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Friday, October 14, 2011

किस्सा ए गपोड़शंख उर्फ साधू बाबा बनाम राहुल बाबा


कहानी पुरानी है ! एक गरीब आदमी था ! पर था बहुत भला ! उसकी मुलाकात एक साधू बाबा से हुई ! साधू बाबा को उसकी गरीबी और सीधापन देख कर दया आ गयी ! अपने थैले से एक शंख निकाल कर उन्होंने उस गरीब को दे दिया और बताया कि, “यह शंख तुम्हारी सब ज़रूरतों को पूरा कर दिया करेगा ! इस शंख से जो भी माँगोगे वह तुम्हें मिल जायेगा !”

गरीब आदमी बाबा को धन्यवाद देकर शंख घर ले आया ! परिवार के साथ बैठ कर सबसे पहले शंख से भोजन माँगा ! तुरंत भोजन सामने आ गया ! खुशी-खुशी सबने भोजन किया ! फिर शंख से कपड़े व अन्य आवश्यक वस्तुएँ माँगीं और उन्हें भी शंख ने तुरंत ही उपलब्ध करा दिया ! परिवार के कष्ट दूर हो गये और वे सुखपूर्वक रहने लगे !

उनके पड़ोस में रहने वाले एक धनी पर लालची पड़ोसी ने उनके जीवन में आये इस बदलाव को देखा और गरीब आदमी से इसका रहस्य जानना चाहा ! बार-बार पूछने पर गरीब आदमी ने झिझकते हुए उसे साधू बाबा की मेहरबानी की सारी कहानी सुना दी ! धनी आदमी के मन में लालच आ गया और वह भी साधू बाबा के पास जा पहुँचा ! रुआँसा होकर अपनी गरीबी की झूठी कहानी बाबा को सुनाने लगा और अपने लिये भी एक शंख माँगने लगा ! बाबा सब समझ गये ! उन्होंने अपने झोले में हाथ डाल कर दो शंख निकाले और लालची आदमी से कहा,

“इनमें से कोई एक ले लो !”

लालची आदमी ने बाबा से दोनों का अंतर पूछा तो उन्होंने कहा,

“खुद ही जाँच लो !”

लालची आदमी ने एक शंख हाथ में लिया और उससे एक रुपया माँगा ! तत्काल एक रुपया आ गया ! फिर उसने दूसरा शंख हाथ में लिया और उससे भी एक रुपया माँगा ! शंख बोला, “एक रुपये से क्या आता है ! कम से कम दो रुपये तो माँगो !”

लालची आदमी खुश हो गया और बाबा से वही शंख लेकर घर चला आया !

अब घर आकर उसने सारे परिवार को एकत्रित किया और अपने करामाती शंख का प्रदर्शन शुरू किया ! शंख हाथ में लेकर उसने शंख से सौ रुपये माँगे ! शंख बोला, “सौ रुपये से क्या होगा कम से कम दो सौ रुपये तो माँगो !”

“ठीक है दो सौ रुपये ही दे दो !”

शंख बोला, “दो सौ रुपये से क्या होगा कम से कम चार सौ रुपये तो माँगो !” आदमी कुछ घबराया और बोला, “दे दो ! चार सौ रुपये ही दे दो !”

शंख ने समझाया, “चार सौ रुपये से कुछ नहीं होगा, आठ सौ रुपये माँगो !”

मजबूर होकर लालची आदमी बोला, “चलो आठ सौ रुपये ही दे दो !”

शंख फिर बोला, “आठ सौ रुपये से भी कुछ नहीं होगा सोलह सौ रुपये माँगो !” आदमी समझ गया कि यह शंख कुछ नहीं देगा ! भागा-भागा वह बाबा के पास पहुँचा और उन्हें सारी बातें बताईं ! बाबा ने कहा, “मुझे तो पता था कि तुम लालच वश अपनी गरीबी की झूठी कहानी सुना रहे थे फिर भी मैंने तुमको दोनों शंख दिखाये थे ! तुमने जाँच परख कर लालच में आकर जो शंख लिया उसका नाम है गपोड़शंख ! यह देता कुछ नहीं है सिर्फ बातें बनाता है ! अब कुछ नहीं हो सकता !” बेचारा आदमी मुँह लटका कर घर चला गया !

यही पुरानी कहानी आज देश में फिर दोहराई जा रही है ! विषय है जन लोकपाल बिल ! नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिये एक अलग से कमीशन बनाने की आवश्यकता सन् १९६३ में महसूस की गयी ! और तत्कालीन सरकार ने इसको बनाने की प्रक्रिया आरम्भ की ! सन् १९६८ में इसे लोकसभा में पेश किया गया और पास किया गया ! पर अनेक तकनीकी कारणों की वजह से जैसे राज्य सभा में बिल का पास ना हो पाना, केन्द्र में सरकारों का बदल जाना आदि के कारण सन् १९७१, १९७७, १९८५, १९८९, १९९६, १९९८, २००१, २००५, व २००८ में यह बिल बार-बार संसद में पेश किया जाता रहा पर कानून न बन सका ! सन् २०११ में श्री अन्ना हजारे की टीम ने भी इस पर काम किया और एक प्राइवेट लोकपाल बिल बनाया और उसको नाम दिया ‘जन लोकपाल बिल’ ! इसे जनता का व्यापक समर्थन मिला ! सरकार पर लोकसभा में इस बिल पर जल्दी विचार करने के लिये और इसे पास करने के लिये दबाव भी डाला गया ! आंदोलन तथा अनशन किये गये ! ऐसा लग रहा था कि प्रमुख मुद्दों पर सहमति बन रही है ! और इस बिल को जल्दी ही पास कराया जा सकता है क्योंकि इसे पास करने के लिये संविधान में संशोधन की आवश्यकता भी नहीं है और लोक सभा व राज्य सभा में इसे पास कराने के लिये आवश्यक बहुमत भी उपलब्ध है ! लेकिन बीच में कुछ भरमाने वाले सुझाव आ रहे हैं ! लोक सभा में अपने बहुचर्चित भाषण में श्री राहुल गाँधी ने कहा कि उनकी राय में एक कदम और आगे बढ़ा जाये और लोकपाल बिल को लगे हाथ संविधान में परिवर्तन कर एक संवैधानिक संस्था बनाया जाये जैसा कि निर्वाचन आयोग है परन्तु स्थिति यह है कि संविधान संशोधन के लिये आज की तारीख में सरकार के पास आवश्यक बहुमत नहीं है और राजनैतिक दलों में आपस में कितना तालमेल है वह तो हम सब देख ही रहे हैं ! संविधान में संशोधन की संभावना ना के बराबर है ! फिर सरकार कहेगी कि अब तो चुनाव में दो वर्ष ही रह गये हैं ! इस बार हमें दो तिहाई बहुमत से जिताओ और बढ़िया वाला लोकपाल कानून बनवाओ ! ना बाबा आये ना घंटा बाजे ! हमको फिलहाल बिना संवैधानिक सुरक्षा वाला जन लोकपाल बिल ही मंजूर है ! जब सही समय और मौका आयेगा तो इसे ही संवैधानिक बना दिया जायेगा ! हमको तो सादा शंख ही चाहिये ! हमें गपोड़शंख नहीं चाहिये ! अंग्रेज़ी में एक कहावत है-

A bird in hand is better than two in a bush.

साधना वैद

Thursday, October 6, 2011

गरीबी ----- एक आकलन


देश के गरीबों में भी एच आई जी, एम आई जी और एल आई जी निर्धारण करने की बहस आजकल जोर शोर से चल रही है ! गरीबों में गरीब यानी की महा गरीब की प्रतिदिन आय ३२ रुपये तय हो या अधिक इस पर सरकार ने खूब समय और धन व्यय किया है ! जब एक बार यह तय हो जायेगा तब इस पर विचार किया जायेगा कि इन दुखी लोगों की किस तरह और क्या मदद की जाये ! आखिर इसमें भी लंबा समय लगेगा ही ! अंत में यह सहायता भी तो उसी पाइप लाइन से गरीबों को उपलब्ध कराई जायेगी जिसमें भ्रष्टाचार के अनेकों छेद हैं और जिनसे लीक होकर सारा धन असली हकदारों तक पहुँचने से पहले ही काफी मात्रा में बाहर निकल जाता है ! यह सब ड्रामा उसी प्रकार है जिस तरह हमें पता होता है कि बाढ़ हर साल आनी ही है इसलिए बाढ़ पीड़ितों के लिये नाव, कम्बल और आटे दाल का प्रबंध तो किया ही जाना है परन्तु बाढ़ रोकने के लिये क्षतिग्रस्त बाँधों की मरम्मत और नये बाँध बनाने का कोई उपाय नहीं किया जाता !

गरीबों और महा गरीबों को पहचान कर फौरी मदद पहुँचाने की कोशिश अपनी जगह है पर सरकार का प्रमुख लक्ष्य गरीबी हटाना होना चाहिये ! गरीब को गरीब ही रख कर उसको सस्ता अनाज खिलाना ही सरकार का एकमात्र कर्तव्य नहीं होना चाहिये ! यह काम तो तत्काल हो ही जाना चाहिये क्योंकि हमारे पास अनाज सरकारी गोदामों में भरा पड़ा है और सड़ रहा है जिसको रखने तक के लिये जगह नहीं है ! लेकिन प्रमुख समस्या है लोगों की गरीबी दूर करना !

इस समस्या का हल ऐसे लोगों के लिये रोज़गार पैदा करना है जो शिक्षा से तो वंचित हैं ही उनके पास ज़मीन व धन भी नहीं हैं जिसकी सहायता से वे कोई रोज़गार कर सकें ! ऐसे गरीबों की आमदनी का सिर्फ एक ही ज़रिया है और वह है किसी कारखाने अथवा निर्माण स्थल पर मजदूरी करना या खेत खलिहानों में नौकरी करना क्योंकि इन सभी स्थानों में अकुशल या अप्रशिक्षित व्यक्ति भी खप जाते हैं ! अब करना यह है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स को चिन्हित किया जाये और उन्हें बढ़ावा दिया जाये जिसमें गरीब तबके के लोगों को बड़ी मात्रा में काम मिल सके !

व्यापार के क्षेत्र में वैश्वीकरण की नीतियों ने हमारे देश में बड़ा विप्लव ढाया है ! भारत का सारा बाज़ार चीनी सामानों से भरा पड़ा है ! यही सामान अगर हमारे देश में बने तो यहाँ के लोगों के लिये रोज़गार के अवसर बढ़ें और हमारे देश में औद्योगीकरण को सहारा मिले लेकिन सरकार की दोषपूर्ण नीतियों के कारण यह संभव नहीं हो पाता ! चीन से आयातित सामान जिस कीमत पर बाज़ारों में उपलब्ध है वही सामान अपने देश में जब हम बनाते हैं तो उसकी कीमत कहीं अधिक बैठती है ! चीन अपने देश के बने हुए सामान को भारत और विश्व में सस्ता बेचने के लिये अपने उद्योगों को सस्ती बिजली, सस्ता कच्चा माल व सस्ती सुविधाएँ उपलब्ध कराता है ! इसी की वजह से वहाँ के उत्पादों की बिक्री बढ़ती है और अधिक से अधिक चीनी जनता को रोज़गार के अवसर मिलते हैं ! इसके विपरीत हम इस सस्ते सामान को इम्पोर्ट कर अपने उद्योगों की कठिनाइयों को बढ़ा रहे हैं ! इस तरह ना सिर्फ हम अपने देश के हुनरमंद कामगारों को बेरोजगार बना कर घर बैठा रहे हैं बल्कि उनके आत्मसम्मान को चोट पहुँचा कर उन्हें महा दरिद्रों की श्रेणी में पहुँचा रहे हैं ! अपने देश में व्यापारी को ना सिर्फ अपने लिये कमाना पड़ता है बल्कि उसे अपने सिर पर सवार नौकरशाह और चिर क्षुधित नेताओं की भूख मिटाने के लिये भी जोड़ तोड़ करनी पड़ती है ! नतीजतन भारत के उत्पाद अपने देश में ही मंहगे हो जाते हैं !

यह ध्यान देने की बात है कि इतना संपन्न अमेरिका मात्र 9% बेरोजगारी से चिंतित है और इसे अपनी सरकार की असफलता मान रहा है ! अपने देश में तो यदि परिवार में एक व्यक्ति भी रोज़गार में लगा है तो उस परिवार को बेरोजगार नहीं माना जाता ! हकीकत तो यह है कि हमारे देश में काम करने योग्य जन शक्ति का 40% तो पूर्ण रूप से बेरोजगार है और बाकी 30% आंशिक रूप से व बचे हुए 30% ही पूर्ण रूप से बारोजगार हैं !

लेकिन इस समस्या का हल भी मुश्किल नहीं है ! नीतियों का बदलाव ज़रूरी है ! ऐसे उपक्रम जिसमें अधिक से अधिक मैन पावर का इस्तेमाल हो उन्हें बढ़ावा मिलना चाहिये ! कच्चे माल पर और सुविधाओं पर अनावश्यक टैक्स नहीं लगने चाहिये ! ऑटोमैटिक मशीनों का इस्तेमाल सिर्फ उसी दशा में किया जाना चाहिये जिसमें बेहतर गुणवत्ता का लाभ मिल रहा हो और वह ज़रूरी भी हो ! उदाहरण के लिये हथकरघे से बुनी चादरें, परदे और तौलिए आदि यदि हमको सस्ते बनाने हैं तो कपास, लघु उद्योगों में काम आने वाली बिजली आदि व अन्य सुविधाओं को सस्ता करना होगा ! शायद इसके लिये सब्सीडी भी देनी पड़ेगी ! इस तरह की वस्तुओं को आयातित वस्तुओं के अनहेल्दी कम्पीटीशन से बचाने के लिये उचित नीतियां भी बनानी होंगी ! मकसद सिर्फ एक है कि हमारी जनता को रोज़गार मिले और गरीबी दूर हो ! हो सकता है कि इससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़े लेकिन वह दबाव निश्चित रूप से उस भार से तो कम ही होगा जो गरीबों के नाम से सब्सीडी देने के लिये खर्च किया जायेगा क्योंकि परिपाटी के अनुसार इस योजना में भी भ्रष्टाचार का बोलबाला तो रहेगा ही रहेगा !

सबसे महत्वपूर्ण बात जो होगी वह यह है कि रोज़गार मिलने पर हमारे देश के गरीब का आत्मसम्मान बढ़ेगा और वह महसूस करेगा कि उसने अपनी मेहनत से रोटी कमाई है ना कि महा दरिद्र की श्रेणी में खड़े होकर सरकारी राशन भीख में माँग कर अपना पेट भरा है !

साधना वैद

Sunday, October 2, 2011

जय जवान ! जय किसान


" जय जवान ! जय किसान " यह नारा दिया था हमारे स्वतंत्र भारत के दूसरे प्रधान मंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने ! शास्त्री जी, जिनकी सादगी, निष्ठा एवं संघर्षशीलता के बारे में जितना भी कहा जाये शब्द कम पड़ जायेंगे !

बचपन में उनके अभावग्रस्त जीवन के बारे में हर व्यक्ति जानता है ! कैसे वे मीलों दूर नंगे पैर पैदल चल कर विद्या ग्रहण करने के लिये स्कूल जाया करते थे ! कई बार तो नाव के पैसे ना चुका पाने की स्थिति में उन्होंने तैर कर भी नदी पार की है ! आज के बच्चे कार, बाइक, बस या स्कूटर्स पर सवार होकर स्कूल जाते हैं फिर चाहे स्कूल फर्लांग भर दूर ही क्यों न हो ! शास्त्री जी के बचपन के इन संघर्षों से भरे दिनों के किस्सों को सब कहानी की तरह पढ़ कर भूल भी जाते हैं ! शायद इसीलिये कि उनके जीवन के प्रसंगों को ना तो किसी पाठ्य पुस्तक में स्थान मिलता है, ना ही उनके ऊपर किसी फिल्मकार को कोई फिल्म बनाने की प्रेरणा हुई है कदाचित इसलिए कि कहीं यह घाटे का सौदा ना बन जाये ! उनके व्यक्तित्व के ऊपर कभी कोई सार्वजनिक चर्चा भी आयोजित नहीं की गयी ! आज शास्त्री जी के बारे में बहुत कम बच्चे जानते हैं ! जिन व्यक्तियों के जीवन के प्रसंग युवा पीढ़ी के लिये प्रेरक हो सकते हैं , उनके जीवन को प्रभावित कर सकते हैं और उनकी सोच को एक नयी सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ सकते हैं उन्हें हमारे देश के प्रबुद्ध वर्ग ने भी भुला दिया है ! बस उनके जन्मदिन एवं निर्वाण दिवस पर चंद पलों के लिये उन्हें याद कर एक रस्म सी अदा कर दी जाती है और फिर उनके अध्याय को साल भर के लिये बंद कर दिया जाता है !

शास्त्री जी एक ऐसे नेता थे जब वे रेल मंत्री थे एक छोटी सी रेल दुर्घटना हो जाने पर उन्होंने स्वयं नैतिक जिम्मेदारी ले अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ! जब वे गृहमंत्री थे और देश भीषण खाद्य समस्या से जूझ रहा था तब उन्होंने प्रत्येक सोमवार की रात एक समय का भोजन त्यागने की अपील देशवासियों से की थी ताकि भूखे व्यक्तियों के मुख को चंद निवाले मिल सकें ! वे स्वयं इस पर अमल करते थे ! उनके इस आह्वान पर तमाम भारतवासियों ने सोमवार की शाम का भोजन त्याग दिया था ! ऐसे करिश्माई नेता थे शास्त्री जी ! क्या आज के नेताओं से उनकी तुलना की जा सकती है जो भूखी जनता के मुख से निवाले छीन कर अपने बैंक बैलेंस को बढ़ाने में लगे हैं ! देश में कुछ ऐसे भी नेता हैं जो निजी हेलीकोप्टर में बैठ कर घर से ऑफिस जाते हैं और दोपहर के भोजन के लिये घर आने के लिये हेलीकोप्टर का ही प्रयोग करते हैं ! ऐसे नेताओं से क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वे देश की निर्धन जनता का ध्यान रख एक समय का अपना भोजन त्याग देंगे ? शास्त्री जी के समय में ही देश को पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करना पड़ा था ! और इसी युद्ध के निराकरण के लिये जब वे कोसीजिन के आमंत्रण पर पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान के साथ बात करने रूस गये तो वहाँ हृदयगति रुक जाने से उनका निधन हो गया ! देश हित में देश के वीर सपूत ने अपने प्राणों की आहुति दे दी !
शास्त्री जी का मानना था कि देश की आतंरिक खाद्य समस्या का समाधान खेतिहर किसान ही कर सकते हैं और देश की सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी हमारे सेना के जवानों के फौलादी कन्धों पर रहती है ! शास्त्री जी इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे ! वे जानते थे खेतों में जब किसानों की मेहनत से फसलों का सोना उगेगा तभी देश की खाद्य समस्या का निराकरण हो सकेगा और देश की सीमाओं पर तैनात जवान जब तक सतर्क और चौकस रहेंगे देशवासी अपने अपने घरों में चैन की नींद सो सकेंगे ! इसीलिये उन्होंने यह नारा दिया था , " जय जवान ! जय किसान " !
आज उनके जन्म दिन पर हमारी भावपूर्ण श्रद्धांजलि उन्हें समर्पित है ! आज देश को ऐसे ही नेताओं की ज़रूरत है जो अपनी सोच में खुद से ऊपरदेश को रखें और विश्व फलक पर देश के परचम को सबसे ऊँचे फहराने की इच्छा रखें ! शास्त्री जी को हमारा नमन !

साधना वैद

Friday, September 30, 2011

खोटे सिक्के


बापू तुमने तब जिन पर था विश्वास किया

वे तो सब के सब कागज़ के पुरजे निकले ,

था जिनकी बातों पर तुमको अभिमान बड़ा ,

वे तो सब के सब लालच के पुतले निकले !


क्यों आज लुटेरों का भारत में डेरा है ,

क्यों लोगों के मन को शंका ने घेरा है ,

क्यों नहीं किसीको चिंता रूठी जनता की ,

क्यों नहीं किसीको परवा आहत ममता की ,

बापू तुमने था जिनको यह भारत सौंपा ,

वे तो सब के सब बस खोटे सिक्के निकले !


क्यों आतंकी दहशत में जनता सोती है ,

क्यों हर पल मर मर कर यह जनता रोती है ,

क्यों आये दिन वहशत का साया रहता है ,

क्यों आये दिन मातम सा छाया रहता है ,

बापू तुम केवल लाठी लेकर चलते थे ,

लेकिन ये तो संगीनों के आदी निकले !


बापू हम संसद की गरिमा खो बैठे हैं ,

जाने कितने मंत्री जेलों में बैठे हैं ,

जाने कितनों के धन का काला रंग हुआ ,

जाने कितनों का खून पसीना एक हुआ ,

बापू जनता पर तुमने सब कुछ वारा था ,

पर ये सब जनता को दोहने वाले निकले !


बापू क्यों अब तक हमने तुमको बिसराया ,

क्यों नहीं तुम्हारी शिक्षाओं को दोहराया ,

अब जब भारत पर खुदगर्जों का साया है ,

इनको सीधा करने का अवसर आया है ,

बापू तुमने हमको जो राह दिखाई थी ,

उस पर चलने को कोटी-कोटि कदम निकले !


साधना वैद


चित्र गूगल से साभार

Monday, September 26, 2011

तुम आते तो......


तुम आते तो मन को ज्यों धीरज मिल जाता ,

रिसते ज़ख्मों पर जैसे मरहम लग जाता ,

सुधियों के सारे पंछी नभ में उड़ जाते ,

भावों के तटबंध टूट जैसे खुल जाते !

मन उपवन की मुरझाई कलिका खिल जाती ,

शब्दों को कविता की नव नौका मिल जाती ,

ह्रदय वाद्य पर जलतरंग जैसे बज जाती !

अंतर की सब पीड़ा गीतों में बह जाती ,

जीवन को जीने का ज्यों सम्बल मिल जाता ,

नयनों को सपने जीने का सुख मिल जाता ,

तुम आते तो धड़कन को साँसें मिल जातीं ,

भटके मन को मंजिल की राहें मिल जातीं !

ना आ पाये तब भी कोई बात नहीं है ,

मन मर्जी है यह कुछ शै और मात नहीं है ,

मैंने भी मन को बहलाना सीख लिया है ,

जो कुछ तुमने दिया उसे स्वीकार किया है !

सब कुछ कितना खाली-खाली सा लगता है ,

हर सुख हर सपना जैसे जाली लगता है ,

लेकिन मैंने छल को जीना सीख लिया है ,

विष पीकर अमृत बरसाना सीख लिया है !

साधना वैद