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Tuesday, November 1, 2011

कुछ तो है


कुछ तो है जो ,

परिंदे भी चुप हैं ,

पत्ते भी खामोश हैं,

फूल भी उदास हैं ,

तितलियों के सुहाने

शोख रंग भी

बेरंग से हो चले हैं !

कुछ तो है जो ,

खुशियों में कमी सी है ,

आँखों में नमी सी है ,

साँसे भी थमी सी हैं ,

यादों के जखीरे पर

वक्त की बर्फ की

सर्द सी पर्त जमी है !

कुछ तो है जो ,

हवाएं भी बोझिल हैं ,

बादलों की आँखें भी

बरस रही हैं ,

संवेदनाएं भी तिक्त हैं ,

हृदय भी रिक्त है ,

अधरों पर ठहरे

सहमे हुए से शब्द भी

वेदना से सिक्त हैं !

कुछ तो है जो ,

कायनात की हर शै

अपनी जगह से बेवजह

कहीं दूर हट चुकी है ,

खुशियों पर पकड़

ढीली हो चली है ,

निगाहें सामने पसरे

असीम रेगिस्तान के

प्रखर ताप से

झुलस चुकी हैं ,

शायद इसलिए कि

'तुम चुप हो' !




साधना वैद