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Tuesday, April 8, 2014

प्रतीक्षा



अचानक
यह कैसा सन्नाटा 
छा गया जीवन में
ना कोई आहट
 ना कोई दस्तक
 ना कोई आवाज़
 ना कोई साथ  
बस चहुँ ओर
पसरा हुआ एक शून्य
  धरती से आसमाँ तक  
एक बहुत
बड़ा सा शून्य !
जैसे जीने के लिये
कोई वजह ही नहीं
  जैसे हर सुबह 
हर शाम के
 अर्थ ही खो गये !
  ना कोई सवाल  
ना कोई जवाब
ना कोई ध्वनि
ना कोई प्रतिध्वनि !
बाकी जो बचा है
वह है सन्नाटा
एक दम घोंटू  
जानलेवा सन्नाटा !
 हवा के झोंके से  
खड़कना कुंडी का
और द्वार खोल
बेवजह पहरों
खड़े रहना उसका
एक अंतहीन निर्जन
सुनसान राह पर
टकटकी लगाये
एक निष्फल सी
आस लिये कि  
शायद तू आ जाये
या शायद तेरा
संदेसा ही आ जाये !
लेकिन क्या कभी
बहती धारा को
पलट कर पहाड़ों पर
चढ़ते देखा है ?
उसकी आस का सूरज
उदित हुए बिना
साँझ से पहले ही  
अस्त हो चुका है ! 
और प्रतीक्षा
वह बेचारी भी अब
थक कर सो चुकी है
चिरनिंद्रा में
शायद कभी ना
उठने के लिये !
  

साधना वैद

Sunday, April 6, 2014

जगह ही जगह हो गयी



आज मैं आपको एक बहुत ही रोचक कहानी सुनाने जा रही हूँ ! ज़रा ध्यान से सुनिये ! बाद में मुझे आपके सुझावों की भी ज़रूरत होगी ! कहानी कुछ इस तरह है .......

एक बहुत ही विद्वान महात्मा जी थे ! उनके पास हर प्रकार की समस्या का समाधान मिल जाता था और वे अपने भक्तों को अपनी इस चमत्कारी योग्यता से अक्सर ही चिंतामुक्त भी कर दिया करते थे ! एक दिन उनके पास एक दुखियारा व्यक्ति अपनी समस्या लेकर पहुँचा ! समस्या कुछ विचित्र भी थी और गंभीर भी ! उसके पास मात्र दो कमरे का छोटा सा घर था और परिवार बड़ा ! इस छोटे से घर में वह अपनी पत्नी और चार बच्चों के अलावा अपने माता-पिता, एक छोटी बहन और एक छोटे भाई के साथ रहता था ! बड़े परिवार के साथ घर में कुछ पालतू जानवर भी थे ! जैसे एक कुत्ता, एक बकरी और उसका मेमना, चंद मुर्गे-मुर्गियाँ और एक तोता ! आदमी की समस्या यह थी इतने छोटे से घर में इतने बड़े परिवार के सभी सदस्यों के साथ कैसे रहा जाये वह सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा था ! आमदनी बहुत ही सीमित थी इसलिए वह बड़ा घर भी नहीं ले सकता था ! महात्माजी के पास वह अपनी इसी समस्या के समाधान के लिये आया था !

महात्मा जी ने ध्यान से उसकी समस्या सुनी और चंद सवाल किये,

“आजकल कैसे गुजर बसर कर रहे हो ?”

“क्या बताऊँ महाराज माँ बापू एक कमरे में रहते हैं मेरे भाई बहन के साथ और अपने चार बच्चों के साथ हम पति पत्नी दूसरे कमरे में रहते हैं ! बकरी और मुर्गे-मुर्गी बाहर बाड़े में रहते हैं, तोते का पिंजड़ा घर के बाहर टाँग देता हूँ और कुत्ता घर के दरवाज़े के बाहर बँधा रहता है ! बहुत दिक्कत होती है महाराज बच्चे भी बड़े हो रहे हैं ! उन्हें सोने, खेलने कूदने के साथ लिखने पढ़ने को भी जगह चाहिये ! कोई उपाय बताइये मैं बहुत परेशान हूँ !” आदमी कातर स्वर में बोला !

“हूँ .... !” महाराज सोच विचार में डूब गये ! फिर बोले,

“ऐसा कर ! घर जाकर आज से बकरी और उसके मेमने को घर के अंदर ही रखना ! फिर अगले हफ्ते मेरे पास आना !”

आदमी सुन कर चकराया यह कैसा उपाय बताया महाराज ने ! लेकिन आज्ञा मानने के लिये वह बाध्य था ! सो घर जाकर उसने ऐसा ही किया !

अगले सप्ताह जब महात्मा जी के पास पहुँचा तो वह पहले से भी अधिक परेशान था ! दुखी स्वर में बोला !

“महाराज ये कैसा उपाय बताया आपने ! अब तो मुश्किल और भी बढ़ गयी है ! रात भर बकरी मिमियाती है ! उसके चारे भूसे की बदबू घर में भरी रहती है ! मेमना भी घर भर में कूदता रहता है ! अब तो जगह की और भी किल्लत हो गयी है !”

महात्मा जी ने अप्रसन्न होकर आदमी को फटकार लगाई, “जब मेरी बात माननी ही नहीं है तो मेरे पास आया ही क्यों ? जा भाग जा यहाँ से ! मैं तुझे कुछ नहीं बताउँगा !”

फटकार खाकर आदमी शर्मिन्दा हो गया ! क्षमा याचना कर उनकी हर बात मानने के लिये उसने वचन दिया और चुप होकर बैठ गया ! महात्मा जी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए बोले, “घर जा ! और आज से कुत्ते को भी घर के अंदर ही बाँध कर रखना ! फिर अगले हफ्ते मेरे पास आना !”

आदमी चकराया हुआ घर गया ! लेकिन महात्मा जी की बात तो उसे माननी ही थी ! नतीजतन अगली बार जब वह महात्मा जी के पास पहुँचा तो वह पहले से भी अधिक परेशान था ! लेकिन इस सबसे बेपरवाह महात्मा जी ने इस बार उसे तोते के पिंजड़े को भी अंदर ही टाँगने का मशवरा दे डाला ! आदमी की दिक्कतें कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही थीं ! और जैसा कि होना लाजिमी था वह और दुखी और परेशान होता जा रहा था ! अगले हफ्ते महात्मा जी ने आदमी को सारे मुर्गे मुर्गियों को भी कमरे में ही रखने का सुझाव दे डाला !

सारे पालतू जानवरों को अपने घर में ही रहने की जगह देने के बाद इस बार जब आदमी महात्मा जी के पास पहुँचा तो वह फूट-फूट कर रो रहा था !

“महाराज ! अब तो बहुत बुरा हाल है ! घर के अंदर तो सारे जानवर रह रहे हैं और हम सब परिवार वालों को घर से बाहर निकलने की नौबत आ गयी है ! कुत्ता बच्चों के पास चिपक कर सोता है ! रात भर मुर्गे मुर्गी सारे घर में सोते लोगों पर कूदते रहते हैं ! कोई भी सो नहीं पाता ! तोता टाँय-टाँय कर दिन भर शोर मचाता रहता है ! बकरी और मेमना घर में गन्दगी करते हैं ! घर एकदम नर्क सा हो गया है ! कोई सही उपाय बताइये महाराज नहीं तो जीना मुश्किल हो जायेगा !”

महात्मा जी ने उपाय बताया, “जा ! आज घर जाकर मुर्गे मुर्गियों को बाहर बाड़े में बंद कर देना और अगले हफ्ते आकर मुझे बताना कि क्या फर्क पड़ा !”

अगले सप्ताह आदमी के चहरे पर कुछ राहत के चिन्ह थे ! महात्मा जी को उसने बताया कि मुर्गे मुर्गियों के बाहर कर देने से कुछ आराम हो गया और घर वाले कम से कम कुछ देर तो सो पाये ! महात्मा जी मुस्कुराये ! इस बार उन्होंने सुझाव दिया कि तोते का पिंजड़ा बाहर टाँग दो और अगले हफ्ते आकर मुझसे मिलो ! अगले सप्ताह आदमी के चहरे पर प्रसन्नता दिखाई दे रही थी ! खुश होकर उसने बताया कि तोते की टाँय-टाँय सुनाई नहीं देने से बच्चे कुछ देर पढ़ भी पाये और सब लोगों को नींद भी ठीक से आई ! सुबह जब सब सोकर उठे तो खुश भी थे और तरो ताज़ा भी !

महात्मा जी की मुस्कराहट कुछ और बढ़ गयी ! इस सप्ताह उन्होंने कुत्ते को बाहर निकालने का सुझाव दिया ! नतीजतन आदमी की सहूलियत में भी कुछ और इजाफा हुआ ! अंतिम सप्ताह में उन्होंने बकरी और उसके मेमने को भी घर से बाहर बाड़े में बाँधने का परामर्श उस आदमी को दिया ! सारे पालतू जानवरों को बाहर निकालने के बाद जब आदमी महात्मा जी के पास पहुँचा तो उसकी खुशी का कोई अंत नहीं था ! हालचाल पूछने के बाद बेसाख्ता उसके मुँह से निकला, “अब तो जगह ही जगह हो गई महाराज ! अब कोई दिक्कत नहीं है ! बाल बच्चे भी आराम से हैं ! माँ बापू भी खुश हैं ! जानवर भी बाहर चैन से हैं ! आपका बड़ा उपकार महाराज मेरी चिंता दूर कर दी !” और वह खुशी-खुशी अपने घर चला गया ! महाराज के चहरे पर भी रहस्यमयी मुस्कराहट फ़ैल गयी !

तो कहानी कैसी लगी आपको ! क्या यही कहानी हम देशवासियों के साथ नहीं दोहराई जा रही ? तात्पर्य यह है कि यदि हालात अत्यधिक खराब हो जायें और कष्ट बहुत अधिक बढ़ जाये तो छोटी छोटी राहतें भी सुखद लगने लगती हैं और लगता है कि सब कुछ ठीक हो गया ! इसीको फील गुड फैक्टर भी कहते हैं ! आज देश के हालात और जनता की तकलीफें इतनी बढ़ चुकी हैं कि इससे खराब स्थिति और कुछ हो ही नहीं सकती ! चुनाव के बाद इस बार जो भी सरकार बनेगी वह यदि छोटे-छोटे अच्छे काम भी करेगी उनसे ही जनता बहुत राहत महसूस करेगी और उसीको सरकार की गुड गवर्नेंस मानेगी !

खाने पीने की बुनियादी वस्तुएँ जैसे अनाज, दूध, खाद्य तेल, चीनी, साग सब्जियों और ईंधन आदि की कीमत मंडियों और ट्रांसपोर्ट के बेहतर प्रबंधन और जमाखोरों पर सख्ती करने से बहुत कम की जा सकती हैं जिसके लिये कुछ खर्च करने की भी ज़रूरत नहीं है !

अस्पताल आज की तारीख में जितने भी हैं उन्हें सुचारू प्रबंधन से इस लायक बनाया जा सकता है कि गरीब जनता के कष्ट तो मिट ही जायेंगे ! दवाओं की बेतहाशा बढ़ी हुई कीमतों की पोल हर दवा का व्यापारी, डॉक्टर, मेडिकल रिप्रेंजेंटेटिव अच्छी तरह से समझता है ! ३०% दाम तो एक ही झटके में कम हो सकते हैं ! यहाँ दवाओं पर एम आर पी (मैक्ज़ीमम रिटेल प्राइस) लिखने का रिवाज़ तुरंत समाप्त होना चाहिये ! उन पर (मिनिमम सेलिंग प्राइस)  लिखी होनी चाहिये ताकि लोगों को पता चल सके कि उन दवाओं पर कितना मुनाफ़ा कमाया जा रहा है !

नये स्कूल जब बनेंगे तब बनेंगे ! फिलहाल जितने भी स्कूल वर्तमान में अस्तित्व में हैं उन्हें दो या, यदि संभव हो तो, तीन शिफ्ट्स में चला कर विद्यार्थियों के लिये शिक्षा तथा अध्यापकों के लिये नौकरी की व्यवस्था की जा सकती है और अशिक्षा व बेरोजगारी की समस्या पर काबू पाया जा सकता है !  

सफाई और कचरे के प्रबंधन के लिये जो भी वर्तमान व्यवस्था है उसीको सही तरह से लागू करके अपने शहर और गाँव को काफी हद तक साफ़ व सुंदर बनाया जा सकता है !

वर्तमान सरकार हमारी समस्याओं को बढ़ाने के लिये बकरी, कुत्ते, तोता, व मुर्गे मुर्गियों को हमारे घरों में अंदर घुसा चुकी है ! चुनाव के बाद आने वाली सरकार को तो बस इन्हें एक-एक करके बाहर ही निकालना है ! इन कुछ बुनियादी ज़रूरतों के पूरे हो जाने से ही उपरोक्त कहानी के नायक की तरह हर आम आदमी को महसूस होने लगेगा कि बहुत सी राहत मिलने लगी है और इस फील गुड फैक्टर की वजह से उन्हें अपने देश की सुजलाम, सुफलाम भूमि पर शीतल मलय पवन बहती हुई वास्तव में महसूस होने लगेगी ! आपका क्या विचार है ?



साधना वैद


Friday, April 4, 2014

Wednesday, April 2, 2014

हौसला फौलाद सा




चाहे जितना आजमा लो तुम हमें
हर कसौटी पर खरे उतरेंगे हम !

चाहे जितनी आँधियाँ चलने लगें
दीप की लौ को प्रखर रखेंगे हम !

चाहे जितने जाल फैला ले जहाँ
दूर सूरज चाँद तक पहुँचेंगे हम !

हारना सीखा नहीं हमने कभी
जीत को मुट्ठी में बंद कर लेंगे हम !

मुँह छिपा कर बैठना फितरत नहीं
तान कर सीना चला करते हैं हम !

दुश्मनों की बद्दुआ का डर नहीं
दोस्तों के प्यार को तकते हैं हम !

बाजुओं में आसमाँ दिल में ज़मीं
हौसले फौलाद से रखते हैं हम !

लाख बाधा सामने कर दो खड़ी
हर चुनौती पर खरे उतरेंगे हम !

साधना वैद


Tuesday, April 1, 2014

कैसे चुनें एक योग्य प्रत्याशी .......





देश में लोक सभा के चुनाव होने जा रहे हैं ! कुछ माह पहले देश के पाँच प्रदेशों में विधान सभा के चुनाव हुए थे ! अलग-अलग समय पर नगर निगम व स्थानीय निकायों के चुनाव भी होते रहते हैं ! हम सबको यह समझना चाहिये कि तीनों तरह के चुनावों में विजयी तो सबसे लोकप्रिय प्रत्याशी ही होता है लेकिन हर चुनाव के विजेता की जिम्मेदारियाँ भिन्न प्रकार की होती हैं ! जहाँ लोकसभा के लिये चुना हुआ एम पी केन्द्र में सरकार बनाने का माध्यम बनता है और देश की आर्थिक नीति, रक्षा नीति, आतंरिक सुरक्षा, विदेश नीति, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, पर्यावरण आदि महत्वपूर्ण मंत्रालयों का संचालन करता है व पूरे देश के विशाल बजट का निर्धारण करता है वहीं विधान सभा का विधायक चुने जाने के बाद अपने प्रदेश की समस्याओं, प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग व अपने प्रदेश की आमदनी व केन्द्र से मिलने वाले अपने हिस्से की धन राशि को जनहित में समुचित रूप से खर्च करने का माध्यम बनता है ! इसका दायित्व अपने प्रांत की पुलिस, प्रशासन, शिक्षा, स्वास्थ्य, फसल, आदि के समुचित प्रबंधन को देखना होता है ! इसी तरह स्थानीय समस्याओं के निदान के लिये ज़िम्मेदार हमारे शहर के नगरनिगम का पार्षद होता है जो कि हमारे मोहल्ले की सड़क, पानी, बिजली, सफाई आदि की समस्याओं के समाधान के लिये जवाबदेह होता है ! कहने का तात्पर्य यह है कि तीनों चुनावों के लिये अलग-अलग योग्यताओं वाले प्रत्याशियों की आवश्यकता होती है और चुनाव के वक्त प्रत्याशियों को हमें इन कसौटी पर कस कर ज़रूर परख लेना चाहिये ! कार्यचक्र कुछ इस प्रकार चलता है कि पार्षद अपने मोहल्ले की समस्याओं के हल के लिये अपने क्षेत्र के विधायक से मिलेगा और राज्य सरकार से उस समस्या का समाधान करायेगा ! जो समस्याएं राज्य स्तर पर हल नहीं हो सकती हैं उनके लिये केन्द्रीय सहायता के वास्ते एम एल ए अपने शहर के एम पी से मिलेगा ! वह एम पी या तो स्वयं सत्ता में होगा या विपक्षी नेता के रूप में सरकार पर दबाव डालने के लिये सक्षम होगा ! अर्थात इस लोक सभा में हम जिस सांसद को चुनने जा रहे हैं वह प्रधान मंत्री, केन्द्र सरकार का मंत्री अथवा विपक्ष का कोई मजबूत नेता बनने जा रहा है ! वह इस महत्वपूर्ण दायित्व को उठाने के लिये पर्याप्त रूप से सुयोग्य अथवा सक्षम है या नहीं यह सुनिश्चित कर लेना भी अति आवश्यक है !
अब इस विषय पर भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि प्रत्याशी की छवि साफ़ सुथरी हो और उसका कोई आपराधिक इतिहास ना हो ! यही सबसे टेढी खीर है ! चुनाव में भाग लेने वाली पार्टियों तथा चंद प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा आम जनता का बहुत बड़ा प्रतिशत तो अपने क्षेत्र से खड़े होने वाले सारे प्रत्याशियों के नाम तक नहीं जानता उनके अच्छे बुरे क्रियाकलापों के बायोडाटा की जानकारी उन्हें होगी यह तो नितांत असंभव है ! यह विडम्बना ही है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र वाले हमारे देश में चुनाव प्रक्रिया केवल दाँव पेंच और षड्यंत्र वाली चौसर की बाज़ी बन कर रह गयी है ! यहाँ राजनैतिक पार्टियाँ प्रत्याशियों को टिकिट क्षेत्र विशेष की ज़मीनी समस्याओं के बारे में उनकी जानकारी और कटिबद्धता या वहाँ की आम जनता के साथ उनके जुड़ाव या आत्मीय संबंधों को ध्यान में रखते हुए नहीं देतीं वरन चुनाव को चटपटा और चटखारेदार बनाने के लिये विरोधी पार्टी के सामने ऐसे प्रत्याशी को खड़ा कर देती हैं जिसे भले ही आम जनता की समस्याओं की जानकारी ना हो किन्तु वह अपनी लोकप्रियता के बल पर दूसरे प्रत्याशी के वोट काटने में सफलता की गारंटी बन सके यह अधिक ज़रूरी है ! इस चुनावी पैंतरेबाज़ी में जनता किस कोने में सिमट कर रह जाती है इस ओर किसीका ध्यान नहीं जाता ! ऐसे में सुदूर प्रदेशों से खींच कर लाये गये अनजान अपरिचित प्रत्याशियों की आपराधिक गतिविधियों की जानकारी स्थानीय जनता को भला कैसे मिल सकती है ! चुनाव की वेब साईट पर सभी प्रत्याशियों के बारे में सारी जानकारी उपलब्ध होती है यह सच है लेकिन ज़रा सोचिये हमारे वोटर्स का कितना बड़ा प्रतिशत इतना शिक्षित है जो इंटरनेट की सुविधा का लाभ उठाना जानता है ! कितने लोगों के पास यह सुविधा उपलब्ध है और कितने लोगों के पास इतना वक्त और फालतू पैसा है कि अपने घर की रोजी रोटी की समस्याओं को दरकिनार कर साइबर कैफे में अपनी जेब से पैसे खर्च कर वे अपने प्रत्याशियों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता को अधिक महत्व दे सकें ! ये बातें सारी कपोल कल्पना से अधिक कुछ नहीं !  यदि इस सन्दर्भ में जनता को जागरूक करना है तो मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझदारी से उठानी पड़ेगी ! एक विशेष समय पर स्थानीय चैनलों पर क्षेत्र विशेष के हर प्रत्याशी की सम्पूर्ण जानकारी दर्शकों व श्रोताओं के लिये उपलब्ध करानी होगी ! जिसे सुन व देख कर वोटर्स अपने क्षेत्र के प्रत्याशी के बारे में सब कुछ जान सकें ! यही जानकारी स्थानीय अखबारों में प्रतिदिन छापी जानी चाहिए ताकि जो लोग टी वी पर समयाभाव के कारण उस विशेष विज्ञप्ति को देखने से वंचित रह गये वे समाचार पत्रों से जानकारी प्राप्त कर सकें !  
दरअसल चुनाव के लिये प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया ही सर्वथा दोषपूर्ण है ! अभी तक योग्यता और अनुभव को पूरी तरह से दरकिनार कर ऐसे प्रत्याशियों को टिकिट दिया जाता रहा है जो या तो राजनैतिक रूप से सफल बड़े नेताओं के वंशज हैं या फिल्म जगत, टी वी या कला के क्षेत्र की जानी मानी हस्तियाँ हैं ! ये सारे लोग जो हमेशा पाँच सितारा सुख सुविधाओं में रहते आये हैं, जिन्हें हर समय वाई और जेड स्तर की सुरक्षा प्रदान की जाती रही है वे कैसे आम आदमी की ज़रूरतों के बारे में समझेंगे ! जाके पाँव न फटी बिवाई सो क्या जाने पीर पराई ! ऐसे लोग ईमानदार हों भी तो भी जनता के लिये किस काम के हैं ! यह क्षेत्र देश और देशवासियों के प्रति सेवाभाव व समर्पण के लिये है यहाँ कर्मठता, योग्यता व अनुभव की ज़रूरत होती है केवल लोकप्रियता से काम नहीं चल सकता !
मेरे विचार से नेताओं की योग्यता और जनता के प्रति उनके समर्पण के पैमानों में बदलाव की महती आवश्यकता है ! किसी भी पार्टी के प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिये टिकिट तभी मिलना चाहिये जब उसने आम जनता की समस्याओं के समाधान के लिये अपने क्षेत्र में पाँच साल तक ज़मीनी स्तर पर डट कर काम किया हो और उस क्षेत्र का बच्चा-बच्चा तक उन्हें पहचानता हो ! उसके लिये हमें लोकप्रिय नामों की ज़रूरत नहीं है ! हमें ऐसे जुझारू नेताओं की ज़रूरत है जो हमारी बुनियादी आवश्यकताओं को हम तक पहुँचाने में हमारे लिये मददगार साबित हों ! जब कई पार्टियों के नेता प्रतिस्पर्धा के स्तर पर पाँच साल तक काम करके चुनाव के समय परीक्षा देंगे तो परिणाम निश्चित रूप से सुखद आयेंगे ! देश की तो कायापलट ही हो जायेगी ! दरअसल हमें ऐसे नेताओं की ज़रूरत है तो आम जनता की तकलीफों को समझें, उनकी ज़रूरतों को जानें और उनको दूर करने के लिये युद्ध स्तर पर खुद को झोंक दें ! सांसद या विधायक की पदवी कोई इनाम नहीं है कि इसे ट्रॉफी की तरह अलमारी में सजा कर रख दिया जाये या डिग्री की तरह फ्रेम करा कर दीवार पर टाँग दिया जाये ! यह तो काँटो भरा ताज है जिसे पहन कर आप चैन से नहीं बैठ सकते ! आपको जनहित के लिये लगातार काम में लगे ही रहना पड़ता है !



साधना वैद