठ जाते हैं कि कहीं

किसी सुख की कुदृष्टि मुझ पर

भूले से भी ना पड़ जाये !

जब-जब दर्द की सख्त गिरफ्त से

अपनी उँगली छुड़ा कर

मैंने आगे बढ़ना चाहा है

वह एक ज़िम्मेदार रहनुमां की तरह

मुझे और कस के थाम लेता है

ठीक वैसे ही जैसे मेले की भीड़ में

किसी नन्हें नादान बालक का हाथ

उसका पिता और कस कर पकड़ लेता है

कि बच्चा कहीं उसकी गिरफ्त से छूट न जाये !

जब-जब सुरों में ओज भर कर

मन में ढेर सारी उमंग को

अपने आँचल में बाँध

मैंने प्यार के गीत

गुनगुनाने की कोशिश की है

मेरी सारी हमजोलियाँ

स्मृति, व्यथा, वेदना,

दुविधा, कुंठा, निराशा,

विरक्ति, पीड़ा, हताशा

अपने-अपने साज़ लेकर आ जुटती हैं

मेरे सुर में सुर मिलाने के लिये

और प्यार के गीत कब हार के गीतों में

तब्दील हो जाते हैं

पता ही नहीं चलता !

जब-जब सुरमई शामों में

अपने चहरे को उल्लास और उत्साह के

प्रसाधनों से सजा कर

मैं खुशियों की सितारों जड़ी

जर्क वर्क चमचमाती साड़ी में सजी

अपना चाँद देखने छत पर जाती हूँ

ना जाने कैसे तारों की आँखों से बरसी

आँसुओं की हल्की सी बौछार से

मेरा सारा मेकअप उतर जाता है और

सलमे सितारे जड़ी मेरी चमचमाती साड़ी

पता नहीं कैसे उदासी की

बदरंग जर्जर ओढ़नी बन जाती है

जो मेरे जिस्म को हर तरफ से

बड़ी सावधानी से लपेट कर ढँक लेती है !



साधना वैद