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Monday, November 18, 2019

आर पार


आज भी खड़े हो तुम
उसी तरह मेरे सामने
एक मुखौटा अपने मुख पर चढ़ाए
नहीं समझ पाती
क्या छिपाना चाहते हो तुम मुझसे
क्यों ज़रुरत होती है तुम्हें
मुझसे कुछ छिपाने की !
जबकि प्रेम की सबसे बड़ी और
सबसे पहली शर्त होती है
पारदर्शिता, विश्वास और ईमानदारी !
इस मुखौटे के आर पार
तुम्हारा असली चेहरा देखने की
मैंने बहुत कोशिश की कई बार
लेकिन सफल न हो सकी !
तुम्हारी बातों से ,
तुम्हारे स्वरों के आरोह अवरोह से
तुम्हारे चहरे को कल्पना में देखा करती हूँ !
फिर तुम्हारे मुखौटे के आर पार
झाँक तुम्हारे असली चहरे से
उसे मिलाना चाहती हूँ !
बताओ ना यह मुखौटा
कब उतारोगे तुम ?
मुझे सत्य के दर्शन करने हैं !
तुम्हारा असली चेहरा देखना है मुझे
बिना किसी मुखौटे के !
बिना आर पार की इस
ताकाँ झाँकी के
ज़द्दोजहद के !
फिर वह सत्य कितना भी
कड़वा क्यों न हो !

साधना वैद

20 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (20-11-2019) को     "समय बड़ा बलवान"    (चर्चा अंक- 3525)     पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  2. बहुत गहरी सोच |

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    1. हार्दिक धन्यवाद जीजी ! आभार बहुत बहुत !

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  3. वाह!
    गहन अभिव्यक्ति सुंदर सृजन 👌
    सादर नमन आदरणीया मैम 🙏

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    1. हार्दिक धन्यवाद आँचल जी ! आभार आपका !

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  4. सच मुखौटों के पीछे का प्रेम पानी के बुलबुले की तरह है, जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता
    बहुत सुन्दर

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    1. बहुत बहुत आभार कविता जी ! हृदय से धन्यवाद !

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २० मार्च २०२० के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार श्वेता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  6. प्रेम में एक दूसरे को सम्पूर्ण सौंप दिया जाता है।
    फिर एक दूसरे से छुपाना क्या
    और सत्य को जानने की ललक क्या।
    कई बार मात्र समझौते को प्रेम समझ बैठते हैं।
    बहुत उम्दा रचना।
    एकदम ललनटोप।
    नई रचना- सर्वोपरि?

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    1. हार्दिक धन्यवाद रोहितास जी ! आभार आपका !

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  7. जबकि प्रेम की सबसे बड़ी और
    सबसे पहली शर्त होती है
    पारदर्शिता, विश्वास और ईमानदारी।
    इस शर्त पर खरा उतरनेवाला प्रेम तो नसीबवालों को ही मिलता है ना दी ?
    सादर, बहुत सा स्नेह आपके लिए।

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    1. हार्दिक धन्यवाद मीना जी ! रचना आपको अच्छी लगी मेरा लिखना सफल हुआ ! आभार आपका !

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  8. बहुत मार्मिक मनुहार साधना जी | विशवास प्रेम की सबसे पहली शर्त और शायद आखिरी भी| प्रेमातुर लेकिन विकल नारी मन की मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति | हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई सुंदर लेखन के लिए |

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    1. बहुत बहुत आभार आपका रेणु जी ! हृदय से धन्यवाद !

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  9. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(०३-०५-२०२०) को शब्द-सृजन-१९ 'मुखौटा'(चर्चा अंक-३६९०) पर भी होगी।

    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार अनीता जी ! सप्रेम वन्दे !

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  10. गहरी संवेदना लिए सुंदर सृजन ,सादर नमन साधना दी

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    1. हृदय से बहुत बहुत आभार आपका कामिनी जी ! हार्दिक धन्यवाद !

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