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Friday, October 9, 2026

नसीहत

 


नव विवाहिता चित्रा अपनी ससुराल में गृहस्थी के सबक सीख रही थी ! पढ़ने में बेहद मेधावी और संगीत, अभिनय, स्पोर्ट्स सब में सबसे आगे रहने वाली चित्रा विवाह की दौड़ में भी सबसे आगे रही ! पिताजी के सेवा निवृत हो जाने के कारण उसका विवाह भी सबसे पहले हो गया और पढाई-लिखाई, खेलकूद, अभिनय, संगीत सब पीछे छूट गए ! अपने घर में सबसे बिंदास, खुशमिजाज़ और मस्तमौला चित्रा रूढ़िवादी ससुराल में परिवार की सबसे बड़ी बहू बन कर आई जिसके कंधे पर गृहस्थी के सुचारू संचालन का भार तो था ही अपने छोटे सदस्यों के सामने अपने अनुशासित आदर्श व्यवहार का उदाहरण रखना भी था ताकि वे घर की परम्परा का पूरी तरह से निर्वाह करने में कभी भूल न करें ! इसीलिये अति अनुशासन प्रिय सासू माँ की सख्त नज़र सदैव चित्रा पर रहती कि किसी भी काम में उससे कोई भूल न हो जाए ! ज़रा सी गलती पर चित्रा को डाँट भी बहुत पड़ती ! चित्रा बेचारी मन ही मन घुटती रहती लेकिन किसीसे कुछ न कहती ! मन में विद्रोह की ज्वाला भड़कती तो भी वह उसे जैसे-तैसे शांत कर लेती ! 

चित्रा के पति सौमित्र सब कुछ देखते समझते हुए भी अपनी माँ से कुछ न कह पाते ! उनकी परवरिश और संस्कार आड़े आ जाते ! लेकिन चित्रा की घुटन भी उन्हें नागवार लगती ! 

एक बार सौमित्र चित्रा को अपने साथ फिल्म दिखाने के लिए ले जाना चाहते थे ! माँ से अनुमति माँगने की हिम्मत चित्रा की हो नहीं रही थी और सौमित्र खुद पूछने में संकुचित हो रहे थे ! जैसे-तैसे बहुत समझाने पर चित्रा ने डरते-डरते सासू माँ से सौमित्र के साथ फिल्म देखने जाने की इजाज़त माँगी ! आशा के अनुरूप उनका गुस्सा सातवें आसमान पर था ! 

“तुम सिनेमा देखने चली जाओगी तो रात का खाना कौन बनाएगा ? एक तो वैसे ही तुम्हें कुछ आता-जाता नहीं है ! उस पर सारा ध्यान सिंगार पटार में और घूमने फिरने में लगा रहता है !”

“नहीं माँ जी ! इनकी मर्जी है जाने की !” चित्रा ने सहमते हुए प्रतिवाद किया ! 

“तो तुम्हीं ने कहा होगा उसे सिनेमा ले जाने लिए ! मन लगता कहाँ है तुम्हारा घर के कामों में !” 

आँखों में आँसू भरे हुए चित्रा कमरे में आ गयी ! सौमित्र का चेहरा तमतमाया हुआ था ! ज़ाहिर है उन्होंने सारी बातें सुन ली थीं ! चित्रा की पीठ पर स्नेह से थपकी देते हुए उन्होंने एक ही बात कही - 

“चित्रा, सत्ता किसीको भी प्लेट में सजी हुई नहीं मिलती न उसके लिए तुम घर वालों की भीड़ जुटा कर मोर्चाबंदी कर सकती हो ! उसके लिए तो तुम्हें खुद ही प्रयत्न करने होंगे अपनी समझदारी से ! कभी नरमी से तो कभी सख्त होकर भी !”  


साधना वैद 


 




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