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Thursday, June 5, 2014

संघर्ष



रसोई में बैठी गृहणी
चिंतित और संकुचित है
देगची में थोड़ी सी सब्जी है
दिन भर खट के आये
घरवाले के लिये बचा लूँ
या फिर बढ़ती आयु के
बच्चों की थाली में परोस दूँ ?
और कब तक उन्हें
अचार के खाली मर्तबान से
रगड़-रगड़ कर रोटियों के
निवाले खिलाने होंगे ?
कब तक नन्हे बच्चे
एक दूसरे के हाथ के निवाले पर
चील कौओं की तरह
झपट्टा मारते रहेंगे ?  
नलों में कई दिनों से
पानी नहीं आ रहा
मोहल्ले का हैंड पम्प
सूखा पड़ा है !
इतनी प्रचंड गर्मी में
पसीने से नहाने के सिवा
अन्य कोई विकल्प नहीं !
बिजली का तो कोई
ठिकाना ही नहीं !
कहो तो सारा दिन ही न आये
हाथ से पंखा झलते-झलते
कंधे जवाब दे चुके हैं !
छोटी सी झुग्गी वाले घर में
ना तो आँगन है ना ही छत !
रोशनी और हवा के लिये
घर के बाहर ही शरण लेनी पड़ती है !`
बड़ी होती बिटिया को
कैसे घर के बाहर सुलाऊँ ?
दरिंदों की नज़रों से
कैसे उसे छिपाऊँ ?
माथे की लकीरें और
गहराती जाती हैं !
बालों की सफेदी हर रोज़
बढ़ती जाती है लेकिन
चिंताएँ घटने का नाम ही
नहीं लेतीं !
समस्याएँ कभी सुलझती
नज़र ही नहीं आतीं !
हे माँ ! यह संघर्ष
कितने दिन और करना होगा ?
कितने दिन और 
हर पल हर लम्हा 
इसी तरह
 मर-मर कर जीना होगा ?
वो 'अच्छे दिन'
जिनके आने के बारे में
कई महीनों से हर वक्त
सुनते आ रहे हैं
कब आयेंगे ?
आयेंगे भी या नहीं
    कौन जाने !   



साधना वैद 

चित्र - गूगल से साभार