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Saturday, September 18, 2010

* कस्तूरी-मृग * अंतिम भाग 4

अब तक आपने पढ़ा ----
शिखा बाज़ार से लौटती है तो खाने के लिए माँ को इन्कार कर सीधी ऊपर चली जाती है ! माँ चिंतित हो बहू रचना को उसका हालचाल लेने के लिए भेजती हैं ! शिखा रचना को काम समाप्त कर उसके पास आने के लिए कहती है ! बाज़ार में रेडीमेड कपड़ों की दूकान पर उसकी पुरानी सहेली सरोज मिल जाती है जो इन दिनों शहर में ए डी एम के पद पर आसीन है ! शिखा उसे देख कर बहुत खुश हो जाती है ! सरोज का रुतबा और शान शौकत, उसकी सम्पन्नता और दुकानदार का सरोज के साथ खुशामदी व्यवहार शिखा को अपने बौनेपन का अहसास दिला जाते हैं और वह बहुत क्षुब्ध हो जाती है ! सरोज उसे बताती है कि उसकी सभी सहेलियाँ कुछ ना कुछ कर रही हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं ! सरोज की मँहगी खरीदारी के सामने शिखा का अपना थोड़े से पैसों का छोटा सा बिल उसे और शर्मिन्दा कर जाते हैं ! अपने छात्र जीवन में अत्यंत मेधावी और प्रतिभाशाली शिखा उच्च शिक्षा प्राप्त कर न्यायाधीश बनना चाहती थी ! इसीलिये उसने एम ए और एल एल बी में एक साथ दाखिला लिया था ! लेकिन अच्छा घर वर मिल जाने पर माता पिता उसका विवाह एक पारंपरिक संयुक्त परिवार में कर देते हैं ! शिखा के पति एक ज़िम्मेदार और समझदार व्यक्ति हैं ! शिखा की सास नहीं चाहतीं कि शिखा अपनी पढ़ाई आगे जारी रखे ! शिखा को मन मार कर इस फैसले को स्वीकार करना पडता है और उसकी पढ़ाई बीच में ही छूट जाती है ! संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियां उठाते-उठाते उसकी महत्वाकांक्षाएं पिछड़ जाती हैं और वह केवल एक आदर्श पत्नी, बहू, गृहणी और माँ बन कर ही रह जाती है ! सरोज से हुई मुलाक़ात उसके मन की सुप्त पीड़ा को जगा देती है ! उसे दुःख होता है कि उसकी सभी सहेलियां आत्मनिर्भर हैं और उच्च शिक्षा प्राप्त कर सबने अपना कैरियर बना लिया है बस एक वही जो सबसे अधिक मेधावी थी मात्र गृहणी बन कर रह गयी है ! वह अपनी भाभी रचना से जब अपने मन का दुःख बाँटती है तो रचना उसे समझाने का प्रयास करती है !

अब आगे ----

“ शिखा मैं तुम्हारे मन की पीड़ा बाँट तो नहीं सकती ना ही तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट कैरियर दिलाने में सक्षम हूँ ! लेकिन एक बात तुमसे ज़रूर पूछना चाहती हूँ क्या तुम्हारे लिए मात्र धनोपार्जन में ही शिक्षा की सार्थकता है ? क्या जीवन को केवल भैतिक स्तर पर रख कर सुख-दुःख के तराजू में तोला जाना चाहिए? भावनात्मक पहलू का कोई मोल, कोई महत्त्व नहीं होता ? “
“ है क्यों नहीं भाभी ! “ शिखा ने प्रतिवाद करते हुए उत्तर दिया. “ मैं अपना कैरियर सिर्फ धन कमाने के उद्देश्य से ही नहीं बनाना चाहती थी ! मेरे लिए भावनात्मक सुख और आत्मिक संतोष भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना यथार्थ रूप में अपने कैरियर के लिए समर्पित होना ! अपनी शिक्षा, अपनी योग्यता का मैं सही अर्थों में इस्तेमाल करना चाहती थी ! अपने देश अपने समाज की सेवा करना चाहती थी ! क्या इससे आत्म संतोष नहीं मिलता ? आज जो काम मैं कर रही हूँ घर सम्हालने का वह तो हमारी दादी नानी जो बिलकुल अनपढ़ थीं वे भी भली भाँति कर लेती थीं और हमारी माँ और सास जो अपेक्षाकृत कम पढ़ी लिखी हैं वे भी बखूबी कर लेती हैं ! फिर हम लोगों की इन डिग्रियों की सार्थकता क्या हुई ? इतनी पढ़ाई की थी तो कुछ काम भी ऐसा करते कि समाज में नाम होता एक पहचान होती ! ”
“ तो शिक्षा की सार्थकता क्या नौकरी करने में ही है ? “ रचना ने पलट कर प्रश्न किया ! “ क्या शिक्षित होना तुम्हारे स्वयं के लिए सुख और संतोष का कारण नहीं है ? क्या पढ़ाई केवल दूसरों को प्रभावित करने के लिए और दूसरों का कार्य करने के लिए ही की जानी चाहिए ? इसका अर्थ तो यह हुआ कि तुम यह सोचती हो कि तुमने तो बहुत अधिक पढ़ लिया है ! इससे अधिक ज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता ही नहीं क्योंकि घर गृहस्थी चलाने के लिए इससे अधिक पढ़ाई की तो आवश्यकता ही नहीं होती ! नयी जानकारी प्राप्त करना, ज्ञान बढ़ाना, प्रबुद्ध होना तो सदैव आनंद और सुख को बढ़ाता है ! ज्ञान की राह पर चलने वाला इंसान कभी कुण्ठित नहीं होता और इस राह का कहीं अंत नहीं होता ! “
रचना ने प्यार से शिखा को थपकते हुए कहा, “ रहा सवाल समाज सेवा का तो शिखा हर सिक्के के दो पहलू होते हैं ! अगर तुम्हारे दृष्टिकोण से नौकरी करके अच्छी तरह से समाज सेवा हो सकती है तो मेरे दृष्टिकोण से नौकरी ना करके उससे भी बेहतर तरीके से समाज सेवा की जा सकती है ! “
“ वो कैसे ? “ शिखा ने उत्सुकता से रचना को निहारा !
“ वो ऐसे कि जो लोग अनावश्यक रूप से केवल इसलिए नौकरी कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने बहुत पढ़ाई कर ली है और पढ़ाई खत्म करने के बाद नौकरी ही उनका लक्ष्य होता है, कहीं न कहीं उस ज़रूरत मंद का अधिकार छीन कर उसके साथ अन्याय कर रहे होते हैं जिसको इस नौकरी की उनसे कहीं अधिक ज़रूरत होती है ! समाज में कितने ही ऐसे परिवार हैं जिनके यहाँ धनाभाव के कारण दोनों वक्त समुचित भोजन की व्यवस्था कर पाना आज भी एक विकराल समस्या है ! उस वर्ग में आज भी कितने ही शिक्षित बेरोजगार युवक और युवतियां हैं जो अपनी डिग्रियाँ और प्रमाणपत्र लिए नौकरी की तलाश में न जाने कितने दफ्तरों, संस्थाओं और दुकानों के चक्कर लगा कर अपने जूते घिसते दिखाई देते हैं लेकिन सूर्यास्त के साथ-साथ उनकी उम्मीदें भी दम तोड़ देती हैं और अगला दिन फिर इसी संघर्ष और नाकामी की दास्तान दोहराने के लिए उदित होता है ! तुम्हारे स्थान पर अगर ऐसे किसी व्यक्ति को नौकरी मिल जाए तो क्या अप्रत्यक्ष रूप से तुम उसकी समस्या सुलझाने में सहायक नहीं हुईं ? क्या समाज सेवा का एक रूप यह नहीं हो सकता ? या तुम्हारा अहम तभी तुष्ट होगा जब तुम नौकरी कर कमाये हुए धन से गरीबों के लिए खाना, कपड़ा, किताबें, खिलौने इत्यादि दान में देकर उन्हें आत्म निर्भर बनाने की जगह उन्हें उनकी बेचारगी का अहसास दिला कर और अधिक हीन भावना से ग्रस्त कर दो और यह सब करके दानवीर होने के गौरव से खुद को ही महिमामंडित करती रहो ? मेरे विचार से नौकरी उसे करनी चाहिए और उसे मिलनी चाहिए जिसकी ज़रूरत बड़ी है ना कि उसे जिसकी डिग्री बड़ी है या जिसकी सिफारिश दमदार है ! “
शिखा उठ कर बैठ गयी थी ! उसकी सारी इन्द्रियाँ कानों में केंद्रित हो गयी थीं, “ इस नज़र से तो मैंने कभी सोचा ही नहीं भाभी ! लेकिन क्या महिलाओं को नौकरी करनी ही नहीं चाहिए ? क्योंकि आम तौर पर हमारे समाज में हर घर में धन कमाने का कार्य तो पुरुष ही करते हैं और यही सही समझा जाता है ? “
“ मैंने यह तो नहीं कहा कि महिलाओं को नौकरी करनी ही नहीं चाहिये ! मैं उनके सर्विस करने विरुद्ध बिलकुल भी नहीं हूँ ! मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूँ कि केवल मनोरंजन और अहम् की तुष्टि के लिए नौकरी नहीं करनी चाहिये ! महिलाओं पर नौकरी के अलावा गृहस्थी का भी भार होता है ! नौकरी करने से घर और बच्चों की कुछ न कुछ उपेक्षा तो अवश्य ही होती है ! लेकिन अगर पारिवारिक परिस्थितियाँ सचमुच विषम हों और संकट की स्थिति हो तो नौकरी करना नितांत आवश्यक हो जाता है ! ऐसे में नौकरी ना करने का निर्णय घातक भी हो सकता है ! मेरी बात सुन रही हो ना ? “ रचना ने शिखा को दुलारते हुए कहा !
“ हाँ सुन रही हूँ भाभी आप ठीक कह रही हैं ! “ शिखा का स्वर स्थिर था !
रचना का वक्तव्य जारी था, “ शिखा मुझे याद है एक बार तुमने ही मुझे बताया था कि धीरज तुम्हें बहुत प्यार करते हैं ! वे कहते हैं ‘मैं नहीं चाहता मेरी शिखा किसीके आधीन होकर काम करे ! ऑफिस में गलतियाँ हो जाने पर किसी की झिड़कियाँ खाए, डाँट सुने ! मेरी शिखा सिर्फ मेरे लिए है !’ और इसीलिये शायद किंचित प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उन्होंने तुम्हें कभी सर्विस करने की अनुमति नहीं दी ! और मुझे यह भी याद है यह अंतरंग वार्ता जब तुमने मुझे सुनाई थी तब तुम्हारी आंखों में अनुराग और प्रेम की जो ज्योति जल उठी थी वह तुम्हारे दाम्पत्य के शेष समस्त जीवन को प्रकाशित करने के लिए सक्षम थी ! क्या तुम सुख संतोष की इस दौलत की तुलना उस दौलत से कर सकती हो जो तुम्हारी सहेलियों ने नौकरी कर जुटा रखी है ! तुम्हारी दौलत अक्षुण्ण, अनमोल और चिरंतन है पगली और उनकी दौलत अस्थाई ! दूर के ढोल सुहावने लगते हैं ! कभी उनके जीवन में झाँक कर देखना ! ऐशो आराम से भरे पूरे उनके घरों में उनके अपने पारिवारिक सम्बन्ध कितने खोखले, बनावटी, तनाव भरे और बमानी से हो जाते हैं ! उनके यहाँ पति और घर के बुज़ुर्ग नौकरों के भरोसे और बच्चे आया के भरोसे रहने के लिए विवश होते हैं ! स्कूल से लौटने के बाद बच्चे या तो नौकरों के साथ उठ बैठ कर उनकी गंदी भाषा, उनकी बुरी आदतें, उनके खराब संस्कार सीखते हैं या दिन भर गली मोहल्लों में सड़कों पर नज़र आते हैं ! माँ की ममता, प्यार और अनुशासन के अभाव में वे जिद्दी, चिड़चिड़े और कुण्ठित हो जाते हैं ! ये ही बच्चे मन का आक्रोश दबाने के लिए कई बार नशीली दवाओं का सेवन करने लगते हैं या अन्य कई बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं ! क्या ऐसी खबरें तुमने अखबारों और पत्र पत्रिकाओं में कभी नहीं पढीं ? जितनी अच्छी तरह से तुम अपने बेटों की परवरिश कर रही हो, चरित्र निर्माण में उनकी सहायता कर रही हो, दोनों बच्चे कितने होशियार, समझदार, सुशील और संस्कारवान हैं क्या यह तुम्हारे लिए गर्व और संतोष का विषय नहीं है ? “ रचना का स्वर आवेशित हो उठा था !
“ रही बात आत्म संतोष की तो शिखा संतोष का भाव तो मनुष्य के अंदर ही होता है उसे पहचानने भर की ज़रूरत होती है ! तुम तो उस कस्तूरीमृग की तरह हो जिसकी नाभि में कस्तूरी होती है लेकिन वह अज्ञानतावश उसकी सुगंध से भ्रमित हो चारों ओर उसे ढूँढता फिरता है ! तुम सुख को अपनी खंडित महत्वाकांक्षाओं से जोड़ कर व्यर्थ ही दुखी और निराश रहती हो जबकि वास्तव में तुम सबसे भाग्यवान और सुखी हो ! देखो शिखा हर परिवार का वातावरण, परिस्थितियाँ और जीवन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं ! तुम जिस परिवार में गयी हो वहाँ सब यही पसंद करते हैं कि स्त्रियाँ घर में रह कर ही घर परिवार की देखभाल करें ! बच्चों को उचित शिक्षा और संस्कार दें ! सबको भरपूर प्यार दें और बदले में वे भी स्त्रियों को यथासंभव सुख, सम्मान और सुरक्षा देना चाहते हैं ! शायद पीढ़ियों से उनके परिवार की यही परम्परा रही होगी ! उस परम्परा का मान रखना तुम्हारा धर्म है शिखा ! फिर तुम अपने पथ से विचलित क्यों होती हो ? उनके संस्कार बहुत दृढ हैं ! उन सबसे विद्रोह करके क्या तुम यह सुख और सम्मान अर्जित कर पातीं जो आज तुमने उनकी इच्छाओं का सम्मान करके, उनकी भावनाओं का आदर करके अर्जित किया है ? मेरे ख्याल से तुम जितनी भावुक और संवेदनशील हो सबका विरोध करके, सबको असंतुष्ट करके तुम स्वयं भी सदैव दुखी और अपराध बोध से ग्रस्त रहतीं और दुःख के बीज बोकर उनके और अपने जीवन में नर्क की सृष्टि कर लेतीं ! धन तो शायद आ जाता लेकिन सुख संतोष जीवन में समाप्त हो जाता ! आज जिस प्रकार से तुमने परिवार के हर सदस्य का प्यार दुलार पाया है, तुम अपने परिवार का एक अभिन्न और अनिवार्य अंग बन गयी हो क्या यह तुम्हारे लिए हर्ष और आनंद का विषय नहीं है ? पढ़ाई का क्या है तुम जब चाहो जितना चाहो आगे पढ़ सकती हो ! अब तो पत्राचार के माध्यम से घर बैठे ही अनेकों अच्छे-अच्छे कोर्सेज़ किये जा सकते हैं ! ये तुम्हें इस लायक बना सकते हैं कि जीवन में जब भी ज़रूरत पड़े तुम नौकरी कर सको ! लेकिन अभी तुम अपनी उपलब्धियों से मुँह मत मोड़ो शिखा ! उन्हें इस तरह नकारो मत ! अपने भीतर की कस्तूरी को पहचानो और उसके सौरभ से अपने परिवार, अपने परिवेश और अपने जीवन को सुगन्धित कर दो ! अपने मन को भटकने मत दो ! “ आँसुओं के आवेग से रचना की आवाज़ लरजने लगी थी ! लेकिन शिखा का मन बिलकुल हल्का हो गया था ! उसके मनाकाश से दुःख की बदली छँट गयी थी ! निरुद्विग्न मन में रचना का एक-एक शब्द प्रकाश पुन्ज बन उसके ह्रदय का कोना-कोना आलोकित कर रहा था !

समाप्त

साधना वैद