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Wednesday, April 14, 2010

गरिमा खोता धारावाहिक ‘बालिका वधू’

एक अत्यंत सम्वेदनशील, लोकप्रिय एवं गम्भीर सामाजिक समस्या को बड़ी ईमानदारी से उठाने वाले धारावाहिक ‘बालिका वधू’ का इस प्रकार पतन होगा और वह भी टी. आर. पी की दौड में इस तरह अपने लक्ष्य से भटक कर बेसुरा हो जाएगा यह आशातीत था !
लगभग दो वर्ष पूर्व जब सारे चैनल्स सास बहू के षड्यंत्रों से भरपूर बेहद कुरुचिपूर्ण धारावाहिक प्रसारित करने में व्यस्त थे तब एक नए चैनल कलर्स ने ‘बालिका वधू’ और ‘श्रीकृष्ण’ जैसे उच्च कोटि के धारावाहिक प्रसारित कर ना केवल अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी ईमानदार प्रतिबद्धता का भी परिचय दिया और बहुत जल्दी ही यह चैनल लोकप्रियता के सारे सोपान चढ़ शिखर पर जा पहुँचा !
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह की कुप्रथा आज भी प्रचलन में है और इसके गम्भीर दुष्परिणामों से बेखबर हमारे ग्रामवासी अभी भी इन सड़ी गली परम्पराओं से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहे हैं ! ऐसे में सामाजिक चेतना को जागृत कर नवोदय की ओर कदम बढ़ाने की प्रेरणा देता यह धारावाहिक तपती लू के थपेडों के बीच मलय पवन के सुखद शीतल झोंके की तरह प्रतीत हुआ था ! और काफी हद तक यह अपने मकसद में कामयाब भी हुआ था ! कम उम्र में बच्चों का विवाह कर देने से किस तरह से उनके व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध हो जाता है, उनकी शिक्षा दीक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है और उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है जिसके लिये वे कतई परिपक्व नहीं होते इन संवेदशील मुद्दों को धारावाहिक में बड़ी कुशलता से पिरोया गया था ! कम उम्र की बच्चियाँ किस तरह ससुराल के अपरिचित वातावरण से स्वयं को जोड़ नहीं पातीं और उन्हें उनके बाल सुलभ क्रिया कलापों के लिये कितनी प्रताडना और अपमान सहना पडता है इसे कहानीकार ने बड़ी खूबसूरती के साथ अनेकों प्रसंगों व घटनाओं के माध्यम से परदे पर उतारा था जिनमें आनंदी और जगिया की भूमिका निभाने वाले कलाकारों ने अपने बेजोड अभिनय से जान डाल दी थी ! कहानी की केन्द्रीय पात्र अल्पायु की बालिका वधू आनंदी से होने वाली बाल सुलभ मानवीय भूलें ओर कठोर अनुशासन प्रिय दादी सा का उसे बात बात पर अपमानित और दण्डित करना जहाँ दर्शकों की संवेदना को गहराई से छू रहे थे वहीं अपना संदेश भी बखूबी पहुँचा रहे थे ! लेकिन हर कहानी का कथानक और संदेश कभी तो समाप्त होता है ! टी वी धारावाहिकों के साथ सबसे बड़ी समस्या यही है कि लोकप्रियता को भरपूर भुनाने के चक्कर में और अधिकतम लाभ कमाने की जुगत में लगे रहने के कारण इनके निर्माता अपनी कहानियों को समाप्त करना नहीं चाहते और उनमें ऊटपटांग प्रसंग और नए नए पात्र जोड़ उनका सत्यानाश कर देते हैं और यहीं से धारावाहिकों का स्तर गिरना आरम्भ हो जाता है !
बालिका वधू भी आजकल इसी सिंड्रोम से गुजार रहा है ! जब तक कहानी आनंदी, सुगना, फूली, गहना की चलती रही दर्शक उसे सराहते रहे लेकिन महावीर सिंह के आते ही धारावाहिक अपने उद्देश्य से भटक गया ! अब बच्ची बालिका वधू की कहानी वयस्कों के आपसी टकराव और बदले की कहानी बन गयी ! उसने बड़े भाई के अनाचार, लालच, कुटिलता, बदले की भावना और ज़ुल्मों सितम का रूप ले लिया जिसका बालिका वधू के ध्येय से कोई लेना देना नहीं था ! आनंदी के सदय, सहृदय पिता का नफ़रत और बदले की आग में जलने वाले क्रूर व्यक्ति के रूप में रूपान्तरण भी लोगों को नहीं भाया ! और अब टीपरी नाम के पात्र के आने से रही सही कसर भी पूरी हो गयी ! अब यह धारावाहिक पूरी तरह से अपनी गरिमा, गुणवत्ता और महत्व खो चुका है ! आम डी ग्रेड के सामान्य धारावाहिकों की तरह यह भी महिलाओं की छवि धूमिल करने वाला स्तरहीन धारावाहिक बन कर रह गया है जिसमें महिलाओं की डाह, जलन, ईर्ष्या द्वेष, कुटिलता और षड्यंत्रकारी प्रकृति का अतिरंजना के साथ निरूपण किया गया है ! आश्चर्य होता है कि ये पात्र जो अचानक से परिवार में इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं कि घर के सम्पूर्ण वातावरण और निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं और घर के सारे लोग उनके कुचक्रों से अनजान उनके आगे पीछे चक्कर लगाते रहते हैं उनका पहले कभी भी किसी प्रसंग में कोई ज़िक्र तक क्यों नहीं आता ! सौतिया डाह से ग्रस्त टीपरी का प्रवेश धारावाहिक में इसी रूप में हुआ है जो दर्शकों को हजम नहीं हो रहा है !
मेरी दुआ है कि 'बालिका वधू' के निर्माता, निर्देशक और चैनल का प्रबंधन इस पर जल्दी ही विचार कर इसे तत्काल प्रभाव से बंद कर दें वरना कहीं इसका हश्र भी “क्योकि सास भी कभी बहू थी” की तरह ना हो जाए ! आश्चर्य होता है कि इतने अच्छे सीरियल बनाने वाली क्रिएटिव टीम में आत्मविश्वास की इतनी कमी क्यों है ! आपमें यदि रचनात्मकता का अभाव नहीं है तो क्यों नहीं आप सही बिंदु पर धारावाहिक को बंद कर एक नया और उससे भी बेहतर दूसरा धारावाहिक बनाते जिसे दर्शक हाथों हाथ लें और वह भी लोकप्रियता के शिखर को छुए ? इस तरह अपनी ही सुन्दर कृति का सर्वनाश करने के अपराध से तो कम से कम बच जायेंगे !

साधना वैद

10 comments :

  1. bhut hi sahi likha hai aapne...... puri tarah se yeh dharavahik teevari ke aane se bhatak gaya hai...... Dr. vyom

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  2. बहुत सही लिखा है आपने, लगभग लगभग सरे धारावाहिकों का सीसे ही सत्यानाश होता है

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  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  4. आपके चौकन्ने पन के लिए बधाई| वाकई आपने कई लोगों के मन की बात कही है पहले सा आकर्षण तो यह धारावाहिक पहले ही खो चुका था अब तीपरी ने रही-सही कसर और पूरी कर दी| यही हल मत आना इस देश लाडो औए अगले वरस मोहे बिटिया ही कीजो का भी है| ये धारावाहिक एक उद्देश्य लेकर शुरू तो होते है पर बाहरी चकाचोंध में खो जाते हैं| अब शायद इन धारावाहिको के कहानी लेखकों को दिशा मिल जाए| आभार

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  5. इतना अच्छी तरह शुरु करते हैं फिर न जाने क्या सोच कर भटकते हैं कि लगता ही नहीं कि इतना सधा हुआ शुरु हुआ था.

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  6. आपने बहुत सही बात पर प्रकाश डाला है |
    आजकल धारावाहिक की शुरूवात तो अच्छी होती है
    पर फिर मुख्य मुद्दे से कहानी बहुत दूर चली जाती है |
    सच देखा जाए तो यदि किसी को अपना समय बर्बाद
    करना हो तो सीरियल देखे|छोटे बच्चों का विवाह करने से उनका शारीरिक ,मानसिक ,सामाजिक त्तथा संवेगात्मक विकास अवरुद्ध हो जाता है तथा उनकी सृजनात्मकताअवरुद्ध हो जाती है |अब तो यह मात्र
    टाइम की बर्बादी है |
    आशा

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  7. लगभग हर सीरियल की साथ यही होता है ,,, एक बार दर्शक मिल जाते हैं तो प्रायोजक मिल जाते हैं ... फिर व्द्देश्य से भटक जाते हैं ..

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  8. सही नब्ज पकड़ी है आपने. बालिका-वधू और अन्यान्य धारावाहिक प्रारंभ तो अच्छा करते हैं लेकिन पता नहीं जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं, उन्हे भी टीआरपी का रोग इतना लग जाता है कि बाद में धारावाहिक की आत्मा कुचल-सी जाती है।

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