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Friday, September 3, 2010

* खुद बढ़ी जाती हूँ मैं *

ना कोई आवाज़, ना आहट, ना कदमों के निशाँ
साथ अपने साये के गुमसुम चली जाती हूँ मैं !

राह में मुश्किल बहुत सी हैं खड़ी यह है पता,
तुम न दोगे साथ मेरा बात यह भी है पता,
मैं अकेली ही बहुत हूँ मुश्किलों के वास्ते,
मुँह छिपा कर तुम कहाँ बैठे हो यह तो दो बता !

भावनाओं के भँवर में डूबती जाती हूँ मैं,
वंचनाओं की डगर पर भटकती जाती हूँ मैं,
सूखती जाती हैं कलियाँ आस और विश्वास की,
वेदनाओं की अगन में झुलसती जाती हूँ मैं !

पर मुझे अब कोई भी विप्लव डरा सकता नहीं,
कोई भी तूफ़ान मेरा सर झुका सकता नहीं,
मैं धधकती आग हूँ सब कुछ जलाने के लिए,
कोई भी आवेश अब तिल भर हिला सकता नहीं !

इस भँवर में डूब कर खुद ही उबर जाती हूँ मैं,
वंचना की कैद से बाहर निकल आती हूँ मैं,
सींच दीं मैंने वो कलियाँ आस और विश्वास की,
अगन में तप कर निखर कर दमकती जाती हूँ मैं !

यूँ किसी के रहम पर जीना मेरी फितरत नहीं,
सर झुका कर याचना करना मेरी आदत नहीं,
दफ़न करके दुःख सारे दर्द की गहराई में ,
थाम कर उँगली स्वयम् की खुद बढ़ी जाती हूँ मैं !

ना कोई आवाज़, ना आहट ना कदमों के निशाँ
साथ अपने साये के गुमसुम चली जाती हूँ मैं !

साधना वैद