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Wednesday, July 18, 2012

आखिर कब !












कब तक तुम नारी को
सवालों के घेरे में
कैद करके रखोगे !
और उसके मुख से निकले
हर शब्द, हर आचरण की
शल्य चिकित्सा में
प्राण प्रण से जुटे रहोगे !  
देखो, तुम्हारे सवालों के
तीक्ष्ण बाणों ने
किस तरह उसके तन मन को
छलनी कर रख दिया है !
क्यों सदियों से उसे
उन गुनाहों का दण्ड
भुगतना पड़ रहा है
जिनके उत्तरदायी तो
कोई और थे लेकिन
जिनके परिमार्जन के लिये
भेंट उसे चढ़ा दिया गया !
वह चाहे सीता हो या कुंती,
पांचाली हो या प्रेम दीवानी मीरा
हर विप्लव का कारण
उसे ही ठहराया गया और
सबके क्रोध की ज्वाला में
झुलसना उसीको पड़ा !
परोक्ष में छिप कर बैठे
इन सभी दुखांत नाटकों के
सूत्र धारों के असली चेहरे
कोई पहचान न पाया
और शुद्धिकरण के यज्ञ में
आहुति उसीकी पड़ी !
क्यों आज भी अपने हर
गुनाह के धब्बों को  
पोंछने के लिये तुम्हें
एक स्त्री के पवित्र आँचल
की आवश्यकता पड़ती है ?
क्यों तुम दर्पण में
अपना चेहरा नहीं देख पाते ?
क्या सिर्फ इसलिए कि
बलिवेदी पर भेंट चढ़ाने के लिये
एक बेजुबान पशु के मस्तक की
व्यवस्था करना तुम्हारे लिये
बहुत आसान हो गया है ? 
आज भी शायद इसीलिये
हर शहर में, हर गाँव में
हर गली में, हर मोड़ पर
अपमान और ज़िल्लत की शिकार
सिर्फ औरत ही होती है
और इन सबके गुनाहगार
शर्मिंदगी की सारी कालिख
औरत के चेहरे पर पोत
अपने चेहरों पर शराफत और
आभिजात्य का मुखौटा चढ़ाये  
बेख़ौफ़ सरे आम घूमते हैं !
क्या आज की नारी भी
अपनी अस्मिता की रक्षा
करने में अक्षम है ?
कब वह अपने अंदर की
दुर्गा, काली, चंडिका और
महिषासुरमर्दिनी को जागृत
कर पायेगी और अपने  
चारों ओर पसरे असुरों का
संहार कर अपने लिए
एक भयमुक्त समाज की
रचना कर पायेगी ?
आखिर कब ?
   
साधना वैद