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Monday, November 25, 2013

चल उठ राही ....




मंज़िल की दूरी को लख कर
राही तू रुक जाना ना ,
पथ के सन्नाटों से डर कर
राही तू मुड़ जाना ना ,
पलक बिछाये बैठे हैं सब
शूल, धूल, कंकर, पत्थर ,
स्वागत को आतुर अपने इन
मित्रों को बिसराना ना ! 

चल उठ राही ! हिम्मत कर ले
यह पल फिर ना आयेगा ,
तेरे बुत बनने से निष्ठुर
इस जग का क्या जायेगा ,
इस पल को जी ले तू राही 
 खुशियाँ बाहों में भर ले ,  
जीवन ज्योत जला कर ही
औरों का तम हर पायेगा ! 

चल उठ राही ! बाँह पसारे
मंज़िल तुझे बुलाती है ,
कोमल कर से सहला अलकें
किस्मत तुझे जगाती है ,
क्यों बैठा है अंतर्मन के
 सब दरवाज़े बंद किये ,
जो खुद अपने मन से हारा
 दुनिया उसे भुलाती है ! 


चल उठ राही ! गुमसुम रह कर
कुछ भी ना मिल पायेगा ,
जिसने मन पर अंकुश साधा
विजय वही पा जायेगा ,
एक समूचा गगन पड़ा है
तेरे पंखों के नीचे ,
बाँध हौसला उड़ चल राही
दूर तलक तू जायेगा !


साधना वैद