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Wednesday, January 28, 2026

वसंत-पंचमी लघुकथा

 


वसंत-पंचमी का त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर पीटने की तरह हो गया है ! न कोई उत्साह, न कोई चहल-पहल, न कोई साज-सज्जा, न कोई रौनक ! सब अपने-अपने फोन और लैप टॉप में व्यस्त रहते हैं ! दस आवाजें लगाओ तो बड़ी मुश्किल से मोबाइल में नज़रें गढ़ाए खाने की मेज़ पर आकर बैठ जाते हैं और बिन देखे प्लेट में जो परोस दिया जाता है खाकर उठ जाते हैं ! शोभा की आँखें भर आईं !

वह जब छोटी थी तो हर त्योहार कितने उल्लास के साथ मनाया जाता था ! दो तीन दिन पहले से ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी ! घर में हर सदस्य के कपड़े पीले रंग में रँगे जाते थे ! मम्मी, चाची, भाभी की साड़ियाँ, हम बहनों के फ्रॉक या दुपट्टे ! बाबूजी
, चाचाजी, भैया के कुरते और रूमाल ! वसंत के दिन मम्मी केसर डाल कर चावल की फीरनी बनाती थीं ! दिन में भी खूब मेवा डाल कर पोंगल वाले पीले मीठे चावल और मटर पनीर का पुलाव बनता था ! पीले पतंगी कागज़ से घर का पूजाघर सजाया जाता था और हम सब बच्चे अपनी सारी कॉपी किताबें माँ सरस्वती के सामने सुबह से ही रख देते थे ताकि उन पर विद्या की देवी की कृपा हो जाए और उनसे पढ़ कर हम सब बच्चों को भी माँ शारदे का आशीर्वाद मिल जाए ! सबसे अधिक खुशी इस बात की होती थी कि उस दिन पढ़ाई से फुर्सत मिल जाती थी लेकिन फिर भी सरस्वती माँ के आशीर्वाद की गारंटी पक्की होती थी !

शोभा के पति अरुण से शोभा का मुरझाया चेहरा देखा नहीं गया ! उन्होंने शोभा से फीरनी बनाने के लिए कहा और अपना स्कूटर उठा कर बाज़ार चले गए ! लौट कर आए तो उनके पास मिट्टी के बहुत ही कलात्मक सुन्दर शकोरों से भरा हुआ थैला था ! उन्होंने जल्दी से उन्हें बाल्टी में डाल कर पानी से धोया और शोभा से फीरनी उन शकोरों में परसने के लिए कहा ! शोभा शकोरों में फीरनी डालती जा रही थी और अरुण उन पर कटे हुए पिश्ते बुरकते जा रहे थे ! शोभा का मन तरंगित हो उठा ! उसने जल्दी-जल्दी मीठे चावल बनाए और पूजा की सारी तैयारी कर बच्चों को आवाज़ लगाई !

डाइनिंग टेबिल पर मिट्टी के शकोरों में परोसी हुई फीरनी बहुत आकर्षक लग रही थी ! बच्चों की आँखें चमक उठीं, “वाओ मम्मी ! ये क्या है ! यह तो बहुत बढ़िया लग रही है ! आपने पहले तो ऐसे कभी नहीं बनाई !”
शोभा झूम उठी ! आज उसके मन में भी वर्षों के अंतराल के बाद वसंत महक उठा था !

साधना वैद


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