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Friday, November 4, 2011

चिराग और जुगनू

कौन कहता है कि
सामान अब
पहले से
बेहतर मिलने
लगा है ,
हमारी राहें तो
आज भी
माज़ी में जलाये
चिरागों से ही
रौशन हैं !
ताज़े जलाये
चिराग तो
जुगनू की तरह
टिमटिमा कर
बुझते जाते हैं
और आँखों को
कसैले धुएँ से
भरते जाते हैं !




साधना वैद