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Saturday, November 19, 2011

एक पन्ना --- डायरी का

दूर क्षितिज पर भुवन भास्कर सागर की लोल लहरियों में जलसमाधि लेने के लिये अपना स्थान सुनिश्चित कर संसार को अंतिम अभिवादन करते विदा होने को तत्पर हैं ! सूर्यास्त के साथ ही अन्धकार त्वरित गति से अपना साम्राज्य विस्तृत करता जाता है ! जलनिधि की चंचल तरंगों के साथ अठखेलियाँ करती अवसान को उन्मुख रवि रश्मियों का सुनहरा, रुपहला, रक्तिम आवर्तन-प्रत्यावर्तन हृदय को स्पंदित कर गया है ! संध्या के आगमन के साथ ही पक्षी वृन्दों को चहचहाते हुए अपने बसेरों की तरफ लौटते देख मन अवसाद से भर उठा है ! क्यों मेरा मन इतना निसंग, एकाकी और उद्भ्रांत है ! अंधकार की गहनता के साथ ही नीरवता भी पल-पल बढ़ती जाती है ! दूर-दूर तक अब कहीं प्रकाश की कोई रेखा दिखाई नहीं देती ! बच्चों का कलरव भी मंद हो चला है ! कदाचित सभी अपने-अपने घरों को लौट गये हैं ! मैं भी अनमनी सी शिथिल कदमों से लौट आई हूँ अपने अंतर के निर्जन सूने एकांतवास में जहाँ रात के इस गहन सन्नाटे में कहीं से भी कोई आहट, कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती कि मैं खुद के ज़िंदा होने का अहसास महसूस कर सकूँ ! पंछी भी मौन हो गये हैं ! इसी तरह निर्निमेष अन्धकार में छत की कड़ियों को घूरते कितने घण्टे बीत गये पता ही नहीं चला ! अब कुछ धुँधला सा भी दिखाई नहीं देता ! जैसे मैं किसी अंधकूप में गहरे और गहरे उतरती चली जा रही हूँ ! मेरी सभी इंद्रियाँ घनीभूत होकर सिर्फ कानों में केंद्रित हो गयी हैं ! हल्की सी सरसराहट को भी मैं अनुभव करना चाहती हूँ शायद कहीं कोई सूखा पीला पत्ता डाल से टूट कर भूमि पर गिरा हो, शायद किसी फूल से ओस की कोई बूँद ढुलक कर नीचे दूब पर गिरी हो, शायद किसी शाख पर किसी घोंसले में किसी गौरैया ने पंख फैला कर अपने नन्हे से चूजे को अपने अंक में समेटा हो, शायद किसी दीपक की लौ बुझने से पूर्व भरभरा कर प्रज्वलित हुई हो ! इस घनघोर अन्धकार और भयावह सन्नाटे में वह कौनसी आवाज़ है जिसे मैं सुनना चाहती हूँ मैं नहीं जानती लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि साँसों की धीमी होती रफ़्तार को गति तभी मिल सकेगी जब मुझे वह आवाज़ सुनाई दे जायेगी !

साधना वैद