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Saturday, April 10, 2010

सुधीनामा

यह कविता मैं अपनी सबसे अंतरंग और घनिष्ठ सखी को समर्पित कर रही हूं ! नहीं मालूम वह कभी इसे पढेगी या नहीं लेकिन मेरे मन के ये उदगार हवा के पंखों पर सवार हो उस तक पहुँच जायेंगे तो मुझे बहुत खुशी होगी !


मैं सुधियों के स्वप्नलोक में खोई हूँ,
बीते उन लम्हों को फिर जी लेने दो !
तनिक मुझे सो लेने दो !

वो तेरा हर पल मुझको नयनों में रखना,
वो मेरा सुबहो शाम राह तेरी तकना,
तेरे कदमों की आहट सुन वो जी उठना,
तेरी बातों के जादू से मन का मथना,
उन सारी बातों को फिर से पी लेने दो !
तनिक मुझे सो लेने दो !

वो घंटों चुप-चुप गलबहियाँ डाले रहना,
वो बिन बोले ही सारी बातों का कहना,
वो मेरी हर पीड़ा को मेरे संग सहना,
वो मेरे दुःख का तेरी आँखों से बहना,
करुणा की उस मूरत को बस छू लेने दो !
तनिक मुझे सो लेने दो !

वो पहरों ढलते सूरज को तकते रहना,
धुंधली शामों में हाथ थाम चलते रहना,
तेरे आँचल की खुशबू से मन भर लेना,
तेरे गीतों का मन को पावन कर देना,
इन सारे भावों से अंतर भर लेने दो !
तनिक मुझे सो लेने दो !

ये छाया तेरी तेरे बिना अधूरी है
कहने को तो बस कुछ मीलों की दूरी है,
तन के बिन रहता छाया का अस्तित्व कहाँ,
मेरे दिल तेरी धडकन का बस एक जहाँ,
‘तू जहां रहे आबाद रहे’ कह लेने दो !
तनिक मुझे सो लेने दो !


साधना वैद