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Thursday, March 22, 2018

एहसास



मन के सूने गलियारों में किसीकी
जानी पहचानी परछाइयाँ टहलती हैं ,
दिल की सख्त पथरीली ज़मीन पर
दबे पाँव बहुत धीरे-धीरे चलती हैं !
पलकों के बन्द दरवाज़ों के पीछे
किसीके अंदर होने का अहसास मिलता है ,
कनखियों की संधों से अश्कों की झील में
किसीका अक्स बहुत हौले-हौले हिलता है !
हृदय के गहरे गह्वर से कोई पुकार
कंठ तक आकर घुट जाती है ,
कस कर भिंचे होंठों की कंपकंपाहट
बिन बोले ही बहुत कुछ कह जाती है !
किसीका ज़िक्र भर क्यों मन के
शांत सागर में सौ तूफ़ान उठा जाता है ,
मैं चाहूँ या ना चाहूँ क्यों मेरे स्वत्व को
नित नयी कसौटियों पर कस जाता है !


साधना वैद
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