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Friday, July 4, 2014

सावनी तांका



बरस गयी
सावन की फुहार
अलस्सुबह,
भिगो गयी बदन
   सुलगा गयी मन ! 




झाँक रहा है
बादल की ओट से
नन्हा सूरज,
कैसे आऊँ बाहर
कहीं भीग न जाऊँ !



भाग रहे थे
श्वेत श्याम बादल
पकड़ने को
धरा माँ का आँचल
   ना मिला तो रो पड़े ! 



सुहावनी है
सावन की बयार
साथ लाती है
मधुरिम पलों की
स्मृतियाँ बारम्बार !




याद आता है
बारिश में भीगना
चलते जाना
नर्म गीली दूब पे
पाँव थकने तक !


साधना वैद