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Sunday, April 7, 2013

भारत में शिक्षा की सही तस्वीर -- एक भिन्न दृष्टिकोण



जिस तरह एक तस्वीर दर्शक के समक्ष सोचने समझने के लिये असंख्य आयाम बिना कुछ कहे ही खोल देती है उसी तरह शब्दों के जाल में उलझे बिना यदि आँकड़ों को सरल रूप में प्रस्तुत किया जाये तो वे भी तस्वीर की तरह ही बहुत कुछ कह जाते हैं ! आइये भारत में शिक्षा की स्थिति पर कुछ आँकड़ों का अध्ययन करें !
भारत की कुल जनसंख्या --- १२४ करोड़
कुल साक्षर ( ७४ % ) – ९२ करोड़
विश्व साक्षरता का औसत ( ८४ % )
देखने से तो साक्षरता का यह प्रतिशत अधिक चिंताजनक नहीं लगता लेकिन आइये अब साक्षर लोगों के शिक्षा के स्तर पर भी एक नज़र डाल ली जाये !
नीचे दिये गये प्रतिशत कुल जनसंख्या के नहीं वरन केवल साक्षर लोगों का ही प्रतिशत दर्शाते हैं !
डिप्लोमा, डिग्री और उससे ऊपर – ७.५%
हाई स्कूल, हायर सेकेंड्री, इण्टरमीजियेट --- २१%
मिडिल स्कूल अर्थात कक्षा आठ तक – १६%
मात्र प्राइमरी स्कूल अर्थात कक्षा पाँच तक  -- २६%
प्राइमरी से भी कम – २६%
साक्षर, पर कभी स्कूल नहीं गये – ३.५%
निश्चय ही शिक्षा का यह स्तर चिंताजनक है लेकिन आइये इस समस्या के हल के लिये उपलब्ध साधनों पर विचार किया जाये ! यहाँ हम निरंतर चलने वाली समस्याओं जैसे भ्रष्टाचार, राजनीति व लालफीताशाही पर चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि इन समस्याओं से तो हमें जूझना ही है ! हम अपने साधनों पर, विशेष कर शिक्षा के क्षेत्र में हम कितना धन खर्च कर रहे हैं इसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहेंगे ! तुलना के लिये हम भारत से अधिक संपन्न देश अमेरिका और भारत से कम संपन्न देश नेपाल में शिक्षा पर खर्च की जाने वाली धन राशि पर भी एक नज़र डालेंगे !
अमेरिका
जनसंख्या – ३२ करोड़
देश की कुल आमदनी प्रतिवर्ष (जी डी पी) – १५ ट्रिलियन डॉलर्स  ( पन्द्रह लाख करोड़ डॉलर्स )
शिक्षा पर खर्च – कुल आमदनी का ५.५%
भारत
जनसंख्या – १२४ करोड़
देश की कुल आमदनी प्रतिवर्ष (जी डी पी) – १.८५ ट्रिलियन डॉलर्स ( एक लाख पचासी हज़ार करोड़ डॉलर्स)
शिक्षा पर खर्च – ३.१%
नेपाल
जनसंख्या – ३ करोड़
देश की कुल आमदनी प्रतिवर्ष (जी डी पी) – १९ बिलियन डॉलर्स (एक करोड़ अठासी लाख अस्सी हज़ार डॉलर्स)
शिक्षा पर खर्च – कुल आमदनी का ४.६%.
हमारे साधन बहुत कम हैं, इन सीमित साधनों को भी यदि बुद्धिमानी से और उचित प्राथमिकताओं को समझते हुए प्रयोग नहीं किया जायेगा तो हम कहीं भी नहीं पहुँचेंगे ! देश के साक्षर लोगों के तुलनात्मक अध्ययन में हमने देखा कि हम अपने देश के साक्षर लोगों के भी ७१.५% लोगों को कक्षा आठ तक की शिक्षा ही दे पा रहे हैं ! इसीमें हमारे सारे साधन चुक जाते हैं ! हम देश से गरीबी हट जाने का, देश के भ्रष्टाचार से मुक्त हो जाने का इंतज़ार नहीं कर सकते ! फिलहाल हमको अपनी कक्षा एक से कक्षा आठ तक की शिक्षा को ही इतना उपयोगी और जीविका अर्जित करने योग्य बनाना होगा कि उसके बाद यदि आगे पढ़ने की संभावनायें ना भी रहें तो भी शिक्षार्थी का जीवन भली प्रकार से चल सके ! इससे एक लाभ यह भी होगा कि उच्च शिक्षा के लिये व्यर्थ की आपाधापी नहीं होगी और शिक्षा के संस्थानों पर दबाव भी कम पड़ेगा !
कक्षा आठ तक कम से कम भाषा का ज्ञान, संवाद के तरीके, हिसाब किताब की समझ और किसी रोज़गार को करने का हुनर तो आ ही जाना चाहिये ! हम क्लास आठ तक अपने यहाँ सिर्फ साधारण विज्ञान ही पढ़ाते हैं जबकि जर्मनी में जनरल इंजीनियरिंग का विषय भी कक्षा आठ में पढ़ाया जाता है ! कक्षा आठ तक ऑफिस में इस्तेमाल होने वाली मशीनें जैसे कि कम्प्यूटर आदि के बारे में पढ़ाना हमारे देश में भी आरम्भ कर दिया गया है लेकिन इसकी सुविधा चंद गिने चुने संस्थानों में ही है ! आठवीं क्लास पास करने तक बच्चे की आयु लगभग पन्द्रह साल हो जाती है ! इस आयु के बाद यदि साधन की कमी से परिवार बच्चे को आगे पढ़ाने में सक्षम ना भी हो तो भी शिक्षा प्रणाली इतनी मजबूत और सार्थक होनी चाहिये कि बच्चा आसानी से जीवन यापन कर सके !
लेकिन समस्या इतनी ही नहीं है ! सरकारी स्कूल, जहाँ निशुल्क शिक्षा का प्रावधान है, की हालत इतनी खराब है कि वहाँ कोई जाना ही नहीं चाहता ! या तो वहाँ स्थान नहीं है या शिक्षक ही नहीं है ! इसलिए आज शहरों में जहाँ स्कूल जाने वालों की संख्या का प्रतिशत गाँवों से अधिक है वहाँ भी छोटे बच्चों के लिये गली-गली में अनेकों स्कूल खुल गये हैं जिन्हें सरकार तो कोई मान्यता नहीं देती लेकिन यह भी एक बड़ा सच है कि आबादी के एक बड़े हिस्से को ये स्कूल ही शिक्षित कर रहे हैं ! विडम्बना यह है कि एक तरफ तो हमारे पास अशिक्षितों की फ़ौज है और दूसरी तरफ ट्रेंड और अनुभवी बेरोजगार टीचर्स की लंबी कतारें हैं जिनका सदुपयोग नहीं किया जा रहा है ! इनकी प्रतिभा एवँ कार्यक्षमताओं का उपयोग करने का तरीका भी निकाला जाना चाहिये चाहे वह अपराम्परावादी ही क्यों न हो ! इसी तरह अशिक्षा से जंग जीती जा सकती है ! कक्षा आठ तक का सिलेबस इस तरह से दोबारा बनाया जाना चाहिये कि देश की परिस्थतियों के अनुसार कम खर्च और सीमित साधनों के साथ भी रंग चोखा आ सके ! इस हकीकत से आँखें नहीं चुराई जा सकतीं कि आने वाले कई वर्षों तक हमारी जनसंख्या का बड़ा प्रतिशत आठवीं क्लास से ऊपर नहीं पढ़ सकेगा इसलिये घरों में खुले हुए स्कूलों को और मज़बूत और सुविधा संपन्न करना चाहिए तथा बेरोजगार टीचर्स द्वारा पढ़ाये गये बच्चों के लिये भी प्राइवेट परिक्षा देकर सर्टीफिकेट प्राप्त करने की सुविधा दी जानी चाहिये जो नौजवानों को नौकरी अथवा स्वरोजगार के लिये सहायता हासिल करने में काम आ सके ! इस सत्कार्य के लिए यदि धन की कमी आड़े आती है तो निजी व्यक्तियों, समाजसेवी संस्थाओं तथा धार्मिक संस्थानों को सहयोग करने के लिये भी प्रेरित करना होगा !  इसके लिये टैक्स में छूट देने के नियम भी बनाये जा सकते हैं !  
देश में शिक्षा की यह तस्वीर निश्चित रूप से चिंताजनक है ! ये आँकड़े सरकारी विभागों की रिपोर्ट्स से एकत्रित किये गये हैं ! यदि कहीं कोई त्रुटि दिखे तो उन्हें सुधारने के लिये आपकी प्रतिक्रियाएँ एवँ सुझावों का स्वागत है ! इस स्थिति से उबरने के लिये और क्या किया जा सकता है इस बारे में भी पाठकों के व्यावहारिक सुझावों की अपेक्षा रहेगी !

साधना वैद 




18 comments :

  1. गूढ़ तथ्यों को बड़ी सरलता से आपने सामने रखा है ....... इस जानकारी से लोगों का रूबरू होना ज़रूरी है

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज सोमवार के ''पहली गुज़ारिश '' : चर्चा मंच 1208 (मयंक का कोना) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...सादर!

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  3. तत्थ्यपरक लेख |
    आशा

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  4. देश में शिक्षा की यह तस्वीर निश्चित रूप से चिंताजनक है !
    विचारणीय प्रस्‍तुति
    बेहद सशक्‍त लगा आपका यह आलेख ...
    आभार सहित

    सादर

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  5. तत्व पर आधारित सुन्दर आलेख
    LATEST POSTसपना और तुम

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  6. जानकारीपरक आलेख

    सादर

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  7. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 9/4/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

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  8. देश में शिक्षा की यह तस्वीर निश्चित रूप से चिंताजनक है ....इस विषय पर आपने बहुत कारगर व्यावहारिक सुझाव बतलाए हैं।।हमारे शिक्षा की नीति निर्धारण करने वाले जिस दिन यह बात समझ सकेंगे उस दिन तस्वीर बदलते देर नहीं लगेगी .....सार्थक आलेख प्रस्तुति हेतु आभार

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  9. सही तस्वीर है शिक्षा की , सरकारी योजनायें बनती तो जरुर हैं लेकिन आंकड़ों तक ही सीमीत रह जाती है ........

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  10. तत्थ्यपरक लेख |बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  11. aapne jo aankade diye hai vo saty hai ye bhi saty hai ki sarkaar ya bahy sansthaae jo dhan praatamik shiksha me lagaana chaahati hai unka sahi upyog nahi ho rahaa hai nimn tapke me baal mazdooro ki sankhya bahut jyaada hai unhe shaala tak laapaana aur satat adhyaapan se jode rakhana bahut kathin hai m.p. me sarv shiksha abhiyan achhi yojana hai kai school aur bachhe labhaanvit hue hai
    lekin 8 th tak ke bachho ka 1oo%PAS HONA YE GALAT HAI ISSE BACHHE KAMJOR NEEV KE RAH JAATE HAI BADI KAKSHA ME PAS NAHI HO PAATE AUR PADHAAI CHHOD DETE HAI
    AGAR MATA-PITA JAGRUK HOGE TO HI SHIKSHA KA STAR UNCHA UTHAANE ME SARKAAR SAFAL HOGI VYARTH RASHI KHARCH KAR DOOSARO KA HI BHALA HORAHA HAI BACHHO KA NAHI

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  12. बहुआयामी जानकारी के लिये धन्यवाद.
    आशा है आपकी पोस्ट कुछ विचारों को
    जागृत करेगी.

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  13. वीरेंद्र वैदApril 9, 2013 at 3:00 PM

    साक्षर उसे कहते हैं जो पढ़ सके,लिख सके और समझ सके ! अपने देश में मात्र अपना नाम लिख लेने वाला भी साक्षर गिना जाता है ! पर आंकड़ों को देख कर यह स्पष्ट हो जाता है कि देश को सही अर्थ में साक्षर होने में अभी लंबा समय लगेगा !
    फिलहाल देश का भविष्य इन्हीं अनपढ़ और कम पढ़े लोगों के हाथ में है ! यही लोग अपना रोज़गार और परिवार सम्हाल रहे हैं और सरकार बनाने में अपनी भूमिका भी निभा रहे हैं ! जनता के इस बड़े वर्ग से संवाद के लिये और इनके ज्ञानवर्धन के लिये हमको वैकल्पिक माध्यम, जो ऑडियो वीडियो के रूप में हों, का भी प्रयोग करना होगा ! लगभग कला और विज्ञान के सारे विषय इस माध्यम से पढाए जा सकते हैं ! आज यह सुविधा घर बैठे उपलब्ध भी हो सकती है !

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  14. बहुत ही जागरूक करता आलेख बहुत उपयोगी जानकारी हमारा प्रशासन तो अपने वोट भुनाने में समय व्यर्थ करता है क्या ये आंकड़े उन्हें भी मालूम है शायद नहीं !!बहुत बहुत बधाई साधना जी इस आलेख के लिए मिलकर सोचने और आयर इस समस्या का निवारण करने के लिए हम सब को तत्पर होना चाहिए

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  15. सिक्षा के प्रति चिंता जायज़ है ... अच्छे सुझाव दिये हैं ज़रूरी है शिक्षा के साथ साथ रोजगार भी मुहैया करना चाहिए ... गाँव में बच्चे विद्यालय जाने से बेहतर समझते हैं कि लकड़ियाँ इकट्ठी कर उनको बेच कर कुछ पैसे कमाना ।

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  16. बहुत ही जरूरी मुद्दे पर प्रकाश डाला है और उसका इतनी अच्छी तरह विवेचन किया है.
    दुसरे देशों की तुलना में हमारे देश में शिक्षा के प्रति बहुत ही लापरवाही बरती जा रही है, इसके भयावह परिणाम भी सामने हैं. कोई भी कार्य सुचारू रूप से नहीं होता.

    अच्छी तरह शिक्षित न होने की वजह से ही , जनता बहकावे में आ जाती है और गलत लोगों का चुनाव करती है, जो सरकार चलाने में सक्षम नहीं होते, भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं और देश को गर्त में ले जा रहे हैं.

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  17. बहुत सार्थक विवेचन...सभी योजनायें प्रचार का माध्यम और कागज़ों तक ही सीमित रह जाती हैं..

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