Followers

Thursday, June 18, 2020

एक बाँझ सी प्रतीक्षा


सदियों से प्रतीक्षा में रत
द्वार पर टिकी हुई
उसकी नज़रें
जम सी गयी हैं !
नहीं जानती उन्हें
किसका इंतज़ार है
और क्यों है
बस एक बेचैनी है
जो बर्दाश्त के बाहर है !
एक अकथनीय पीड़ा है
जो किसीके साथ
बाँटी नहीं जा सकती !
रोम रोम में बसी
एक बाँझ विवशता है
जिसका ना कोई निदान है
ना ही कोई समाधान !
बस एक वह है
एक अंतहीन इंतज़ार है
एक अलंघ्य दूरी है
जिसके इस पार वह है
लेकिन उस पार
कोई है या नहीं
वह तो
यह भी नहीं जानती !
वर्षों से इसी तरह
व्यर्थ, निष्फल, निष्प्रयोजन
प्रतीक्षा करते करते
वह स्वयं एक प्रतीक्षा
बन गयी है
एक ऐसी प्रतीक्षा
जिसका कोई प्रतिफल नहीं है !

साधना वैद !

14 comments :

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
    (19-06-2020) को
    "पल-पल रंग बदल रहा, चीन चल रहा चाल" (चर्चा अंक-3737)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद मीना जी ! बहुत बहुत आभार आपका ! सप्रेम वन्दे !

      Delete
  2. वाह बाँझ सी प्रतीक्षा . बहुत ही व्यंजनामय उपमा . बहुत गहरी कविता दीदी .

    ReplyDelete
  3. हार्दिक धन्यवाद गिरिजा जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

    ReplyDelete
  4. प्रतीक्षा तो अन्तहीन इन्तजार है।
    अच्छी रचना।

    ReplyDelete
    Replies
    1. संवेदनशील प्रतिक्रिया के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

      Delete
  5. बहुत ही सुंदर और मार्मिक सृजन आदरणीय दीदी .
    सादर

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद अनीता जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

      Delete
  6. बहुत ही सुन्दर एवं मार्मिक सृजन....

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद विकास जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

      Delete
  7. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" सोमवार 22 जून 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार यशोदा जी ! सप्रेम वन्दे !

      Delete
  8. वाह! बेहतरीन और मार्मिक रचना।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद सुजाता जी ! हृदय से आभार आपका !

      Delete