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Tuesday, January 21, 2020

ताशकंद यात्रा – ९ आइये चलते हैं बुखारा – २



बुखारा मध्य एशिया में स्थित एक बड़ा इस्लामिक तीर्थ स्थान है ! यह एक बहुत ही पुराना शहर है जिसमें सात सौ तेरहवीं सदी में बनी हुई पुरानी इमारतें भी आज तक अपनी पूरी शानो शौकत के साथ खड़ी हुई हैं ! इस शहर की सबसे अनोखी बात यही है कि आक्रमणकारी इस पर बार-बार हमले करते रहे इसे नष्ट करते रहे और इसका बारम्बार पुनर्निर्माण होता रहा ! सच पूछा जाए तो यह पूरा शहर ही एक विशाल म्यूज़ियम की तरह है ! यह अद्भुत शहर बुखारा उसी सिल्क रूट के किनारे बसा हुआ है जिसके द्वारा चीन और यूरोप के बीच व्यापार हुआ करता था ! यह सोच कर बहुत रोमांच का अनुभव हुआ कि इटली का मार्को पोलो, जिसका घर हमने वेनिस में देखा था, इसी सिल्क रूट से यात्राएं करता था और अनेकों बार बुखारा में आकर ठहरता था ! आज हम भी उसी सिल्क रूट पर अपने कदम रखने जा रहे थे ! सन् १९९३ में बुखारा की ऐतिहासिक इमारतों को यूनेस्को ने विश्व धरोहर की सूची में सम्मिलित कर लिया है !
ल्याबी हौज़ पहनावा
सुबह के नाश्ते के बाद ल्याबी हाउस होटल से बिलकुल तरो ताज़ा और चुस्त दुरुस्त हमारा काफिला बुखारा की सैर के लिए निकल पड़ा ! पाँच सात मिनिट्स चलने के बाद ही हम ल्याबी हौज़ पहुँच गए ! यह एक छोटा सा सरोवर है जिसके आस पास अनेकों छोटी बड़ी दिलचस्प चीज़ें आपका ध्यान आकर्षित करती हैं ! बीच में बिलकुल स्वच्छ पानी का ताल, उसके आस पास सजे सँवरे गलियारे, खाने पीने के छोटे छोटे जॉइंट्स, दो कूबड़ वाले ऊटों की जीवंत मूर्तियाँ और कुछ दूरी पर खड़ी थी सोलहवीं सदी में बनी नोघई कारवाँसेरी की आलीशान इमारत ! एक और बहुत अनोखी चीज़ वहाँ देखी कि ताल के आस पास सूखे पेड़ों के तनों पर बहुत ही आकर्षक डिजाइंस के कपड़े चढ़ाये गए हैं ! इन्हें केवल सजावट के लिए चढ़ाया गया है या वहाँ के हस्त शिल्प का विज्ञापन है या और फिर इसका कोई अन्य आध्यात्मिक महत्त्व है पता नहीं चल सका !
मुल्ला नसीरुद्दीन की मूर्ति
नोघई कारवाँसेरी के विशाल परिसर में गधे पर सवार मुल्ला नसीरुद्दीन की बहुत ही दिलचस्प और मज़ेदार सी मूर्ति रखी हुई है जो इस स्थान के प्रमुख आकर्षणों में से एक है ! उसे देख कर सारे पर्यटक बहुत खुश हो जाते हैं और बड़े शौक के साथ उसके संग अपनी फोटो खिंचवाते हैं ! मुल्ला नसीरुद्दीन की कहानियाँ उसी तरह से मशहूर हैं जैसे बीरबल, तेनाली राम और लाल बुझक्कड़ की कहानियाँ भारत में मशहूर हैं ! भारत में तो मुल्ला नसीरुद्दीन पर आधारित एक टी वी धारावाहिक भी बना था जो काफी लोकप्रिय हुआ था ! हमारे ग्रुप के तो सारे ही लोग इस चरित्र से बखूबी परिचित थे ! यहाँ सबने अपनी खूब तस्वीरें खिंचवाईं !
नोघई कारवाँसेरी
इस स्टेचू पीछे स्थित है सोलहवीं सदी में बनी विशाल नोघई कारवाँसेरी जिसे खान मोहोम्मद रिहिम्बी के शासन काल में बनवाया गया था और जो उस ज़माने में बाहर से आने वाले व्यापारियों के रहने ठहरने के लिए मशहूर ठिकाना मानी जाती थी ! इस एक मंज़िला इमारत में यात्रियों के खाने पीने, सोने रहने व अन्य सभी सुख सुविधाओं के सारे प्रबंध होते थे ! इसका परिसर बहुत विशाल था और इसमें ४५ कमरे, नौकरों के रहने की समुचित व्यवस्था, रसोई एवं अन्य सहायता कक्ष हुआ करते थे ! इसे सिल्क रूट की आधार शिला कहा जाता था ! आजकल इस स्थान को हस्त शिल्प क्षेत्र में बदल दिया गया है !
हस्तशिल्प बाज़ार
इस हस्तशिल्प बाज़ार की सैर बहुत ही रोचक एवं आनंदवर्धक रही ! बिलकुल सही अर्थों में यह शिल्प बाज़ार है जहाँ हुनरमंद कारीगर अपनी कला प्रदर्शन करते हुए दिखाई देते हैं ! आपके पास फुर्सत हो, सीखने की ललक हो और उस कला का आपको थोड़ा बहुत ज्ञान हो तो निश्चित रूप से आप बहुत कुछ सीख सकते हैं ! सुन्दर रंगबिरंगे डिजाइंस में सिल्क के कपड़े को हथकरघे पर बुनते हुए देखना बहुत सुखकारी अनुभव था ! इस स्टॉल पर कपड़ों का रंग संयोजन और नमूने काफी कुछ भारत के कटक प्रिंट के कपड़ों से मिलते जुलते लगे ! एक स्टॉल पर एक बहुत बुज़ुर्ग महिला बड़े ही सधे हुए हाथों से कुरते पर कढ़ाई कर रही थीं ! हस्त शिप के खिलौने, सोवेनियर्स, कठपुतलियाँ सब यहाँ उपलब्ध थे ! कठपुतली वाला हमें देख कर भारतीय अभिनेता अभिनेत्रियों के नाम लेकर उनकी फिल्मों के गीत सुना रहा था और कठपुतलियों को बड़ी कुशलता से हाथों में नचा रहा था ! विदेश में किसी विदेशी के मुख से हिन्दी गीत सुन कर बहुत अच्छा लगा !
मघोक ए अत्तार मस्जिद
बुखारा का यह कॉम्प्लेक्स ऐसा है जहाँ एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए आप लगातार चलते ही रहते हैं ! रास्ते में ऐतिहासिक महत्त्व का कोई स्थान मिल जाता है तो गाइड उसके बारे में आपको बताते हैं ! शिल्प बाज़ार से बाहर निकले तो रास्ते में पड़ी मघोक ए अत्तार मस्जिद ! यह उज्बेकिस्तान की सबसे पुरानी मस्जिद है जिसे मूल रूप से नौवीं सदी में बनाया गया था और सोलहवीं सदी में इसका पुनर्निर्माण किया गया ! यह स्थान आध्यात्मिक महत्त्व का है ! यहाँ पर एक बौद्ध मंदिर और पारसी मंदिर के अवशेष भी मिलें हैं ! यह भी कहा जाता है कि सोलहवीं सदी तक यहाँ पारसी अनुयाइयों को पूजा आराधना करने की अनुमति थी ! इन्हें तुड़वा कर इसके ऊपर मस्जिद बनाई गयी थी ! आक्रमणकारी जब भी बाहर से आते उन मस्जिदों को तोड़ देते ! कुछ इतिहासकार यह भी कहते हैं कि वर्तमान में जो मस्जिद है इसे मंगोलों ने बनवाया था और आक्रमणकारियों से इसे बचाने के लिए इसे रेत के टीले के नीचे दबा कर छिपा दिया था ! सन १९३० में जब इस जगह पर मस्जिद का शीर्ष दिखाई दिया तो खुदाई करके इसे बाहर निकाला गया ! इसके आस पास जो खंडहर दिखाई देते हैं वे उस युग के सार्वजनिक स्नानागार हैं जब बुखारा व्यापार का प्रमुख केंद्र था और यहाँ देश विदेश से अनेकों सौदागर व्यापार करने के लिए आते थे !
बुखारा के बाज़ार
मघोक ए अत्तार से बाहर निकल हम पहुँच गए थे ताकी तल्पक फरोश बाज़ार ! यह बड़ा ही मज़ेदार सा बाज़ार है ! पहले यह केवल टोपियों का बाज़ार था लेकिन वर्तमान में यहाँ पर्यटकों की दिलचस्पी के सारे सामान मिलते हैं ! बुखारा गर्म शहर है ! बाज़ार में ठंडी हवा के आवागमन के लिए छतों की गुम्बद इस तकनीक से बनाई गयीं थीं कि वे बाहर की गर्म हवा को खींच ठंडा करके नीचे फेंकती थीं और बाज़ार के तापमान को खुशगवार बनाए रखती थीं ! इस बाज़ार में हर तरह का सामान मिलता है ! बजाने वाले वाद्यों से लेकर, टीशर्ट्स, कपडे, कलात्मक कैंची, छुरी, चाकू, कालीन, तरह तरह के ठप्पे और भी अनेकों तरह के सामान ! इसीके पास ताकी सर्राफा बाज़ार हुआ करता था जहाँ पहले कभी टकसाल हुआ करती थी लेकिन अब तो हर जगह यही सामान मिल रहा था ! मैंने वहाँ से तीन कलात्मक कैंचियाँ और एक बुखारा की यादगार इमारतों से सजा मोबाइल का कवर लिया ! इसके पास ही एक और छोटा सा मगर बहुत सुन्दर गहनों का बाज़ार है जहाँ सोने, चाँदी और कीमती रत्नों के बहुत सुन्दर आभूषण मिल रहे थे ! ग्रुप की सभी महिलाओं की आँखें खुशी से चमक उठीं ! आभूषण जितने सुन्दर थे उतने की कीमती भी थे !
मीर ए अरब मदरसा
इसी कॉम्प्लेक्स में मीर ए अरब मदरसा स्थित है ! इसका निर्माण सन् १५३५ से सन् १५३६ के बीच बुखारा के तत्कालीन राजा उबेदुल्ला खान ने अपने आध्यात्मिक गुरू शेख अब्दुला यमानी के नाम पर करवाया जो यमन के रहने वाले थे ! उन्हें मीर ए अरब भी पुकारा जाता था ! उबेदुला खान ने अपने शासनकाल में ईरान पर तीन बार आक्रमण किया और इन आक्रमणों के बाद उसके पास बेशुमार दौलत और तीन हज़ार युद्ध कैदी इकट्ठा हो गए ! इन कैदियों को गुलाम की तरह बेच कर जो धन एकत्रित हुआ उससे यह विशाल मदरसा बनवाया गया ! इसका प्रांगण बहुत बड़ा है ! इसके प्रवेश द्वार पर नीले रंग की एक आकर्षक गुम्बद है ! उबेदुल्ला खान बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था ! उस समय तक भव्य मकबरे बनाने की परम्परा नहीं पड़ीं थी इसलिए मरणोपरांत इसी मदरसे में उसे दफनाया गया !
कलान मीनार
यहाँ से हमारा कारवाँ पो-ए-कलान कॉम्प्लेक्स की ओर बढ़ चला ! यह सबसे सुन्दर स्थान है और इससे जुड़ी कहानियाँ तो और भी रोचक हैं ! कलान मीनार यहाँ की सबसे ऊँची, सबसे भव्य और सबसे पुरानी मीनार है ! इसका निर्माण करखानिद शासक अरसलान खान ने सन् ११२१ में करवाया था ! यह ज़मीन से ४७ मीटर ऊँची है और ज़मीन के नीचे इसकी बुनियाद १० मीटर गहरी है ! धरातल पर इस मीनार का व्यास ९ मीटर है और इसकी ऊपरी मंजिल का व्यास ६ मीटर है ! इस मीनार को बनाने वाले वास्तुकार का नाम बाको है ! इस मीनार के शीर्ष से इमाम और मुअज़्ज़िन धार्मिक घोषणाएँ तो करते ही थे इसका उपयोग मृत्युदंड पाने वाले मुजरिमों को सज़ा ए मौत देने के लिए भी किया जाता था ! इसीलिये इसे डेथ टावर भी कहा जाता है ! दंड देने के लिए मुजरिमों को मीनार के ऊपर से नीचे पथरीली ज़मीन पर फेंक दिया जाता था ! इस मीनार से जुड़ा एक दिलचस्प वाकया है कि चंगेज़ खान ने जब बुखारा पर आक्रमण किया तो इस मीनार के आस पास की सारी इमारतों को जला दिया ! वह इसे भी जलाना चाहता था लेकिन इस मीनार की भव्यता देख वह बहुत प्रभावित हुआ ! वह सर उठा कर जब इसकी ऊँचाई का जायज़ा ले रहा था तो उसकी टोपी नीचे गिर गयी ! उसे उठाने के लिए जब वह नीचे झुका तो उसकी फौज के लोगों ने समझा कि चंगेज़ खान इबादत कर रहा है ! चंगेज़ खान के मन में भी कुछ संशय पैदा हो गया कि इस पवित्र स्थान को नष्ट करना उचित नहीं होगा ! इसीलिये उसने इस मीनार को कोई नुक्सान नहीं पहुँचाया ! आज भी अपनी पूरी शान ओ शौकत के साथ आसमान से बातें करती हुई यह मीनार पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनी हुई है !
कलान मस्जिद
कलान मीनार के पास ही बनी हुई है कलान मस्जिद ! यह भव्यता एवं विस्तार में तो समरकंद की बीबी खानम मस्जिद से भी बड़े क्षेत्र में बनी हुई है लेकिन वास्तुकला की दृष्टि से यह उससे बिल्कुल भिन्न है ! जहाँ कलान मस्जिद बहुत सादगी से बनी हुई है समरकंद की बीबी खानम मस्जिद बहुत ही आलीशान और भव्य है ! इसका निर्माण सन् १५१४ में बुखारा के तत्कालीन गवर्नर सुलतान उबेदुल्ला गाजी ने करवाया ! जो आगे चल कर जब बुखारा एक स्वतंत्र राज्य बन गया तो वहाँ का राजा बना ! इस मस्जिद में २०८ खम्भों पर २८८ गुम्बद बने हुए हैं ! यह अपने आप में वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है !
एक और अद्भुत स्थान जो हमने बुखारा में देखा वह था उस ज़माने की बेगमों और शहज़ादियों का शाही हम्माम ! यहाँ पुरुषों को अन्दर जाने की अनुमति नहीं थी ! ग्रुप की सिर्फ महिला सदस्य ही अन्दर गयीं ! बड़े घुमावदार रास्तों से होकर नीचे पहुँचे तो वहाँ एक विदेशी महिला का मसाज उसी पुरातन विधि से किया जा रहा था ! नीचे हॉल में हल्का हल्का धुआँ भरा था और वातावरण लोबान की सुगंध से महक रहा था ! बरतनों में अनेक प्रकार के नैसर्गिक पदार्थ, सूखे पाउडर फूलों की पंखुड़ियाँ, तेल व अन्य कई लोशंस रखे हुए थे जिनसे सौन्दर्यवर्धक प्रसाधनों को तैयार किया जाता है ! यह अनुभव भी बहुत रोमांचक था !
बुखारा दर्शन का हमारा यह सफ़र अपने अंजाम तक आ चुका था ! चलते चलते सब थक भी चुके थे और भूख भी लग आई थी ! लंच के लिए हम लोग इस कॉम्प्लेक्स से बाहर निकले ! खाना खाकर दिन में हमें ट्रेन भी पकड़नी थी ताशकंद के लिए ! तो चलिए चलते हैं खाना खाने !
अगली कड़ी में आपसे मुलाक़ात होगी बुखारा के स्टेशन पर ! हमारे हमसफ़र बन कर आप भी चलिएगा हमारे साथ ताशकंद ! तब तक के लिए इजाज़त दीजिये मुझे ! नमस्कार !


साधना वैद

8 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (22-01-2020) को   "देश मेरा जान मेरी"   (चर्चा अंक - 3588)    पर भी होगी। 
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
     --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  2. साधना जी, बहुत सुन्दर और चित्रात्मक वर्णन और उसमें इतिहास का ख़ूबसूरत स्वादिष्ट तड़का !
    बहुत कम लोगों को पता है कि चंगेज़ खान मुसलमान नहीं था. हमारे भारत में तो सभी खान मुसलमान ही होते हैं. वास्तव में 'खान' सरदार अथवा नायक को कहते हैं. मेरे ख़याल से फ़िल्म 'अजूबा' (बहुत बेकार फ़िल्म थी) में बुखारा के बाज़ार के दृश्य हैं. मध्य-एशिया की इमारतों की भव्यता, उनके खूबसूरत गुम्बद, मीनारें और उन पर टाइल-वर्क तो लाजवाब होते हैं.
    आपकी अगली कड़ी का इंतजार रहेगा.

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    1. हार्दिक धन्यवाद गोपेश जी ! बहुत सुखानुभूति हो रही है कि आप रूचि के साथ मेरा यह यात्रा वृत्तांत पढ़ रहे हैं ! जल्दी ही इस श्रंखला की अगली कड़ी पोस्ट करूँँगी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  3. .. वाह यूं लग रहा है कि घर बैठे बुखारा के दार्शनिक स्थलों का दर्शन कर रही हूं यात्रा वृतांत बहुत ही खूबसूरत तरीके से लिखा आपने और उसमें ऐतिहासिक स्थलों की चर्चा ने चार चांद लगा दिए हैं... मुझे भी आपकी यात्रा के अन्य अनुभवों का इंतजार रहेगा धन्यवाद

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    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! संस्मरण आपको अच्छा लग रहा है जान कर बहुत प्रसन्नता हुई ! अगली कड़ी अभी राइटिंग डेस्क पढ़ाई ! जल्दी पूरा करने का प्रयास करूँँगी ! आभार आपका !

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  4. सुप्रभात
    मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे मैंने स्वयं वहां का ट्रिप एंज्वाय किया है |बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति व् तस्वीरें |

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    1. वाह ! दिल से बहुत बहुत धन्यवाद जीजी! फेसबुक पर देखना इस पोस्ट को ! वहाँँ पोस्ट के साथ प्रचुर मात्रा में तस्वीरें भी हैं !

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