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Sunday, September 12, 2010

* कस्तूरी-मृग *

आज अपने पुराने संकलन से एक कहानी चुन कर आपके सामने प्रस्तुत करने जा रही हूँ ! आशा है आप इसे ज़रूर पसंद करेंगे !

* कस्तूरी-मृग *

“ लो शिखा भी आ गयी ! अब लगा लो सबका खाना बहू ! जल्दी से काम निबटा लो ! शिखाssssss जल्दी से कपडे बदल कर आ जा बेटी ! देख मैंने आज तेरी पसंद के दही बड़े और कटहल के कोफ्ते बनाए हैं ! ठन्डे हो जायेंगे तो सारा मज़ा खराब हो जाएगा ! “
माँ का उल्लसित स्वर सारे घर में गूँज रहा था ! लाडली बेटी जब-जब ससुराल से मायके आती उनकी सारी बीमारी, बुढापा, ब्लड प्रेशर सब कोसों दूर भाग जाते ! हर रोज शिखा की पसंद का कोई न कोई व्यंजन बना कर उसे खिलाने में उन्हें अपूर्व सुख मिलता ! लेकिन आज माँ के प्यार भरे आग्रहपूर्ण निमंत्रण को शिखा ने बड़े अनमनेपन से अस्वीकार कर दिया था !
“ नहीं माँ आज खाने का मन नहीं है ! मेरे दही बड़े फ्रिज में रख दीजियेगा ! मैं सुबह खा लूंगी ! बहुत थक गयी हूँ ! सोने जा रही हूँ ! आप सब खाना खा लीजिए ! वरुण को भी नींद आ रही है ! उसे सुला देती हूँ ऊपर जाकर ! “ और बिना इधर उधर देखे शिखा जल्दी जल्दी सीढियाँ चढ़ गयी थी ! माँ के उत्साह को जैसे पाला मार गया था ! कातर भाव से उन्होंने बहू रचना की देखा, “देखो तो बहू ! जाने क्या बात है ? बाज़ार गयी थी वरुण के लिए कपडे लाने ! ऐसा क्या खा लिया कि भूख ही नहीं है ? जी तो ठीक है उसका ? क्या लाई है कुछ दिखाया भी नहीं ! ”
माँ का आकुल संभाषण समाप्त होने से पहले ही रचना शिखा के पीछे-पीछे ऊपर उसके कमरे में पहुँच गयी थी !
उदास अनमनी शिखा बिना कपड़े बदले ही अपने पलंग पर लेटी खिड़की के बाहर झाँक रही थी ! पास ही शिखा का छोटा बेटा वरुण सोया हुआ था !
“क्या बात है शिखा ! खाना क्यों नहीं खा रही हो ? तबीयत तो ठीक है ना ? “ रचना ने शिखा का माथा छूकर कहा !
“ कुछ नहीं भाभी ! आज दीपाली के यहाँ गयी थी ना उसने बहुत खिला दिया इसलिये भूख नहीं है ! आप सब लोग खा लीजिए ना ! मुझे बहुत नींद आ रही है ! “
शिखा ने करवट बदल मुंह फेर लिया था ! बात खत्म होते-होते स्वर की कसावट भी बिखर गयी थी ! आँखों से उमड़ती नदी को तो शिखा ने मुँह फेर कर छिपा लिया था लेकिन आवाज़ के कंपन को वह दबा नहीं सकी थी ! शिखा की विह्वलता ने रचना को चिंतित कर दिया ! उसने यत्नपूर्वक शिखा का चेहरा अपनी ओर घुमा कर उसे तीक्ष्ण दृष्टि से निहारा,
“सच बताओ शिखा क्या बात है ! क्या मुझसे भी दुराव रखना शुरू कर दिया है ?” रचना की आवाज़ भी तरल होने लगी थी ! उसने शिखा के बालों में हाथ फेर उसका मुख अपनी गोद में छिपा लिया ! प्यार और आत्मीयता की उष्मा पा शिखा का मन पिघल उसकी आँखों से बहने लगा ! रचना और शिखा दोनों हमउम्र थीं और दोनों में प्रगाढ़ प्रेम था ! रचना मात्र शिखा की भाभी ही नहीं उसकी परम प्रिय सखी तथा आयु, ज्ञान और अनुभव में उससे बड़ी होने के नाते उसकी गुरु भी थी ! अपने उचित मार्गदर्शन से अक्सर ही उसने शिखा को समय-समय पर असमंजस और संशय की परिस्थितियों से उबारा था !
“आपसे कैसे छिपाउँगी भाभी ! आपसे नहीं कहूँगी तो मुझे राह कौन दिखायेगा ! “
एक गहरी साँस लेकर शिखा ने कहा , “लेकिन अभी नहीं ! आप सबको खाना खिला आइये ! माँ को भी समझा दीजियेगा ! वे मुझे इस मूड में देखेंगी तो बहुत दुखी होंगी ! मैं आपकी प्रतीक्षा कर रही हूँ ! “
रचना शिखा की बात मान व्यस्त भाव से नीचे तो उतर गयी थी लेकिन उसके मन का बोझ बढ़ गया था ! ऐसा क्या हो गया था कुछ ही घंटों में कि हर वक्त चहकती रहने वाली चुलबुली और खुशमिजाज शिखा अचानक इस तरह उदास और बिखरी हुई सी लग रही थी ! वह जल्दी-जल्दी काम समाप्त कर शिखा के पास पहुँच जाना चाह्ती थी !

क्रमश: