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Thursday, September 9, 2010

* ज़रा ठहरो *

ज़रा ठहरो !
तुम इनको न छूना,
ये एक बेहद पाकीजा से रिश्ते के
टूट कर बिखर जाने से
पैदा हुई किरचें हैं जिन्हें छूते ही
धारा प्रवाह खून बहने लगता है ,
डरती हूँ तुम्हारे छू लेने से
कहीं इनकी धार कुंद ना हो जाए,
अगर इनकी चुभन से लहू ही ना बहा
तो इनकी सार्थकता क्या रह जायेगी !

ज़रा ठहरो !
तुम इनको ना मिटाओ,
ये मेरे मन के कैनवास पर
उकेरे गये मेरे अनन्य प्रेम की
मोहक तस्वीरों को बिगाड़ कर
खरोंचने से बने बदनुमा धब्बे हैं
अगर ये मिट गए तो मेरे तो
जीने का मकसद ही खत्म हो जाएगा,
जब 'देखो, ढूँढो पहचानो' का खेल
ही खत्म हो जाएगा तो फिर मैं
इस कैनवास में क्या ढूँढ पाउँगी
और मुझे कैसे चैन आएगा !

ज़रा ठहरो !
तुम इनको ना समेटो,
ये मेरी अनकही, अनसुनी
अनभिव्यक्त उन प्रेम पातियों के
फटे हुए टुकड़े हैं जो कभी
ना भेजी गयीं, ना ही पढ़ी गयीं
लेकिन आज भी मैं दिन भर में
मन ही मन ना जाने कितनी बार
इन्हें दोहराती हूँ और जो आज भी
मेरे जीने का संबल बनी हुई हैं !

ज़रा ठहरो !
अब जब तुम आ ही गए हो
तो मेरे इस अनमोल खजाने
को भी देखते जाओ
जिसमें एक पाकीजा सी मोहब्बत की
चंद यादें, चंद खूबसूरत तस्वीरें,
ढेर सारे आँसू, ढेर सारी चुभन
चंद फटे खत और पुरानी डायरी के
जर्जर पन्नों पर दर्द में डूबी
बेरंग लिखावट में धुली पुछी
चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
मेरा दिल आज भी धड़कता है !

साधना वैद

12 comments :

  1. चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
    इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और

    सारी संवेदनाएं इन पंक्तियों में सिमट गयी हैं ....बहुत भावनायुक्त रचना ...

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  2. ज़रा ठहरो !
    अब जब तुम आ ही गए हो
    तो मेरे इस अनमोल खजाने
    को भी देखते जाओ
    जिसमें एक पाकीजा सी मोहब्बत की
    चंद यादें, चंद खूबसूरत तस्वीरें,
    ढेर सारे आँसू, ढेर सारी चुभन
    चंद फटे खत और पुरानी डायरी के
    जर्जर पन्नों पर दर्द में डूबी
    बेरंग लिखावट में धुली पुछी
    चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
    इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
    मेरा दिल आज भी धड़कता है !
    बहुत सुंदर ।

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  3. बहुत भावपूर अभिव्यक्ति.

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

    हिन्दी, भाषा के रूप में एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में सामाजिक प्रतीक और साहित्य के रूप में एक जातीय परंपरा है।

    हिन्दी का विस्तार-मशीनी अनुवाद प्रक्रिया, राजभाषा हिन्दी पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

    ReplyDelete
  5. ज़रा ठहरो !
    अब जब तुम आ ही गए हो
    तो मेरे इस अनमोल खजाने
    को भी देखते जाओ
    जिसमें एक पाकीजा सी मोहब्बत की
    चंद यादें, चंद खूबसूरत तस्वीरें,
    ढेर सारे आँसू, ढेर सारी चुभन
    चंद फटे खत और पुरानी डायरी के
    जर्जर पन्नों पर दर्द में डूबी
    बेरंग लिखावट में धुली पुछी
    चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
    इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
    मेरा दिल आज भी धड़कता है !

    कुछ यादें , कुछ लम्हे और कुछ नज़्में ही तो वो धरोहर होती हैं जिनके सहारे ज़िन्दगी गुजर जाती है और उस अहसास को आपने बखूबी उकेरा है………………बधाई।

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  6. भावों से परिपूर्ण रचना |बधाई
    आशा

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  7. बेरंग लिखावट में धुली पुछी
    चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
    इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
    मेरा दिल आज भी धड़कता है !
    बहुत गहरी भावमय अभिव्यक्ति। दिल को छू गयी। अभी याद किया था कि आपकी पोस्ट पर नज़र पड गयी। शुभकामनायें

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  8. ना जाने एक नारी अपने अंतस में कितना कुछ छुपाये रखती है...एक पूरी जिंदगी चाहिए इसका मंथन करके इसमें छुपे माणिक पा लेने के लिए.

    बहुत शानदार प्रस्तुति.

    चर्चामंच पर आने के लिए आभार.

    हर पल होंठों पे बसते हो, “अनामिका” पर, ... देखिए

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  9. चंद नज्में मैंने सहेज रखी हैं !
    इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
    ओह ! बहुत संवेदनशील
    मैं अनुष्का .....नन्ही परी

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  10. डरती हूँ तुम्हारे छू लेने से
    कहीं इनकी धार कुंद ना हो जाए,
    अगर इनकी चुभन से लहू ही ना बहा
    तो इनकी सार्थकता क्या रह जायेगी !

    ये मेरी अनकही, अनसुनी
    अनभिव्यक्त उन प्रेम पातियों के
    फटे हुए टुकड़े हैं जो कभी
    ना भेजी गयीं, ना ही पढ़ी गयीं


    इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
    मेरा दिल आज भी धड़कता है !


    क्या बात है कितना खूबसूरत और आकर्षक लिखती हैं आप बहुत ही खूब लिखा है आपने
    बधाई

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  11. इन्हें जब जब मैं बहुत हौले से
    छू लेती हूँ, सहला लेती हूँ
    तो इनका स्पर्श मुझे याद दिला देता है
    कि मैं आज भी ज़िंदा हूँ और
    मेरा दिल आज भी धड़कता है !
    बहुत ही खूबसूरती से आपने इन अनकहे..अनदेखे भावों को शब्दों में पिरोया है...हर मन की टीस है यह....सुन्दर अभिव्यक्ति

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  12. बहुत गहरी ... संवेदनशील रचना ...

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