हम लोग जब छोटे थे तो मनोरंजन के बहुत ही सीमित साधन हुआ करते थे ! या तो घर में लूडो, साँप सीढ़ी, गुट्टे, अष्टा चंगा खेल लो या शाम के समय बाहर सखियों सहेलियों के साथ घोड़ा है जमालशाही, खो खो, बोल मेरी मछली कितना पानी और छुपम छुपाई खेल लो ! सिनेमा जाने का कार्यक्रम तभी बन पाता था जब घर के बड़ों को भी जाने का अवकाश मिले या उनके मतानुसार देखने लायक फिल्म हो ! बच्चों के अकेले जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता था ! उस ज़माने में ब्लैक एंड व्हाईट फ़िल्में बना करती थीं और उनके कथानक भी बहुत ही सुन्दर और उद्देश्यपूर्ण होते थे ! उस ज़माने की फ़िल्में पारिवारिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, या बालोपयोगी हुआ करती थीं ! उस वक्त के प्रसिद्ध साहित्यिक उपन्यासों पर भी बहुत ही शानदार फ़िल्में बनीं !
देवदास, आनंद मठ, परिणीता, दो बीघा ज़मीन, मंझली दीदी, छोटी बहू, गबन, गोदान आदि अनेकों कालजयी फ़िल्में हैं जो प्रेमचंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शरदचंद्र आदि उपन्यासकारों के उपन्यासों पर बनीं और जिन्होंने न केवल हमारी उत्कृष्ट साहित्य के प्रति रूचि को जगाया वरन हमारी सोच, हमारी भावनाओं और हमारे परिवार के प्रति दायित्व बोध को भी परिमार्जित किया !
भाभी, लाजवंती, तूफ़ान और दिया, हीरा मोती, मदर इंडिया, कठपुतली, घर घर की कहानी ऐसी अनेकों पारिवारिक फ़िल्में थीं जिन्होंने नारी उत्पीडन के उन्मूलन में यथेष्ट योगदान दिया और नारी सशक्तिकरण की मशाल को जला कर नारी को अपने अधिकारों और अस्मिता की रक्षा के लिए जागरूक किया !
हम पंछी एक डाल के, जागृति, मासूम, आगरा रोड, प्यार की प्यास, ज़मीन के तारे, भाई बहन जैसी बच्चों की फ़िल्में अलग से बना करती थीं जिनमें बच्चों के लिए सुन्दर सन्देश होते थे ! फ़िल्में न केवल मनोरंजन करती थीं वरन हमारे चरित्र निर्माण में भी प्रमुख भूमिका निभाती थीं और हमें एक स्वस्थ समाजोपयोगी व्यक्ति के रूप में विकसित होने में हमारी सहायता करती थीं ! अगर कोई देश प्रेम की थीम वाली या बच्चों के लिए स्वस्थ मनोरंजन देने वाली फ़िल्में आती थीं तो अक्सर हमें स्कूल से हमारी टीचर्स वे फ़िल्में दिखाने के लिए ले जाती थीं ! हमने के फ़िल्में स्कूल के सहपाठियों के साथ देखी हैं ! जागृति, भाई बहन, पुरानी वाली मासूम, जमीन के तारे आदि ! आज भी बचपन में देखी हुई अनेकों फ़िल्में ज्यों की त्यों स्मृति में सुरक्षित हैं ! आजकल के तो टी वी धारावाहिक ही कभी कभी इतने घटिया हो जाते हैं कि परिवार के सभी सदस्यों के साथ बैठे हों तो बड़ी ऑकवर्ड सिचुएशन हो जाती है ! लेकिन पहले की फिल्मों में न संवाद घटिया होते थे, न पोशाकें घटिया होती थीं न ही दृश्यांकन घटिया होता था ! पूरा परिवार साथ में फिल्म का आनंद लेता था ! अब न तो इतनी अच्छी फ़िल्में बनती हैं न बच्चों में वैसी मासूमियत रह गयी है ! आजकल की फिल्मों में इतनी हिंसा दिखाई जाती है कि वह बच्चों के कोमल मन पर बहुत अधिक दुष्प्रभाव डालती है ! अवास्तविक दृश्यांकन होते हैं ऐसे दृश्यों के और बच्चे इनकी नक़ल करते हुए कई बार अपनी जान खतरे में डाल देते हैं ! हम लोगों ने अपना बचपन जितना सुरक्षित और खूबसूरत बिताया है आजकल के बच्चे उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते ! वे अति काल्पनिक वीडियो गेम्स में व्यस्त रहते हैं और एकान्तप्रिय होते जा रहे हैं !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
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